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Dogs और Cats की बदल रही दुनिया! Pet Parents साथ में ले जा रहे कैफे, स्पा और डे-केयर!

Premium Pet Parenting: डॉग और कैट्स अब केवल पालतू जानवर नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य बन चुके हैं। बदलती लाइफस्टाइल और बढ़ते भावनात्मक जुड़ाव के बीच 'पेट पैरेंटिंग' का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है, जिसके साथ ग्रूमिंग, डे-केयर, स्पा और प्रीमियम पेट केयर सेवाओं की मांग भी लगातार बढ़ रही है।
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Jul 13, 2026
Pet Parenting
Pet Parenting: रायपुर में बढ़ रहा Pet Parenting का ट्रेंड(photo-patrika)

Pet Parenting: कुछ साल पहले तक डॉग और कैट्स को घर की सुरक्षा, शौक या बच्चों के मनोरंजन के लिए पाला जाता था, लेकिन अब राजधानी में उनकी पहचान पूरी तरह बदल चुकी है। आज वे परिवार का अभिन्न हिस्सा हैं और लोग खुद को उनका मालिक नहीं, बल्कि 'पेट पैरेंट' कहना पसंद करते हैं। बदलती लाइफस्टाइल, न्यूक्लियर फैमिली, अकेलेपन की बढ़ती समस्या और भावनात्मक जुड़ाव ने इस सोच को नई दिशा दी है।

अब पेट्स के लिए सिर्फ खाना और टीकाकरण ही पर्याप्त नहीं माना जाता। उनके लिए ग्रूमिंग, हेल्थकेयर, डे-केयर, ट्रेनिंग, स्पेशल डाइट, बर्थडे पार्टी, फोटोशूट और पेट-फ्रेंडली कैफे जैसी सुविधाएं भी तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं। शहर में पेट्स से जुड़ा पूरा सर्विस सेक्टर विकसित हो रहा है, जहां उनकी सुविधा और आराम को प्राथमिकता दी जा रही है।

Premium Pet Food: बदलती सोच, बदलते रिश्ते

रायपुर में युवाओं और नौकरीपेशा लोगों के बीच पेट्स पालने का चलन तेजी से बढ़ा है। पहले जहां लोग उन्हें "पालतू जानवर" कहते थे, वहीं अब उन्हें परिवार के सदस्य का दर्जा दिया जा रहा है। कई परिवारों में पेट्स की दिनचर्या भी घर के अन्य सदस्यों की तरह तय होती है।

उनके खाने का समय, वॉक, हेल्थ चेकअप और खेलने का समय नियमित रूप से निर्धारित किया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि न्यूक्लियर फैमिली और व्यस्त जीवनशैली के कारण लोग भावनात्मक जुड़ाव के लिए पेट्स को अपना साथी बना रहे हैं। यही वजह है कि उनके स्वास्थ्य, आराम और खुशियों पर पहले से कहीं अधिक ध्यान दिया जा रहा है।

जन्मदिन भी बन रहा पारिवारिक उत्सव

राजधानी में अब कई परिवार अपने डॉग और कैट्स का जन्मदिन पूरे उत्साह के साथ मना रहे हैं। लैब्राडोर 'बडी' के पेट पैरेंट अमन साहू बताते हैं कि हर साल उसका जन्मदिन परिवार और दोस्तों के साथ मनाया जाता है। पेट्स के लिए विशेष केक मंगवाया जाता है, घर को सजाया जाता है और कई बार फोटोशूट भी कराया जाता है।

अमन कहते हैं, "बडी हमारे लिए सिर्फ डॉग नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य है। उसके जन्मदिन का इंतजार पूरे परिवार को रहता है।" ऐसे आयोजनों की संख्या शहर में लगातार बढ़ रही है। सोशल मीडिया पर भी लोग अपने पेट्स के जन्मदिन, आउटिंग और रोजमर्रा के पलों को साझा कर रहे हैं।

ग्रूमिंग अब सिर्फ लग्जरी नहीं, जरूरत

पेट्स की देखभाल अब केवल नहलाने तक सीमित नहीं रह गई है। नियमित ग्रूमिंग, हेयर ट्रिमिंग, नेल कटिंग, ईयर क्लीनिंग, स्किन ट्रीटमेंट और स्पेशल शैंपू का उपयोग तेजी से बढ़ा है। पेट ग्रूमिंग सेंटरों के संचालकों का कहना है कि पहले महीने में गिने-चुने ग्राहक आते थे, जबकि अब नियमित रूप से अपॉइंटमेंट बुक होते हैं। कई लोग हर 20 से 30 दिन में अपने पेट्स की ग्रूमिंग कराते हैं ताकि संक्रमण और त्वचा संबंधी समस्याओं से बचाव हो सके।

