
Pill Popping Side Effects: सोशल मीडिया रील स्क्रॉल करते हुए जब हम फिटनेस इन्फ्लुएंसर्स को रंग-बिरंगी गोलियों का 'कॉकटेल' गटकते देखते हैं, तो हमें लगता है कि शायद सुपर-हेल्दी बनने का एकमात्र सीक्रेट यही है। क्या आप भी इसी जाल में फंस चुके हैं? 'फिटनेस फ्रीक' दिखने की इसी अंधी होड़ में आज हर दूसरा शख्स बिना डॉक्टरी पर्चे के अपनी मर्जी से सप्लीमेंट्स ले रहा है। लेकिन जरा ठहरिए! सेहत दुरुस्त करने का यह शॉर्टकट आपको सीधे अस्पताल के आईसीयू (ICU) तक पहुंचा सकता है। मेडिकल साइंस की मानें तो बिना सोचे-समझे लिया गया विटामिंस का यह ओवरडोज़ शरीर के भीतर एक 'साइलेंट किलर' की तरह काम करता है। आइए विस्तार से समझते हैं कि यह 'पिल-पॉपिंग कल्चर' (Pill Popping Culture) आपकी सेहत के साथ क्या खिलवाड़ कर रहा है।
विटामिंस मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं वॉटर-सॉल्यूबल (पानी में घुलनशील) और फैट-सॉल्यूबल (वसा में घुलनशील)। विटामिन-सी और बी-कॉम्प्लेक्स पानी में घुलनशील होते हैं, इसलिए अगर आप इन्हें जरूरत से थोड़ा ज्यादा भी ले लें, तो शरीर इन्हें यूरिन के जरिए बाहर निकाल देता है (हालांकि इससे किडनी पर एक्स्ट्रा दबाव जरूर पड़ता है)।
जब आप इनकी हाई-डोज रोज लेने लगते हैं, तो यह शरीर से बाहर नहीं निकल पाते, बल्कि आपके लिवर और फैटी टिश्यूज में जमा होने लगते हैं। उदाहरण के लिए, शरीर में विटामिन-D की अत्यधिक मात्रा (Toxicity) बढ़ने से खून में कैल्शियम का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाता है (Hypercalcemia)। इसके कारण किडनी में पथरी (Kidney Stones), मतली, कमजोरी और दिल की धड़कन अनियंत्रित होने जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। वहीं, विटामिन-A का ओवरडोज लिवर को हमेशा के लिए डैमेज कर सकता है।
हमारा शरीर एक बेहद जटिल और संतुलित मशीन है। जब आप एक साथ कई सारे मिनरल्स के कैप्सूल खाते हैं, तो वे शरीर के अंदर जाकर अवशोषित (Absorb) होने के लिए एक-दूसरे से मुकाबला करने लगते हैं।
आजकल 'पिल-पॉपिंग' (बात-बात पर विटामिंस की गोली खाना) का ट्रेंड बहुत बढ़ गया है। आपके क्लिनिक में ऐसे कितने मरीज आते हैं जो बिना जरूरत सप्लीमेंट्स खाकर बीमार पड़ रहे हैं?
पिछले कुछ सालों में मेरे क्लिनिक में ऐसे मरीजों की तादाद 30 से 40 फीसदी तक बढ़ी है, जो बिना किसी डॉक्टरी सलाह के सिर्फ सोशल मीडिया या विज्ञापनों को देखकर सप्लीमेंट्स खा रहे हैं। लोग थकान, सुस्ती या हल्के सिरदर्द को भी सीधे विटामिन की कमी मान लेते हैं और खुद ही 'पिल-पॉपिंग' शुरू कर देते हैं। बिना जांच के गोलियां खाने का यह ट्रेंड अब एक मेडिकल इमरजेंसी बनता जा रहा है। मेरे पास आने वाले कई मरीजों में विटामिन-D के क्रोनिक ओवरडोज के कारण शरीर में कैल्शियम का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ा (हाइपरकैल्सीमिया) मिलता है, जिससे किडनी स्टोन, गंभीर मतली और घबराहट की शिकायत होती है। वहीं, जिंक, आयरन और कैल्शियम के अंधाधुंध कॉकटेल से पेट के अल्सर, गंभीर एसिडिटी और लिवर एंजाइम्स के असंतुलित होने जैसी समस्याएं देखी जा रही हैं। लोग सप्लीमेंट्स को टॉफी समझने की भूल कर रहे हैं, जो सीधे उनकी किडनी और लिवर को क्रोनिक डैमेज की तरफ धकेल रहा है।
सोशल मीडिया पर रील्स देखकर लोग खुद ही अपना डाइट चार्ट और सप्लीमेंट तय कर रहे हैं। इस 'इन्फ्लुएंसर-ड्रिवन' हेल्थ ट्रेंड पर आपकी क्या राय है?
