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Genome Test : प्रिस्क्रिप्शन से पहले जीनोम टेस्ट; क्या इंडियन मेडिकल सिस्टम में आने वाला हैं नया रिवॉल्यूशन?

Genome Test : जानिए कैसे जीनोम टेस्टिंग की मदद से अब मरीजों को इम्यूनोथेरेपी और टारगेटेड थेरेपी जैसी सटीक दवाएं दी जा रही हैं।

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Jun 02, 2026
Genome test Personalized Medicine Genome Testing Barriers
कैंसर मरीजों के लिए वरदान है ये टेस्ट!( Photo: AI Generated)

Genome Test In India : हमारे देश में जब भी कोई बीमार होता है, तो डॉक्टर के पास जाना, लक्षण बताना और प्रिस्क्रिप्शन लेकर मेडिकल स्टोर से दवाई लाना एक आम प्रक्रिया है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जो दवाई एक व्यक्ति को बिल्कुल ठीक कर देती है, वही दवाई दूसरे व्यक्ति पर बेअसर क्यों रहती है? या फिर कुछ लोगों को आम दवाइयों से भी भयानक साइड-इफेक्ट्स क्यों हो जाते हैं?

इसका जवाब किसी बीमारी में नहीं, बल्कि हमारे शरीर के सबसे बुनियादी हिस्से यानी हमारे डीएनए (DNA) और जीन्स (Genes) में छिपा है।

15 वर्ष के अनुभवी डॉ. निखिल मेहता (वरिष्ठ कैंसर सर्जन) ने बताया, भारतीय चिकित्सा प्रणाली (Indian Medical System) में अब एक नया और बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। देश के बड़े-बड़े कॉर्पोरेट और प्रीमियम सरकारी व निजी अस्पतालों के टॉप-टियर डॉक्टर्स अब दवाई लिखने से पहले मरीजों को 'जीनोम टेस्ट' करवाने की सलाह दे रहे हैं। यह हेल्थकेयर सेक्टर में एक ऐसी क्रांति है जो आने वाले समय में इलाज के तरीके को पूरी तरह बदल देगी।

फार्माकोजीनोमिक्स: दवाई और डीएनए का रिश्ता

फार्माकोजीनोमिक्स (Pharmacogenomics) दो शब्दों से मिलकर बना है फार्माकोलॉजी (दवाइयों का विज्ञान) और जीनोमिक्स (जीन्स का अध्ययन)। जब हम कोई दवाई खाते हैं, तो हमारा लिवर और शरीर के एंजाइम्स उसे तोड़ते हैं ताकि शरीर उसका इस्तेमाल कर सके। लेकिन इन एंजाइम्स को बनाने का निर्देश हमारे जीन्स देते हैं। अगर किसी के जीन में कोई बदलाव या म्यूटेशन है, तो हो सकता है कि उसके शरीर में वह एंजाइम बने ही न, या फिर बहुत ज्यादा बन जाए।

इसके आधार पर मरीजों को मुख्य रूप से तीन कैटेगरीज में बांटा जा सकता है:

  • पुअर मेटाबोलाइजर्स (Poor Metabolizers): इसमें शरीर दवाई को पचा या तोड़ नहीं पाता, जिससे दवाई असर नहीं करती या शरीर में जमा होकर टॉक्सिसिटी (जहर या हैवी साइड-इफेक्ट) बनाती है।
  • नॉर्मल मेटाबोलाइजर्स (Normal Metabolizers): इसमें दवाइयां स्टैंडर्ड डोज के अनुसार बिल्कुल सही और सटीक असर करती हैं।
  • अल्ट्रा-रैपिड मेटाबोलाइजर्स (Ultra-rapid Metabolizers): इसमें शरीर दवाई को इतनी तेजी से खत्म कर देता है कि दवाई को अपना असर दिखाने का मौका ही नहीं मिलता।

