
International Albinism Awareness Day 2026 : संभावना है कि आप 'एल्बिनिज्म' (रंगहीनता) शब्द से पूरी तरह परिचित न हों। लेकिन आपने कभी न कभी किसी ऐसे व्यक्ति को अवश्य देखा होगा जो सामान्य से कहीं अधिक गोरा दिखता है और जिसके बालों का रंग भी पूरी तरह सफेद या हल्का भूरा होता है। एक अनुमान के मुताबिक, भारत में एल्बिनिज्म से प्रभावित लोगों की आबादी लगभग 1 लाख से 2 लाख के बीच है।
आज 'इंटरनेशनल एल्बिनिज्म अवेयरनेस डे' (अंतरराष्ट्रीय रंगहीनता जागरूकता दिवस) के मौके पर पत्रिका के रवि गुप्ता ने भारत में एल्बिनिज्म से प्रभावित लोगों के हक के लिए मुहिम छेड़ने वाली निधि गुप्ता से खास बातचीत की। निधि गुप्ता के बेटे निमय गुप्ता, जो वर्तमान में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के छात्र हैं, खुद एल्बिनिज्म से प्रभावित हैं। निधि ने निमय के बचपन से लेकर अब तक के सफर में आने वाली तमाम सामाजिक और शारीरिक चुनौतियों को बेहद करीब से देखा है और आज वह ऐसे हजारों लोगों को सशक्त बना रही हैं।
निधि कहती हैं, "अक्सर लोगों को लगता है कि यह सिर्फ त्वचा के रंग से जुड़ी बात है। लेकिन असलियत यह है कि एल्बिनिज्म से पीड़ित लोगों की आंखें जन्म से ही कमजोर होती हैं। उन्हें स्किन कैंसर का खतरा भी सबसे ज्यादा होता है। रही बात सामाजिक स्वीकार्यता की, तो शुरुआत में न तो स्कूल में आसानी से एडमिशन मिल पाता है और न ही समाज इन्हें सामान्य रूप से स्वीकार करता है।"
त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. मनीष नायक ने पत्रिका को बताया, "एल्बिनिज्म एक दुर्लभ आनुवंशिक विकार (Genetic Disorder) है। इसमें व्यक्ति की त्वचा, बालों और आंखों में रंग प्रदान करने वाले पिगमेंट 'मेलेनिन' की पूरी तरह से या आंशिक रूप से कमी होती है। यह स्थिति जन्मजात होती है और यह छूने से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में बिल्कुल नहीं फैलती।"
निधि बताती हैं, "शुरुआत में जब हम दिल्ली में थे, तब चुनौतियां थोड़ी कम थीं। लेकिन जब हमने कोविड-19 महामारी के बाद इसके खिलाफ एक व्यवस्थित मुहिम शुरू की, तो देश भर से बड़ी संख्या में लोग हमारे साथ जुड़ने लगे। हर कोई अपना दर्द साझा करने लगा कि कैसे उन्हें समाज में हर कदम पर एक अदृश्य लड़ाई लड़नी पड़ रही है।"
महाराष्ट्र के तनुष सोनी ने निमय द्वारा स्थापित 'इंडियन एल्बिनिज्म फाउंडेशन' के साथ अपने कड़वे-मीठे अनुभवों को साझा किया है। तनुष लिखते हैं, "मुझे आज भी याद है जब स्कूल में पहली बार किसी ने मुझे 'भूत' कहकर चिढ़ाया था। उस पल मेरे पास दो ही रास्ते थे- या तो मैं रोता या फिर हंसकर बात टाल देता। मैंने हंसना चुना और उनसे पलटकर पूछा कि क्या भूत भी अपना होमवर्क करते हैं? बड़े होते हुए मैंने सीखा कि जिंदगी परछाइयों में छिपने के लिए नहीं, बल्कि खुलकर चमकने के लिए है। मैंने अपने हिस्से की हर चुनौती का सामना किया और हमेशा बाधाओं को अवसरों में बदलने का प्रयास किया।"
वह आगे बताते हैं, "शुरुआत में आत्मसम्मान को लेकर मेरे भीतर काफी संघर्ष था। लेकिन धीरे-धीरे मैंने लोगों से संवाद करने के अपने शौक को पहचाना, जो आगे चलकर मेरा सबसे बड़ा संबल बना। 'मॉडल यूनाइटेड नेशंस' (MUNs) और वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेने से मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और मेरा ध्यान अपनी असुरक्षा की भावना से हटकर मेरे जुनून की तरफ केंद्रित हो गया। मैं अब 'पब्लिक पॉलिसी' की उच्च शिक्षा के लिए 'द हेग' (The Hague, नीदरलैंड्स) आया। यह एक ऐसा सफर है जो कुछ साल पहले तक नामुमकिन सा लगता था।"
