
Genome Test In India : हमारे देश में जब भी कोई बीमार होता है, तो डॉक्टर के पास जाना, लक्षण बताना और प्रिस्क्रिप्शन लेकर मेडिकल स्टोर से दवाई लाना एक आम प्रक्रिया है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जो दवाई एक व्यक्ति को बिल्कुल ठीक कर देती है, वही दवाई दूसरे व्यक्ति पर बेअसर क्यों रहती है? या फिर कुछ लोगों को आम दवाइयों से भी भयानक साइड-इफेक्ट्स क्यों हो जाते हैं?
इसका जवाब किसी बीमारी में नहीं, बल्कि हमारे शरीर के सबसे बुनियादी हिस्से यानी हमारे डीएनए (DNA) और जीन्स (Genes) में छिपा है।
15 वर्ष के अनुभवी डॉ. निखिल मेहता (वरिष्ठ कैंसर सर्जन) ने बताया, भारतीय चिकित्सा प्रणाली (Indian Medical System) में अब एक नया और बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। देश के बड़े-बड़े कॉर्पोरेट और प्रीमियम सरकारी व निजी अस्पतालों के टॉप-टियर डॉक्टर्स अब दवाई लिखने से पहले मरीजों को 'जीनोम टेस्ट' करवाने की सलाह दे रहे हैं। यह हेल्थकेयर सेक्टर में एक ऐसी क्रांति है जो आने वाले समय में इलाज के तरीके को पूरी तरह बदल देगी।
फार्माकोजीनोमिक्स (Pharmacogenomics) दो शब्दों से मिलकर बना है फार्माकोलॉजी (दवाइयों का विज्ञान) और जीनोमिक्स (जीन्स का अध्ययन)। जब हम कोई दवाई खाते हैं, तो हमारा लिवर और शरीर के एंजाइम्स उसे तोड़ते हैं ताकि शरीर उसका इस्तेमाल कर सके। लेकिन इन एंजाइम्स को बनाने का निर्देश हमारे जीन्स देते हैं। अगर किसी के जीन में कोई बदलाव या म्यूटेशन है, तो हो सकता है कि उसके शरीर में वह एंजाइम बने ही न, या फिर बहुत ज्यादा बन जाए।
इसके आधार पर मरीजों को मुख्य रूप से तीन कैटेगरीज में बांटा जा सकता है:
जीनोम जांच से जुड़े कुछ जरूरी सवालों के जवाब डॉ. मेहता (कैंसर सर्जन) ने दिया है-
जीनोम टेस्टिंग (Genome Testing) क्या है और इसकी रिपोर्ट आने में कितना समय लगता है?
जीनोम टेस्टिंग एक उन्नत मेडिकल टेस्ट है, जिसमें किसी व्यक्ति के डीएनए(DNA) की जांच की जाती है ताकि यह समझा जा सके कि उसका शरीर विभिन्न बीमारियों या दवाओं पर कैसा रिस्पॉन्स देगा। पहले इस टेस्ट की विस्तृत और जटिल रिपोर्ट्स आने में 2 से 3 हफ्ते या उससे अधिक का समय लग जाता था, जिससे ओपीडी (OPD) में तुरंत निर्णय लेना मुश्किल होता था। हालांकि, अब भारत में आधुनिक टेक्नोलॉजी और स्टार्टअप्स की मदद से केवल जरूरी दवाओं के पैनल की संक्षिप्त 'एक्शनेबल रिपोर्ट' (Actionable Report) महज कुछ ही दिनों में तैयार होकर आ जाती है, जिससे डॉक्टरों के लिए तुरंत सटीक दवा लिखना आसान हो गया है।
इस टेस्ट की भूमिका ऑन्कोलॉजी में सबसे ज्यादा देखी जा रही है। कैंसर के इलाज में गेम-चेंजर साबित हो रहा है?
ऑन्कोलॉजी (कैंसर इलाज) में 'ट्रायल एंड एरर' यानी बार-बार दवाएं बदलना मरीजों के लिए बेहद जानलेवा साबित होता है। कैंसर की कीमोथेरेपी दवाएं अत्यधिक आक्रामक और संवेदनशील होती हैं। यदि मरीज के डीएनए (DNA) के अनुकूल सही दवा या सटीक दवाएं पहली बार में न मिले, तो कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने और फैलने का पूरा समय मिल जाता है। गलत दवा से मरीज के शरीर पर गंभीर साइड-इफेक्ट्स (Toxicity) होते हैं, जिससे इम्यून सिस्टम और लिवर-किडनी जैसे अंग डैमेज हो सकते हैं। इससे न केवल मरीज की जान को सीधा खतरा होता है, बल्कि कीमती समय और पैसा भी बर्बाद होता है। इसीलिए जीनोम टेस्ट यहां वरदान है।
कैंसर के इलाज में सामान्य कीमोथेरेपी और जीनोम टेस्ट आधारित थेरेपी (Genomic-Guided Therapy) के बीच बुनियादी अंतर क्या है।
क्या यह टेस्ट केवल बीमार होने के बाद कराना चाहिए या इसे प्रिवेंटिव हेल्थकेयर (बीमारी से बचने) के रूप में भी देखा जा सकता है?
एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए जीनोम टेस्ट कराना "प्रिवेंटिव हेल्थकेयर" के रूप में बेहद मूल्यवान है। इसे केवल बीमार होने के बाद ही नहीं, बल्कि भविष्य की बीमारियों से बचने के लिए एक एडवांस टूल माना जा सकता है। स्वस्थ रहते हुए यह टेस्ट कराने के दो सबसे बड़े फायदे हैं पहला, इससे आपके शरीर में छिपे उन जेनेटिक रिस्क (जैसे कैंसर या हार्ट डिजीज की आनुवंशिक प्रवृत्ति) का पहले ही पता चल जाता है, जिससे आप अपनी लाइफस्टाइल बदलकर बीमारी को रोक सकते हैं। दूसरा, चूंकि डीएनए जिंदगी भर नहीं बदलता, इसलिए भविष्य में कभी भी अचानक बीमार पड़ने पर डॉक्टर पहले दिन से ही आपके शरीर के अनुकूल सबसे सुरक्षित और सटीक दवा चुन सकते हैं। यह एक 'वन्स-इन-ए-लाइफटाइम' लाइफ इंश्योरेंस जैसा है।
भारत में इस टेस्ट की कीमत ₹10,000 से ₹100,000 के बीच है, जो एक आम भारतीय के लिए काफी ज्यादा है। आपको क्या लगता है, यह टेक्नोलॉजी भारत के मिडिल क्लास तक कब और कैसे सुलभ हो पाएगी?
भारत में यह टेक्नोलॉजी अगले 3 से 5 वर्षों में मिडिल क्लास तक सुलभ हो सकती है। इसके मुख्य रूप से दो रास्ते हैं पहला, 'इकोनॉमी ऑफ स्केल' और घरेलू निर्माण जैसे-जैसे इस टेस्ट की मांग बढ़ेगी और रिलायंस जैसे बड़े कॉर्पोरेट समूह इस मार्केट में कदम बढ़ाकर बड़े पैमाने पर टेस्टिंग करेंगे, वैसे ही इसकी लागत 50 प्रतिशत तक कम हो सकती है। दूसरा, शॉर्ट एक्शनेबल रिपोर्ट्स और प्रिवेंटिव पैकेज नए स्टार्टअप्स अब 60-पेज की जटिल रिपोर्ट के बजाय 4-पेज की सस्ती और फोकस्ड समरी रिपोर्ट्स बना रहे हैं, जिससे केवल जरूरी दवाओं के पैनल की कीमत कम हो जाएगी।जहां सामान्य बीमारियों में जीनोम टेस्ट का खर्च हजारों में है, वहीं कैंसर के मामलों में जेनेटिक मैपिंग के कारण इस टेस्ट की कीमत ₹1 लाख से ₹10 लाख तक भी चली जाती है, जो आम भारतीय परिवारों के बजट से काफी बाहर है।
क्या इंश्योरेंस कंपनियों को इन जेनेटिक टेस्ट्स को अपने कवरेज में शामिल करना चाहिए? क्या इससे लंबे समय में हेल्थकेयर का कुल खर्च कम होगा?
हां, इंश्योरेंस कंपनियों ने इन जेनेटिक टेस्ट्स को अपने कवरेज में जरूर शामिल किया है लेकिन सरकारी अस्पताल में अभी यह कवर नहीं होता । लंबे समय में इससे हेल्थकेयर का कुल खर्च बहुत हद तक कम होगा। जब इंश्योरेंस कंपनियां इस टेस्ट को कवर करती है, तो डॉक्टरों के लिए 'ट्रायल एंड एरर' पद्धति खत्म होती है, जिससे गलत दवाओं पर होने वाला फिजूल खर्च और उनके गंभीर साइड-इफेक्ट्स के कारण दोबारा अस्पताल में भर्ती होने की नौबत नहीं आएगी। इससे इंश्योरेंस कंपनियों का क्लेम बर्डन कम होगा और मरीजों की जेब का खर्च (Out-of-pocket expense) भी घटेगा।
भारत के टियर-2 और टियर-3 शहरों के डॉक्टरों के बीच इस थेरेपी को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए?
देखिए टियर-2 और टियर-3 शहरों के डॉक्टरों में जागरूकता बढ़ाने के लिए सबसे पहले मेडिकल काउंसिल और स्थानीय एसोसिएशनों (जैसे IMA) के माध्यम से कंटिन्यूइंग मेडिकल एजुकेशन (सीएमई) प्रोग्राम और कार्यशालाएं आयोजित की जानी चाहिए। इसके अलावा, मेडिकल कॉलेजों के पाठ्यक्रम में फार्माकोजीनोमिक्स को मुख्य रूप से शामिल करना जरूरी है। नए स्टार्टअप्स को इन शहरों के डॉक्टरों तक पहुंच बढ़ाकर 4-पेज की शॉर्ट रिपोर्ट्स और उनके क्लिनिकल फायदों का लाइव डेमो देना चाहिए।