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Narcolepsy: दिन में अचानक आ जाती है नींद; कहीं आप ‘नार्कोलेप्सी’ के शिकार तो नहीं? जानें लक्षण और इलाज

Narcolepsy : क्या आपको भी काम करते या बात करते हुए अचानक नींद का झटका आ जाता है? यह सिर्फ सामान्य थकान नहीं, बल्कि नार्कोलेप्सी नामक न्यूरोलॉजिकल बीमारी हो सकती है। जानिए इसके लक्षण, कारण और बचाव के उपाय।

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Jun 09, 2026
Narcolepsy Sleep Attack Excessive Daytime Sleepiness Sleep wake cycle Chronic Neurological Disorder
क्या आपको भी बैठे-बैठे नींद आ जाती है? (Photo: AI Generated)

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में थकान होना और नींद आना बेहद आम बात है। अक्सर लोग रात में देर तक जागने या काम के तनाव को दिन में आने वाली नींद की वजह मान लेते हैं। लेकिन क्या कभी आपके साथ ऐसा हुआ है कि आप किसी से बहुत जरूरी बात कर रहे हों, ऑफिस की मीटिंग में हों, या फिर खाना खा रहे हों और अचानक आपको इतनी तेज नींद आ जाए कि आप खुद को रोक ही न पाएं?

दो दशक से अधिक अनुभवी डॉ. सुनील शर्मा (मनोचिकित्सक) कहना है कि इसे महज 'थकान' समझकर नजरअंदाज करने की गलती बिल्कुल न करें। यह नार्कोलेप्सी (Narcolepsy) नामक एक गंभीर क्रोनिक न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर (Chronic Neurological Disorder) हो सकता है। यह एक ऐसी स्थिति है जो इंसान के पूरे सामाजिक, पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन को अस्त-व्यस्त कर सकती है। आइए विस्तार से समझते हैं कि नार्कोलेप्सी क्या है, इसके पीछे का विज्ञान क्या है और इससे कैसे यह ठीक हो सकता है।

What is Narcolepsy: नार्कोलेप्सी क्या है?

नार्कोलेप्सी दिमाग से जुड़ा एक ऐसा स्लीप डिसऑर्डर (Sleep Disorder) है, जो हमारे सोने और जागने के चक्र (Sleep-Wake Cycle) को पूरी तरह से असंतुलित कर देता है। इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति का दिमाग यह तय नहीं कर पाता कि उसे कब जागना है और कब सोना है। इस स्थिती में मरीज को दिन के समय अत्यधिक नींद आती है, जिसे 'स्लीप अटैक' (Sleep Attack) कहा जाता है। यह अटैक इतना अचानक और तीव्र होता है कि व्यक्ति चाहकर भी अपनी आंखें खुली नहीं रख पाता। दुनिया भर में लाखों लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण अक्सर लोग इसे 'आलस' समझ लेते हैं।