इस कहानी को याद करते हुए निधि बताती हैं, "ऐसी अनगिनत कहानियां बिखरी पड़ी हैं। ये बच्चे मानसिक रूप से कुशाग्र और तेज होते हैं। मेरा बेटा भी अपनी काबिलियत के दम पर आज ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी पहुंचा है। समाज को बस इन्हें सहहानुभूति की जगह दिल से स्वीकार करने और सपोर्ट करने की जरूरत है। यह कोई अछूत की बीमारी नहीं है। भले ही इन्हें कई तरह की शारीरिक बीमारियों का खतरा रहता हो, लेकिन इनके साथ रहने से आप पूरी तरह सुरक्षित हैं।"
20 वर्षों का अनुभव रखने वाले वरिष्ठ कैंसर सर्जन डॉ. जयेश शर्मा ने पत्रिका से बातचीत में कहा, "एल्बिनिज्म से प्रभावित लोगों की त्वचा अत्यधिक संवेदनशील होती है। सामान्य शब्दों में कहें तो उनकी स्किन में सूरज की हानिकारक पराबैंगनी किरणों (UV Rays) से बचने वाली प्राकृतिक सुरक्षात्मक परत (मेलेनिन) नहीं होती। इस वजह से ऐसे लोगों को सनबर्न और स्किन कैंसर का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में कई गुना अधिक रहता है।"
डॉ. शर्मा के अनुसार, यदि एल्बिनिज्म से पीड़ित किसी व्यक्ति की त्वचा पर कोई घाव या छाला बन रहा हो और वह उपचार के बाद भी 15 दिनों के भीतर ठीक न हो, तो बिना देरी किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। अगर समय रहते स्किन कैंसर की पहचान कर ली जाए, तो इसके पूरी तरह ठीक होने की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है।
दृष्टि संबंधी गंभीर रोग
मेलेनिन पिगमेंट आंखों की रेटिना के सही विकास के लिए बेहद जरूरी होता है। इसकी कमी के कारण आंखों की रोशनी कमजोर होना, आंखों की पुतलियों का लगातार और अनैच्छिक रूप से हिलना, तेज रोशनी के प्रति संवेदनशीलता और कुछ मामलों में पूर्ण दृष्टिहीनता जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
अंदरूनी अंगों से जुड़े विकार
इसके कुछ अत्यंत दुर्लभ प्रकारों (जैसे- हेरमांस्की-पुडलाक सिंड्रोम या HPS और चेडियाक-हिगाशी सिंड्रोम) में फेफड़ों की बीमारी, पाचन तंत्र की समस्याएं और रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बेहद कमजोर होने के कारण जानलेवा इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता है।
वर्ष 2023 में प्रकाशित एक शोध पत्र "The molecular landscape of oculocutaneous albinism in India…" के अनुसार, दिल्ली, मुंबई और बड़ौदा में जन्म दोषों पर किए गए एक व्यापक अध्ययन से पता चला है कि भारत में प्रति 13,500 जीवित जन्मों में से 1 बच्चा एल्बिनिज्म के साथ पैदा होता है। वहीं, मुंबई में हुए एक अन्य पुराने अध्ययन में यह आंकड़ा प्रति 7,856 जन्मों में 1 देखा गया था।
भारत सरकार ने 'दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016' (RPWD Act 2016) के तहत एल्बिनिज्म को आधिकारिक तौर पर दिव्यांगता की श्रेणी में शामिल किया है, जिससे इन्हें सरकारी लाभ मिल सकें।
हालांकि, वर्ष 2019 की एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट "Albinism-in-India_A-Situation-Analysis.pdf" के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इस सर्वेक्षण में शामिल एल्बिनिज्म से पीड़ित कोई भी व्यक्ति अपने कल्याण के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही किसी भी विशेष योजना, रियायत या कार्यक्रम के प्रति जागरूक नहीं पाया गया। इस आधार पर यह स्पष्ट है कि जमीनी स्तर पर व्यापक जागरूकता अभियान चलाना बेहद आवश्यक है।
निधि अंत में भावुक होते हुए कहती हैं, "इन बच्चों को भी समाज से उसी प्यार, गरिमा और सम्मान की दरकार है, जो किसी भी सामान्य बच्चे को दी जाती है। बदलाव की शुरुआत हमारे अपने नजरिए से होती है।"