सोशल मीडिया रील देखकर खुद अपना डॉक्टर बनना एक बेहद खतरनाक और आत्मघाती हेल्थ ट्रेंड है। फिटनेस इन्फ्लुएंसर्स अक्सर मेडिकल एक्सपर्ट नहीं होते, वे केवल ब्रांड्स के विज्ञापन या व्यूज पाने के लिए बिना किसी वैज्ञानिक आधार के फैंसी डाइट चार्ट और सप्लीमेंट्स प्रमोट करते हैं। हर व्यक्ति की बॉडी टाइप, ब्लड प्रोफाइल और मेडिकल कंडीशन अलग होती है। जो डाइट या सप्लीमेंट किसी एक के लिए फायदेमंद है, वह दूसरे के लिवर और किडनी को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। बिना क्वालिफाइड डॉक्टर की सलाह के रील्स देखकर सेहत के फैसले लेना सीधे गंभीर बीमारियों को न्यौता देना है।
जिंक, कैल्शियम और आयरन जैसे मिनरल्स को जब एक साथ 'कॉकटेल' की तरह लिया जाता है, तो ये शरीर के अंदर जाकर एक-दूसरे के असर को कैसे खत्म करते हैं?
हमारा शरीर एक बार में सीमित मात्रा में ही मिनरल्स को अवशोषित कर सकता है। जिंक, कैल्शियम और आयरन, तीनों ही शरीर में सोखे जाने के लिए एक ही 'बायोलॉजिकल पाथवे' और सेलुलर रिसेप्टर्स का इस्तेमाल करते हैं। जब इन्हें एक साथ 'कॉकटेल' की तरह लिया जाता है, तो इनके बीच अवशोषित होने की होड़ मच जाती है, जिसे मेडिकल साइंस में कंपीटिटिव इनहिबिशन (Competitive Inhibition) कहते हैं। उदाहरण के लिए, कैल्शियम की भारी मात्रा आयरन और जिंक के अवशोषण को पूरी तरह ब्लॉक कर देती है। नतीजा यह होता है कि सप्लीमेंट्स खाने के बावजूद शरीर को उनका कोई फायदा नहीं मिलता और वे बिना काम आए बाहर निकल जाते हैं।
क्या सप्लीमेंट्स का अंधाधुंध इस्तेमाल वाकई हमारे लिवर और किडनी को फेल कर सकता है? इसके शुरुआती लक्षण या वॉर्निंग साइन्स (Warning Signs) क्या होते हैं?
सप्लीमेंट्स का अंधाधुंध इस्तेमाल वाकई लिवर और किडनी को फेल कर सकता है। जब हम जरूरत से ज्यादा विटामिंस या हैवी मिनरल्स लेते हैं, तो इन्हें फिल्टर करने के लिए लिवर और किडनी को 'ओवरटाइम' करना पड़ता है। खासकर विटामिन A, D और E जैसे फैट-सॉल्यूबल विटामिंस लिवर में जमा होकर 'टॉक्सिक ओवरलोड' पैदा करते हैं, जिससे लिवर टिश्यूज डैमेज होने लगते हैं। वहीं, अत्यधिक कैल्शियम और विटामिन C किडनी में जमा होकर दर्दनाक स्टोन बनाते हैं और लंबे समय में किडनी फिल्टरेशन सिस्टम को ठप कर देते हैं।
इसके शुरुआती वॉर्निंग साइन्स (लक्षण) ये हैं:
क्या सप्लीमेंट्स जिंदगी भर खाने के लिए होते हैं? एक सामान्य विटामिन कोर्स की सही अवधि (Duration) क्या होनी चाहिए?
सप्लीमेंट्स जिंदगी भर खाने के लिए नहीं होते हैं। ये भोजन का विकल्प नहीं, बल्कि शरीर में हुई किसी अस्थायी कमी (Deficiency) को पूरा करने का जरिया हैं। एक सामान्य विटामिन कोर्स की सही अवधि मुख्य रूप से 2 से 3 महीने (8 से 12 हफ्ते) की होनी चाहिए। इस अवधि के बाद मरीज को दोबारा ब्लड टेस्ट करवाना चाहिए ताकि यह देखा जा सके कि शरीर में विटामिन का स्तर सामान्य हुआ है या नहीं। जैसे ही विटामिंस का लेवल नॉर्मल हो जाए, सप्लीमेंट्स तुरंत बंद कर देने चाहिए और पोषक तत्वों के लिए नेचुरल डाइट पर शिफ्ट हो जाना चाहिए।