Symptoms of Narcolepsy: नार्कोलेप्सी के 5 प्रमुख लक्षण

  • दिन में अत्यधिक नींद आना (Excessive Daytime Sleepiness EDS) : यह नार्कोलेप्सी का सबसे पहला और अनिवार्य लक्षण है। पीड़ित व्यक्ति को पूरे दिन हर समय नींद और सुस्ती महसूस होती रहती है। वे चाहे रात में 8 से 10 घंटे की पूरी नींद ही क्यों न ले लें, सुबह उठने के कुछ देर बाद ही उन्हें फिर से भारी नींद आने लगती है। एकाग्रता में कमी और याददाश्त धुंधली होना भी इसी का हिस्सा हैं।
  • कैटैप्लेक्सिया (Cataplexy) : मांसपेशियों का अचानक कमजोर होना यह इस बीमारी का सबसे डरावना लक्षण माना जाता है। कैटैप्लेक्सिया में व्यक्ति के शरीर की मांसपेशियां अचानक अपनी ताकत खो देती हैं और पूरी तरह से ढीली पड़ जाती हैं। यह स्थिति अक्सर अचानक पैदा हुई तीव्र भावनाओं (Strong Emotions) जैसे बहुत तेज हंसने, अचानक गुस्सा होने, डरने या हैरान होने पर ट्रिगर होती है। इसके दौरे के दौरान मरीज का जबड़ा लटक सकता है, सिर एक तरफ झुक सकता है या घुटने मुड़ सकते हैं, जिससे वह गिर भी जाता है। हालांकि, इस दौरान मरीज पूरी तरह होश में रहता है।
  • स्लीप पैरालिसिस (Sleep Paralysis) : सोते समय या नींद से ठीक जागते समय, कुछ सेकंड या मिनटों के लिए मरीज का शरीर पूरी तरह से सुन्न हो जाता है। वह न तो हिल-डुल पाता है और न ही कुछ बोल पाता है। ऐसा महसूस होता है जैसे किसी ने शरीर को जकड़ लिया हो। हालांकि यह स्थिति जानलेवा नहीं होती, लेकिन मरीज के लिए बेहद डरावनी होती है।
  • हेलुसिनेशन (Hallucinations): नार्कोलेप्सी से पीड़ित लोगों को सोते समय (Hypnagogic) या जागते समय (Hypnopompic) बहुत अजीब और डरावनी चीजें दिखाई या सुनाई देती हैं, जो वास्तव में वहां होती ही नहीं हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उनका दिमाग जागने और गहरी नींद (REM Sleep) के बीच की स्थिति में फंसा होता है, जिससे सपने और हकीकत आपस में मिक्स हो जाते हैं।
  • रात की नींद का बार-बार टूटना (Disrupted Nighttime Sleep) : यह एक बड़ा विरोधाभास है कि जो व्यक्ति दिन में इतनी गहरी नींद में सो जाता है, उसे रात में सोने में बहुत परेशानी होती है। नार्कोलेप्सी के मरीजों की रात की नींद बहुत कच्ची होती है। वे रात में बार-बार जागते हैं, जिससे उनका स्लीप पैटर्न और ज्यादा बिगड़ जाता है।

Types of Narcolepsy: नार्कोलेप्सी के प्रकार

  • टाइप 1 नार्कोलेप्सी (Narcolepsy Type 1): इस प्रकार के मरीजों में अत्यधिक दिन की नींद के साथ-साथ कैटैप्लेक्सिया के लक्षण भी पाए जाते हैं। इसके मरीजों में दिमाग के भीतर एक खास केमिकल की भारी कमी होती है।
  • टाइप 2 नार्कोलेप्सी (Narcolepsy Type 2): इस श्रेणी के मरीजों को दिन में स्लीप अटैक तो आते हैं, लेकिन उन्हें कैटैप्लेक्सिया (मांसपेशियों की कमजोरी) का सामना नहीं करना पड़ता। आमतौर पर इनमें केमिकल का स्तर सामान्य होता है।

पत्रिका के सवाल जबाव डॉ. सुनील शर्मा (मनोचिकित्सक) के साथ

सवाल- नार्कोलेप्सी को अक्सर लोग 'आलस' या 'कमजोरी' समझ लेते हैं। एक डॉक्टर के तौर पर आप आलस और नार्कोलेप्सी के बीच की बारीक लाइन को कैसे समझाएंगे?

डॉक्टर का जवाब-  आलस और नार्कोलेप्सी में जमीन-आसमान का अंतर है। आलस एक 'चॉइस' या आदत है, जहां व्यक्ति इच्छाशक्ति की कमी के कारण काम टालता है, लेकिन वह पूरी तरह होश में और सतर्क रहता है। इसके विपरीत, नार्कोलेप्सी दिमाग का एक न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है। इसमें मरीज का अपनी नींद पर कोई नियंत्रण नहीं होता। दिमाग में 'हाइपोक्रिटिन' केमिकल की कमी के कारण उसे अचानक ऐसे तीव्र 'स्लीप अटैक' आते हैं कि वह बातचीत करने, खाना खाने या गाड़ी चलाने के दौरान भी सो जाता है। इसे आलस समझना मरीज के साथ अन्याय है; यह इच्छाशक्ति की नहीं, बल्कि न्यूरोलॉजिकल सिस्टम की विफलता है।

सवाल-दैनिक जीवन पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?

डॉक्टर का जवाब- नार्कोलेप्सी केवल एक शारीरिक बीमारी नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के मानसिक और सामाजिक जीवन पर गहरा आघात करती है।

  • करियर और पढ़ाई पर असर: ऑफिस की मीटिंग्स या क्लासरूम में अचानक सो जाने के कारण ऐसे लोगों को अक्सर 'कामचोर', 'आलसी' या 'लापरवाह' समझ लिया जाता है। इससे उनकी नौकरी और पढ़ाई पर बुरा असर पड़ता है।
  • दुर्घटनाओं का खतरा: गाड़ी चलाते समय, सड़क पार करते समय या रसोई में काम करते समय अचानक स्लीप अटैक आना जानलेवा साबित हो सकता है।
  • मानसिक तनाव और अवसाद: समाज द्वारा गलत समझे जाने और बीमारी के डर के कारण मरीज अक्सर अकेलेपन, एंग्जायटी (Anxiety) और डिप्रेशन (Depression) का शिकार हो जाते हैं।

सवाल-हमारे देश में इस बीमारी को लेकर जागरूकता बहुत कम है। आपके पास आने वाले मरीजों में इसके शुरुआती लक्षण आमतौर पर क्या देखे जाते हैं? क्या बच्चों और वयस्कों में इसके लक्षण अलग होते हैं?

