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Kailash Mansarovar Yatra Row: नेपाल बनाम भारत और चीन! क्या है विवाद? पढ़िए पूरी कहानी

Kailash Mansarovar Lipulekh Pass: नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के नए बयान से एक बार कैलाश मानसरोवर यात्रा और लिपुलेख दर्रा फिर से सुर्खियों में आ गया है। यहां पढ़िए नेपाल का भारत और चीन के साथ लिपुलेख दर्रा को लेकर क्या विवाद है।

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May 04, 2026
कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर नेपाल ने आपत्ति शुरू की है। (Photo: AI)

Kailash Mansarovar Yatra : भारतीयों के कैलाश मानसरोवर तीर्थ यात्रा को लेकर नेपाल ने आपत्ति जताई है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के नेतृत्व वाली नई सरकार ने भारत और चीन द्वारा लिपुलेख दर्रा (Lipulekh Pass) के माध्यम से कैलाश मानसरोवर यात्रा आयोजित करने की योजना पर आपत्ति जताई है। भारत ने उनकी आपत्ति जताने के बाद कहा कि इस तरह के दावे 'न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित हैं।' भारत ने नेपाल को संवाद करने के लिए आमंत्रित किया है। आइए इस रिपोर्ट में जानते हैं कि कैलाश मानसरोवर यात्रा कब से शुरू होगी और नेपाल को इस धार्मिक यात्रा को लेकर भारत और चीन से क्या है दिक्कत?

1816 से हमारा है लिपुलेख दर्रा, नेपाल ने किया दावा

नेपाल लंबे समय से लिपुलेख दर्रा के जरिए भारत और चीन के व्यापार मार्ग के बतौर इस्तेमाल करने पर सवाल उठाता रहा है। वह भारत और चीन के इस दर्रा से होकर कैलाश मानसरोवर होकर धार्मिक यात्रा करने पर भी सवाल उठाता रहा है। नेपाल का विदेश मंत्रालय इस क्षेत्र को 1816 से अपना बता रहा है। उनका कहना है कि महाकाली नदी के पूर्व स्थित लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी क्षेत्र 1816 की सुगौली संधि (Sugauli Treaty of 1816) के अनुसार नेपाल के अभिन्न हिस्से हैं। नेपाल के विदेश मंत्रालय का कहना है कि नेपाल सरकार लगातार भारत सरकार से आग्रह करती रही है कि वह इस क्षेत्र में सड़क निर्माण या विस्तार, सीमा व्यापार और तीर्थयात्रा जैसी कोई गतिविधि न करे।

भारत, नेपाल और चीन के बीच तनाव की वजह

भारतीय श्रद्धालुओं के लिए कैलाश मानसरोवर अत्यंत पवित्र जगह मानी जाती है। केलाश मानसरोवर तीनों देशों के लिए सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह इन देशों के बीच जटिल भू-राजनीतिक संबंधों को भी उजागर करती है। ऐसे में नेपाल का इस यात्रा मार्ग पर आपत्ति जताए जाने से यह मुद्दा फिर से सुर्खियों में आ गया है। यह विवाद मुख्य रूप से सीमा निर्धारण, संप्रभुता, और क्षेत्रीय राजनीति से जुड़ा हुआ है।

लिपुलेख: विवादों का दर्रा

कैलाश मानसरोवर से जुड़े पूरे विवाद के केंद्र में लिपुलेख दर्रा है। यह दर्रा भारत, नेपाल और चीन त्रि-जंक्शन के पास स्थित है। भारत इसे उत्तराखंड राज्य का हिस्सा मानता है। वहीं नेपाल का यह दावा है कि यह क्षेत्र उसके दार्चुला जिले में आता है। नेपाल का यह दावा सुगौली संधि पर आधारित है। सुगौली संधि दावा के अनुसार, महाकाली नदी के पूर्व का क्षेत्र लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी क्षेत्र नेपाल का हिस्सा है। यह संधि 1816 में हुई है। वहीं भारत, नेपाल के इस दावे को बेबुनियाद बताता है। भारत का कहना है कि ऐतिहासिक और प्रशासनिक रिकॉर्ड इन क्षेत्रों को भारत का हिस्सा साबित करते हैं।