उम्र बढ़ने के साथ बढ़ रहा हेल्थकेयर पर खर्च

12 वर्षीय लैब्राडोर 'रूबी' की देखभाल कर रहीं ज्योति मलिक बताती हैं कि उम्र बढ़ने के साथ उसे गठिया की समस्या हो गई है। अब नियमित दवाइयां, डिवॉर्मिंग, डॉक्टर की सलाह और समय-समय पर जांच जरूरी हो गई है। वे बताती हैं कि केवल इलाज और दवाइयों पर ही हर महीने करीब तीन हजार रुपये खर्च हो जाते हैं। उनका मानना है कि जैसे परिवार के बुजुर्गों की देखभाल जरूरी होती है, वैसे ही उम्रदराज पेट्स की भी विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है।

डे-केयर और बोर्डिंग की बढ़ी मांग

कामकाजी परिवारों की संख्या बढ़ने के साथ पेट डे-केयर और बोर्डिंग सेंटरों की मांग भी बढ़ रही है। सुबह ऑफिस जाने वाले लोग अपने पेट्स को डे-केयर में छोड़ते हैं, जहां उन्हें समय पर भोजन, खेलने की जगह, देखभाल और आराम मिलता है। यात्रा के दौरान भी लोग बोर्डिंग सुविधाओं का उपयोग कर रहे हैं, जिससे पेट्स को सुरक्षित वातावरण मिल सके।

तनाव कम करने में निभा रहे अहम भूमिका

कई पेट पैरेंट्स का कहना है कि पेट्स उनके लिए तनाव कम करने का सबसे बड़ा माध्यम बन गए हैं। फ्लफी के पेट पैरेंट बताते हैं कि दिनभर की भागदौड़ के बाद जब वे घर लौटते हैं तो फ्लफी के साथ कुछ समय बिताने से मानसिक तनाव कम हो जाता है। उसके साथ खेलना, वॉक पर जाना और समय बिताना पूरे दिन की थकान दूर कर देता है। मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि पेट्स के साथ समय बिताने से अकेलेपन की भावना कम होती है और भावनात्मक संतुलन बेहतर होता है।

हर महीने हजारों रुपये का खर्च

अब पेट पैरेंटिंग सिर्फ शौक तक सीमित नहीं रही, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी बन गई है। राजधानी में अधिकांश पेट पैरेंट्स अपने डॉग और कैट्स की देखभाल पर हर महीने औसतन 3 हजार से 8 हजार रुपये तक खर्च कर रहे हैं। इस राशि में प्रीमियम फूड, नियमित वैक्सीनेशन, डिवॉर्मिंग, मेडिकल चेकअप, ग्रूमिंग, दवाइयां, खिलौने, एसेसरीज, ट्रेनिंग और डे-केयर या बोर्डिंग जैसी सुविधाएं शामिल हैं।

यदि पेट बीमार हो जाए या उसे विशेष इलाज की जरूरत पड़े, तो यह मासिक खर्च इससे कहीं अधिक बढ़ जाता है। यही वजह है कि अब लोग अपने पेट्स को परिवार का सदस्य मानते हुए उनके स्वास्थ्य, पोषण और बेहतर लाइफस्टाइल पर पहले से कहीं ज्यादा निवेश कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर भी छाए पेट्स

अब कई पेट्स के अपने इंस्टाग्राम और फेसबुक अकाउंट हैं। उनके फोटोशूट, वीडियो और डेली रूटीन सोशल मीडिया पर साझा किए जाते हैं। कई पेट इंफ्लुएंसर्स के हजारों फॉलोअर्स भी हैं। शहर में प्रोफेशनल पेट फोटोग्राफी का चलन भी तेजी से बढ़ रहा है।

ट्रेनिंग और बिहेवियर एक्सपर्ट्स की बढ़ी मांग

पेट पैरेंट्स अब केवल पेट्स पालना ही नहीं चाहते, बल्कि उन्हें बेहतर व्यवहार और अनुशासन भी सिखाना चाहते हैं। इसके लिए प्रोफेशनल डॉग ट्रेनर और बिहेवियर एक्सपर्ट्स की सेवाएं ली जा रही हैं। बेसिक कमांड, सोशल बिहेवियर और ओबीडिएंस ट्रेनिंग की मांग लगातार बढ़ रही है।

Updated on:
13 Jul 2026 06:06 pm
Published on:
13 Jul 2026 05:55 pm