डॉक्टर का जवाब- भारत में जागरूकता की कमी के कारण मरीज हमारे पास तब आते हैं, जब स्थिति गंभीर हो जाती है। वयस्कों में इसका शुरुआती लक्षण 'अत्यधिक दिन की नींद' (EDS) है, जहां रात की पूरी नींद के बाद भी दिन में अचानक स्लीप अटैक आते हैं। साथ ही, हंसने या गुस्सा होने पर घुटने मुड़ना या जबड़ा लटकना (कैटैप्लेक्सिया) देखा जाता है। बच्चों और वयस्कों के लक्षणों में अंतर होता है। वयस्कों में जहां मांसपेशियों की कमजोरी दिखती है, वहीं बच्चों में कैटैप्लेक्सिया के लक्षण चेहरे पर ज्यादा दिखते हैं जैसे बार-बार जीभ बाहर निकलना या पलकें झपकना। सबसे बड़ा अंतर यह है कि वयस्क सुस्त दिखते हैं, जबकि नार्कोलेप्सी से पीड़ित बच्चे नींद से लड़ने के लिए अचानक अत्यधिक सक्रिय (Hyperactive) या चिड़चिड़े हो जाते हैं, जिसे अक्सर लोग एडीएचडी (ADHD) या व्यवहारिक समस्या मान लेते हैं।

सवाल-नार्कोलेप्सी के निदान के लिए किए जाने वाले टेस्ट कैसे होते हैं? क्या भारत के टियर-2 या टियर-3 शहरों में ये टेस्ट और स्लीप लैब्स आसानी से उपलब्ध हैं?

डॉक्टर का जवाब- नार्कोलेप्सी की जांच के लिए दो मुख्य टेस्ट होते हैं। पहला है पॉलीसोम्नोग्राफी (Polysomnography), जिसमें मरीज को रातभर स्लीप लैब में सुलाकर उसके ब्रेन वेव्स, ऑक्सीजन और हार्ट रेट की मॉनिटरिंग की जाती है। इसके ठीक अगले दिन MSLT (मल्टीपल स्लीप लेटेंसी टेस्ट) होता है, जिसमें दिन के समय मरीज को हर दो घंटे में 5 बार झपकी (Nap) लेने को कहा जाता है, ताकि यह देखा जा सके कि वह कितनी जल्दी गहरी नींद (REM स्टेज) में पहुंचता है। जहां तक उपलब्धता का सवाल है, भारत के टियर-1 शहरों (जैसे दिल्ली, मुंबई) में यह सुविधाएं आम हैं। टियर-2 शहरों (जैसे जयपुर, इंदौर, नागपुर) के बड़े कॉर्पोरेट और सरकारी मेडिकल कॉलेजों में भी अब स्लीप लैब्स तेजी से उपलब्ध हो रही हैं। हालांकि, टियर-3 (छोटे शहरों) में इन लैब्स की काफी कमी है, लेकिन राहत की बात यह है कि अब पोर्टेबल मशीनों के जरिए 'होम स्लीप स्टडी' (At-Home Sleep Test) का विकल्प छोटे शहरों और कस्बों तक भी पहुंचने लगा है।

सवाल-इस बीमारी में मरीज ऑफिस, स्कूल या बातचीत के बीच में सो जाता है, तो उसे समाज और परिवार में किस तरह के मानसिक तनाव (Stigma) का सामना करना पड़ता है?