नेपाल की आपत्ति के मुख्य कारण

  • नेपाल का मानना है कि जिस मार्ग से कैलाश मानसरोवर यात्रा कराई जा रही है, वह उसकी संप्रभु भूमि से होकर गुजरता है। और बगैर उसकी सहमति के इस मार्ग का उपयोग करना उसकी क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन करना है।
  • कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भारत और चीन के बीच जो व्यवस्थाएं बनी हैं, उनमें नेपाल को शामिल नहीं किया गया। नेपाल इसे अपनी अनदेखी मानता है। वह इसे कूटनीतिक रूप से अस्वीकार्य मान रहा है।
  • नेपाल की आंतरिक राजनीति भी इस मुद्दे को जब-तब प्रभावित करती रहती है। वहां की सरकार और विभिन्न राजनीतिक दल इस मुद्दे पर एकजुट दिखाई देते हैं। राष्ट्रीय भावना और क्षेत्रीय अखंडता के सवाल पर सख्त रुख अपनाना वहां की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण हो गया है।

भारत 1950 से ही करता रहा है इस मार्ग का उपयोग

भारत ने लिपुलेख दर्रे को लेकर नेपाल की कैलाश मानसरोवर यात्रा और व्यापार को लेकर आपत्ति उठाने पर, हमेशा खारिज किया है। इस बारे में भारत सरकार का साफ कहना है कि लिपुलेख दर्रा कई दशकों से उपयोग में है और यह एक पारंपरिक मार्ग है। भारत का कहना है कि 1950 के दशक से ही इस मार्ग का उपयोग कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए किया जाता रहा है। भारत सरकार ने यह भी कहा कि नेपाल के हाल में उठाए गए दावे 'एकतरफा' हैं। उनके दावों का आधार कोई साक्ष्य नहीं है। भारत ने अपने इस दावे के बावजूद नेपाल को बातचीत के लिए आमंत्रित किया है।

भारत-चीन युद्ध के बाद बढ़ा इस क्षेत्र का रणनीतिक महत्व

भारत-नेपाल सीमा विवाद नया नहीं है। 19वीं सदी में हुई सुगौली संधि के बाद से ही सीमा निर्धारण को लेकर अस्पष्टता बनी रही। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद इस क्षेत्र का रणनीतिक महत्व और बढ़ गया। वर्ष 2015 में भारत और चीन के बीच एक समझौता हुआ था, जिसमें लिपुलेख दर्रे का उल्लेख हुआ था। नेपाल ने भारत और चीन के समझौते को लेकर आपत्ति जताई थी। भारत सरकार ने वर्ष 2020 में धारचूला से लिपुलेख तक सड़क निर्माण करने पर भी नेपाल ने विरोध किया और अपने नए राजनीतिक नक्शे में इन विवादित क्षेत्रों को शामिल कर लिया।

यह विवाद सिर्फ भारत और नेपाल के बीच सीमित नहीं है। इस विवाद में चीन भी शामिल है। कैलाश मानसरोवर तिब्बत (चीन) में स्थित है, इसलिए यात्रा का संचालन भारत और चीन के सहयोग से होता है। भारत, नेपाल और चीन को मिलकर इस मुद्दे को बातचीत के जरिये सुलझा लेना चाहिए और सीमा का स्पष्ट निर्धारण भी कर लेना चाहिए।

कितने श्रद्धालु हर साल पहुंचते हैं कैलाश मानसरोवर?

कोरोना काल के दौरान कैलाश मानसरोवर यात्रा वर्ष 2020 में बंद कर दी गई थी। यह यात्रा वर्ष 2024 तक बंद रही। यह यात्रा भारत सरकार हर साल आयोजित करती है। हालांकि 2015 से लेकर 2019 तक कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर प्रति वर्ष 1200 से 1600 भारतीय यात्री पहुंचते थे। वर्ष 2018 में यहां 1580 श्रद्धालु पहुंचे थे। वर्ष 2024 के बाद यात्रा शुरू करने के बाद श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। वर्ष 2025 में 750 धार्मिक यात्री कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर पहुंचे थे। वर्ष 2026 में एक हजार धार्मिक यात्री यात्रा पर जाएंगे।

मौजूदा विवाद के हो सकते हैं कई दूरगामी प्रभाव

  1. भारत-नेपाल के बीच हमेशा से घनिष्ठता रही है। अगर यह विवाद बातचीत से नहीं सुलझाया गया तो दोनों देशों के संबंधों में खटाई आ सकती है।
  2. हालांकि वर्तमान में यात्रा जारी रखने की योजना है, लेकिन यदि विवाद बढ़ता है तो भविष्य में यात्रा पर असर पड़ सकता है।
  3. कैलाश मानसरोवर हिमालयी क्षेत्र में है और यह पहले से काफी संवेदनशील है। ऐसे में किसी भी तरह का सीमा विवाद क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।
Published on:
04 May 2026 04:24 pm
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