भारतीय क्लीनिकल प्रैक्टिस में इसका बढ़ता इस्तेमाल

  • कार्डियोलॉजी (दिल की बीमारियां) : दिल के मरीजों में जब एंजियोप्लास्टी (Angioplasty) की जाती है और स्टेंट (Stent) डाला जाता है, तो ब्लड क्लॉट्स (खून के थक्के) को रोकने के लिए 'क्लोपिडोग्रेल' (Clopidogrel) नाम की दवाई सबसे आम तौर पर लिखी जाती है। मानव शरीर में एक जीन होता है जिसे CYP2C19 कहते हैं। अगर कोई मरीज इस जीन का 'पुअर मेटाबोलाइजर' है, तो क्लोपिडोग्रेल उसके शरीर में एक्टिव रूप में बदल ही नहीं पाएगी। इसका मतलब यह हुआ कि स्टेंट लगने के बाद भी उस मरीज को दवाई का कोई फायदा नहीं मिल रहा और उसे दूसरा हार्ट अटैक आने का खतरा उतना ही बना रहता है। इसलिए अब डॉक्टर्स स्टेंट लगाने से पहले या तुरंत बाद यह टेस्ट करवाना पसंद कर रहे हैं।
  • ऑन्कोलॉजी (कैंसर का इलाज) : कैंसर की कीमोथेरेपी (Chemotherapy) बेहद आक्रामक और संवेदनशील होती है। किस मरीज को कौन सी कीमो ड्रग कितनी मात्रा में देनी है, यह तय करने में जेनेटिक टेस्टिंग वरदान साबित हो रही है। सही डोज़ ना मिलने पर मरीज की जान को खतरा हो सकता है या फिर कीमो का असर ही नहीं होता। डीएनए एनालिसिस से डॉक्टर्स पहले ही जान लेते हैं कि मरीज का शरीर इस हैवी मेडिकेशन को झेल पाएगा या नहीं।
  • साइकियाट्री (मानसिक स्वास्थ्य और डिप्रेशन): मानसिक स्वास्थ्य के इलाज में सबसे बड़ी समस्या 'ट्रायल एंड एरर' (बार-बार दवा बदलकर देखना) की होती है। एंटीडिप्रेसेंट्स या एंटी-एंजायटी दवाइयां असर करने में 4 से 6 हफ्ते का समय लेती हैं। अगर 6 हफ्ते बाद पता चले कि दवाई ने असर नहीं किया, तो डॉक्टर दूसरी दवाई शुरू करता है, जिससे मरीज का कीमती समय और मानसिक स्थिति दोनों खराब होती हैं। जीनोम टेस्ट से पहली बार में ही सही और सटीक साइकियाट्रिक ड्रग चुनी जा सकती है।

जीनोम जांच से जुड़े कुछ जरूरी सवालों के जवाब डॉ. मेहता (कैंसर सर्जन) ने दिया है-

जीनोम टेस्टिंग (Genome Testing) क्या है और इसकी रिपोर्ट आने में कितना समय लगता है?

जीनोम टेस्टिंग एक उन्नत मेडिकल टेस्ट है, जिसमें किसी व्यक्ति के डीएनए(DNA) की जांच की जाती है ताकि यह समझा जा सके कि उसका शरीर विभिन्न बीमारियों या दवाओं पर कैसा रिस्पॉन्स देगा। पहले इस टेस्ट की विस्तृत और जटिल रिपोर्ट्स आने में 2 से 3 हफ्ते या उससे अधिक का समय लग जाता था, जिससे ओपीडी (OPD) में तुरंत निर्णय लेना मुश्किल होता था। हालांकि, अब भारत में आधुनिक टेक्नोलॉजी और स्टार्टअप्स की मदद से केवल जरूरी दवाओं के पैनल की संक्षिप्त 'एक्शनेबल रिपोर्ट' (Actionable Report) महज कुछ ही दिनों में तैयार होकर आ जाती है, जिससे डॉक्टरों के लिए तुरंत सटीक दवा लिखना आसान हो गया है।

इस टेस्ट की भूमिका ऑन्कोलॉजी में सबसे ज्यादा देखी जा रही है। कैंसर के इलाज में गेम-चेंजर साबित हो रहा है?

ऑन्कोलॉजी (कैंसर इलाज) में 'ट्रायल एंड एरर' यानी बार-बार दवाएं बदलना मरीजों के लिए बेहद जानलेवा साबित होता है। कैंसर की कीमोथेरेपी दवाएं अत्यधिक आक्रामक और संवेदनशील होती हैं। यदि मरीज के डीएनए (DNA) के अनुकूल सही दवा या सटीक दवाएं पहली बार में न मिले, तो कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने और फैलने का पूरा समय मिल जाता है। गलत दवा से मरीज के शरीर पर गंभीर साइड-इफेक्ट्स (Toxicity) होते हैं, जिससे इम्यून सिस्टम और लिवर-किडनी जैसे अंग डैमेज हो सकते हैं। इससे न केवल मरीज की जान को सीधा खतरा होता है, बल्कि कीमती समय और पैसा भी बर्बाद होता है। इसीलिए जीनोम टेस्ट यहां वरदान है।

कैंसर के इलाज में सामान्य कीमोथेरेपी और जीनोम टेस्ट आधारित थेरेपी (Genomic-Guided Therapy) के बीच बुनियादी अंतर क्या है

  • सामान्य कीमोथेरेपी (One-Size-Fits-All): इसका मुख्य आधार 'कैंसर का प्रकार और उसकी स्टेज' (जैसे- ब्रेस्ट कैंसर स्टेज 3) होता है। इसमें दुनिया भर के तय मानकों (Global Protocols) के अनुसार सभी मरीजों को एक जैसी स्टैंडर्ड दवाएं दी जाती हैं। इसमें डॉक्टर यह पहले से नहीं जान सकते कि उस दवा पर मरीज के अपने शरीर का रिस्पॉन्स कैसा होगा।
  • जीनोम टेस्ट आधारित थेरेपी (Personalized Medicine): इसका आधार मरीज के 'निजी डीएनए (DNA) और कैंसर ट्यूमर की जेनेटिक प्रोफाइल' होती है। इसमें दी जाने वाली दवाएं सीधे मरीज के आनुवंशिक ढांचे के अनुकूल होती हैं।

क्या यह टेस्ट केवल बीमार होने के बाद कराना चाहिए या इसे प्रिवेंटिव हेल्थकेयर (बीमारी से बचने) के रूप में भी देखा जा सकता है?

एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए जीनोम टेस्ट कराना "प्रिवेंटिव हेल्थकेयर" के रूप में बेहद मूल्यवान है। इसे केवल बीमार होने के बाद ही नहीं, बल्कि भविष्य की बीमारियों से बचने के लिए एक एडवांस टूल माना जा सकता है। स्वस्थ रहते हुए यह टेस्ट कराने के दो सबसे बड़े फायदे हैं पहला, इससे आपके शरीर में छिपे उन जेनेटिक रिस्क (जैसे कैंसर या हार्ट डिजीज की आनुवंशिक प्रवृत्ति) का पहले ही पता चल जाता है, जिससे आप अपनी लाइफस्टाइल बदलकर बीमारी को रोक सकते हैं। दूसरा, चूंकि डीएनए जिंदगी भर नहीं बदलता, इसलिए भविष्य में कभी भी अचानक बीमार पड़ने पर डॉक्टर पहले दिन से ही आपके शरीर के अनुकूल सबसे सुरक्षित और सटीक दवा चुन सकते हैं। यह एक 'वन्स-इन-ए-लाइफटाइम' लाइफ इंश्योरेंस जैसा है।

भारत में इस टेस्ट की कीमत ₹10,000 से ₹100,000 के बीच है, जो एक आम भारतीय के लिए काफी ज्यादा है। आपको क्या लगता है, यह टेक्नोलॉजी भारत के मिडिल क्लास तक कब और कैसे सुलभ हो पाएगी?

भारत में यह टेक्नोलॉजी अगले 3 से 5 वर्षों में मिडिल क्लास तक सुलभ हो सकती है। इसके मुख्य रूप से दो रास्ते हैं पहला, 'इकोनॉमी ऑफ स्केल' और घरेलू निर्माण जैसे-जैसे इस टेस्ट की मांग बढ़ेगी और रिलायंस जैसे बड़े कॉर्पोरेट समूह इस मार्केट में कदम बढ़ाकर बड़े पैमाने पर टेस्टिंग करेंगे, वैसे ही इसकी लागत 50 प्रतिशत तक कम हो सकती है। दूसरा, शॉर्ट एक्शनेबल रिपोर्ट्स और प्रिवेंटिव पैकेज नए स्टार्टअप्स अब 60-पेज की जटिल रिपोर्ट के बजाय 4-पेज की सस्ती और फोकस्ड समरी रिपोर्ट्स बना रहे हैं, जिससे केवल जरूरी दवाओं के पैनल की कीमत कम हो जाएगी।जहां सामान्य बीमारियों में जीनोम टेस्ट का खर्च हजारों में है, वहीं कैंसर के मामलों में जेनेटिक मैपिंग के कारण इस टेस्ट की कीमत ₹1 लाख से ₹10 लाख तक भी चली जाती है, जो आम भारतीय परिवारों के बजट से काफी बाहर है।

क्या इंश्योरेंस कंपनियों को इन जेनेटिक टेस्ट्स को अपने कवरेज में शामिल करना चाहिए? क्या इससे लंबे समय में हेल्थकेयर का कुल खर्च कम होगा?

हां, इंश्योरेंस कंपनियों ने इन जेनेटिक टेस्ट्स को अपने कवरेज में जरूर शामिल किया है लेकिन सरकारी अस्पताल में अभी यह कवर नहीं होता । लंबे समय में इससे हेल्थकेयर का कुल खर्च बहुत हद तक कम होगा। जब इंश्योरेंस कंपनियां इस टेस्ट को कवर करती है, तो डॉक्टरों के लिए 'ट्रायल एंड एरर' पद्धति खत्म होती है, जिससे गलत दवाओं पर होने वाला फिजूल खर्च और उनके गंभीर साइड-इफेक्ट्स के कारण दोबारा अस्पताल में भर्ती होने की नौबत नहीं आएगी। इससे इंश्योरेंस कंपनियों का क्लेम बर्डन कम होगा और मरीजों की जेब का खर्च (Out-of-pocket expense) भी घटेगा।

भारत के टियर-2 और टियर-3 शहरों के डॉक्टरों के बीच इस थेरेपी को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए?

देखिए टियर-2 और टियर-3 शहरों के डॉक्टरों में जागरूकता बढ़ाने के लिए सबसे पहले मेडिकल काउंसिल और स्थानीय एसोसिएशनों (जैसे IMA) के माध्यम से कंटिन्यूइंग मेडिकल एजुकेशन (सीएमई) प्रोग्राम और कार्यशालाएं आयोजित की जानी चाहिए। इसके अलावा, मेडिकल कॉलेजों के पाठ्यक्रम में फार्माकोजीनोमिक्स को मुख्य रूप से शामिल करना जरूरी है। नए स्टार्टअप्स को इन शहरों के डॉक्टरों तक पहुंच बढ़ाकर 4-पेज की शॉर्ट रिपोर्ट्स और उनके क्लिनिकल फायदों का लाइव डेमो देना चाहिए।

Published on:
02 Jun 2026 06:47 pm