डॉक्टर का जवाब- नार्कोलेप्सी के मरीज शारीरिक से ज्यादा मानसिक प्रताड़ना झेलते हैं। ऑफिस, स्कूल या बातचीत के बीच में सो जाने के कारण समाज उन्हें 'कामचोर', 'आलसी', 'नशेड़ी' या 'लापरवाह' का टैग दे देता है। स्कूलों में ऐसे बच्चों को शिक्षकों की डांट और सहपाठियों के मजाक का सामना करना पड़ता है, जिससे उनका आत्मविश्वास टूट जाता है। कार्यस्थलों पर उन्हें अक्षम मानकर नौकरी से निकाल दिया जाता है। इस सामाजिक तिरस्कार (Stigma) और अपनों के अविश्वास के कारण मरीज गहरे अकेलेपन, हीन भावना, एंग्जायटी और डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। वे खुद को समाज से काट लेते हैं, जो इस बीमारी को और गंभीर बना देता है।

सवाल-'कैटैप्लेक्सिया' (भावनाओं के कारण मांसपेशियों का ढीला पड़ना) के मरीजों को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में किन बड़ी चुनौतियों और खतरों का सामना करना पड़ता है?

डॉक्टर का जवाब- कैटैप्लेक्सिया के मरीजों की जिंदगी हर पल एक अदृश्य खतरे में बीतती है। चूंकि यह तीव्र भावनाओं जैसे अत्यधिक हंसने, गुस्सा होने या अचानक चौंकने से ट्रिगर होता है, इसलिए मरीज हमेशा डरा रहता है। सबसे बड़ी चुनौती और खतरा रोजमर्रा के कामों में है जैसे सड़क पार करते समय, सीढ़ियां चढ़ते समय, रसोई में आग या चाकू के पास काम करते समय, या गाड़ी चलाते समय अगर अचानक मांसपेशियों का कंट्रोल खो जाए, तो यह जानलेवा दुर्घटना का कारण बन सकता है। इस डर से मरीज अपनी भावनाओं को दबाने लगते हैं। वे हंसने या सामाजिक होने से कतराते हैं, जिससे उनका पूरा सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन फ्रीज होकर रह जाता है।

सवाल-नार्कोलेप्सी का कोई परमानेंट इलाज (Cure) नहीं है। ऐसे में मेडिकल साइंस दवाओं के जरिए मरीज की लाइफ क्वालिटी को कितना बेहतर बना पाता है? क्या दवाइयों के लंबे समय तक इस्तेमाल के कोई गंभीर साइड-इफेक्ट्स भी हैं?

डॉक्टर का जवाब- यह सच है कि नार्कोलेप्सी का कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन मेडिकल साइंस दवाओं के जरिए मरीज की लाइफ क्वालिटी को 80 से 90 प्रतिशत तक बेहतर बना देता है। सही थेरेपी से मरीज सामान्य रूप से पढ़ाई, नौकरी और रूटीन काम कर पाते हैं। इलाज में मुख्य रूप से दो तरह की दवाएं दी जाती हैं। दिन की सतर्कता बढ़ाने वाले स्टिमुलेंट्स और कैटैप्लेक्सिया को रोकने वाले एंटी-डिप्रेसेंट्स। लंबे समय तक इनके इस्तेमाल से कुछ साइड-इफेक्ट्स जैसे सिरदर्द, घबराहट, दिल की धड़कन तेज होना या ब्लड प्रेशर बढ़ना और अनिद्रा (Insomnia) हो सकते हैं। इसीलिए, इन दवाओं को सख्त डॉक्टर की निगरानी और रेगुलर फॉलो-अप के साथ ही लेना चाहिए ताकि डोज को बैलेंस रखा जा सके।

सवाल-दवाओं के अलावा 'शेड्यूल्ड नैप्स' (Scheduled Naps) और डाइट इस बीमारी को मैनेज करने में कितनी मददगार साबित होती हैं?

डॉक्टर का जवाब- दवाओं के साथ लाइफस्टाइल मैनेजमेंट नार्कोलेप्सी को कंट्रोल करने में 50 प्रतिशत तक मददगार है। दिन में 15-20 मिनट की 2-3 'शेड्यूल्ड नैप्स' (तय समय पर छोटी नींद) लेने से अचानक आने वाले स्लीप अटैक का खतरा बहुत कम हो जाता है और दिमाग रीचार्ज होता है। डाइट की बात करें, तो भारी कार्बोहाइड्रेट (जैसे चावल, हैवी फूड) दिन की सुस्ती को बढ़ाते हैं। इसलिए मरीजों को लो-कार्ब और हाई-प्रोटीन डाइट लेनी चाहिए। सोने से ठीक पहले कैफीन और अल्कोहल से पूरी तरह बचना चाहिए। साथ ही, दिन में कम से कम 20-30 मिनट का हल्का व्यायाम या वॉक करने से रात की नींद बेहतर होती है और दिन की सतर्कता बढ़ती है।

Published on:
09 Jun 2026 12:29 pm