
Gulab Kothari Article शरीर ही ब्रह्माण्ड: ब्रह्म एक-दूसरा कोई नहीं। ब्रह्म की प्रकृति (स्वभाव) ही उसका मन-उसकी कामना। तब ब्रह्म और प्रकृति दो संस्थाएं कहां हैं? व्यवहार में अव्यय पुरुष ही जगत का ब्रह्म है। कृष्ण ही अव्यय है-‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:’ रूप में वही 84 लाख योनियों में विस्तार पा रहा है। विस्तार का आधार है उनके मन की कामना-प्रकृति-हृदय-परा रूप शक्ति। सारा क्रम प्राण शरीर का कार्य है।
पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी की बहुचर्चित आलेखमाला है - शरीर ही ब्रह्माण्ड। इसमें विभिन्न बिंदुओं/विषयों की आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से व्याख्या प्रस्तुत की जाती है। गुलाब कोठारी को वैदिक अध्ययन में उनके योगदान के लिए जाना जाता है। उन्हें 2002 में नीदरलैन्ड के इन्टर्कल्चर विश्वविद्यालय ने फिलोसोफी में डी.लिट की उपाधि से सम्मानित किया था। उन्हें 2011 में उनकी पुस्तक मैं ही राधा, मैं ही कृष्ण के लिए मूर्ति देवी पुरस्कार और वर्ष 2009 में राष्ट्रीय शरद जोशी सम्मान से सम्मानित किया गया था। 'शरीर ही ब्रह्माण्ड' शृंखला में प्रकाशित विशेष लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें नीचे दिए लिंक्स पर-