नई दिल्ली

24 घंटे के अंदर कैसे बदल गए अवध ओझा? बंगाल चुनाव परिणाम पर कर गए थे जल्दबाजी, अब ट्वीट हो रहा वायरल

Avadh Ojha Bengal Election: पश्चिम बंगाल चुनाव नतीजों में ममता बनर्जी की हार और भाजपा की प्रचंड जीत के बाद मशहूर शिक्षक अवध ओझा को अपना बयान बदलना पड़ा। नतीजों से पहले 'दीदी' को बधाई देने वाले ओझा ने 24 घंटे के भीतर यू-टर्न लेते हुए भाजपा को जीत की बधाई दी और सरकारों को बदलते रहने का नया तर्क दिया।

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Avadh Ojha: मशहूर शिक्षक और आम आदमी पार्टी (आप) के पूर्व नेता अवध ओझा को पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों का अनुमान लगाना भारी पड़ गया। अपनी खास वाक शैली के लिए चर्चित ओझा को पूरा विश्वास था कि ममता बनर्जी एक बार फिर सत्ता में वापसी करेंगी, लेकिन नतीजों ने उनके दावों की हवा निकाल दी। आलम यह रहा कि उन्हें 24 घंटे के भीतर अपना बयान बदलते हुए 'यू-टर्न' लेना पड़ा।

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नतीजों से पहले ही दे दी थी ममता को बधाई

वोटों की गिनती से एक दिन पहले ही अवध ओझा ने ममता बनर्जी की जीत सुनिश्चित मान ली थी। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा करते हुए लिखा था, 'TMC और ममता दीदी को बंगाल के विजय की अग्रिम बधाई। मोदीजी को ममता दीदी की कीमत पता है। जय हिंद।' उनके इस आत्मविश्वास ने राजनीतिक गलियारों में काफी सुर्खियां बटोरी थीं।

बीजेपी की ऐतिहासिक जीत और ओझा का 'ज्ञान'

सोमवार को जब नतीजे सामने आए, तो बंगाल में 15 साल से काबिज टीएमसी का किला ढह गया। भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए 207 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि टीएमसी महज 80 सीटों पर सिमट गई। पहली बार बंगाल में पूर्ण बहुमत के साथ 'कमल' खिलने के बाद अवध ओझा ने तुरंत अपनी बधाई का रुख मोड़ दिया।

हार की तस्वीर साफ होते ही ओझा ने नया तर्क देते हुए बीजेपी को जीत की बधाई दी। उन्होंने लिखा, 'बंगाल जीतने पर बीजेपी को बधाई। ऐसे ही देश की जनता को सरकारों को बदलते रहना चाहिए। जय हिन्द।'

10 साल में 3 से 207 सीटों का सफर

आपको बता दें कि बंगाल का चुनाव परिणाम सामने आने के बाद आम आदमी ले लेकर सियासी पंडित भी हैरान है। बिहार की तरह यहां का परिणाम देखकर राजनीतिक जानकार हैरान हैं। गौरतलब है कि महज 10 साल पहले 3 सीटों पर सिमटी भाजपा ने जिस तेजी से खुद को बंगाल में स्थापित किया, उसने विपक्षी दलों के समीकरण बिगाड़ दिए हैं। फिलहाल बीजेपी अपनी इस रणनीतिक जीत का जश्न मना रही है, वहीं अवध ओझा जैसे विश्लेषकों को जनता के मूड को भांपने में नाकाम रहने पर सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का सामना करना पड़ रहा है।

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