
DSA Machine Closed: डॉ. भीमराव आंबेडकर अस्पताल के रेडियो डायग्नोसिस विभाग में लगी डिजिटल सब्सट्रेक्शन एंजियोग्राफी (DSA) मशीन पिछले साल नवंबर से बंद है। मशीन की लाइफ पूरी हो जाने के कारण इसे दोबारा चालू नहीं किया जा सका है। इस मशीन के जरिए ब्रेन से जुड़ी गंभीर और जटिल बीमारियों का इलाज किया जाता था। मशीन बंद होने से हर महीने इलाज कराने वाले करीब 75 से 80 मरीजों पर असर पड़ा है। जरूरी मामलों का उपचार फिलहाल कैथलैब में किया जा रहा है, जबकि कई मरीजों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है।
अस्पताल के डॉक्टरों के मुताबिक DSA मशीन में 'चिलर' नाम का एक महत्वपूर्ण पार्ट खराब हो गया था। यह पार्ट मशीन की ट्यूब को ठंडा रखने का काम करता है। मशीन की निर्धारित लाइफ पूरी हो जाने के कारण सप्लायर कंपनी ने इसके मेंटेनेंस से इनकार कर दिया। बताया गया कि कंपनी करीब दो साल पहले ही मशीन को कंडम घोषित कर चुकी थी।
यह DSA मशीन वर्ष 2009 में करीब 3.95 करोड़ रुपए की लागत से लगाई गई थी। जर्मनी से आयातित यह मशीन उस समय सेंट्रल इंडिया के सरकारी और निजी अस्पतालों में उपलब्ध शुरुआती एडवांस मशीनों में शामिल थी। इसके जरिए डॉक्टरों ने कई जटिल और दुर्लभ मामलों का उपचार किया।
DSA तकनीक से ब्रेन की रक्त वाहिकाओं से जुड़े गंभीर मामलों का उपचार कम चीरा लगाकर किया जा सकता था। कई मामलों में तार के माध्यम से रक्त वाहिका तक पहुंचकर खून के थक्के को हटाया जाता था। इससे मरीजों को बड़े ऑपरेशन से राहत मिलती थी। वहीं, मशीन उपलब्ध नहीं होने पर कुछ मामलों में न्यूरो सर्जरी के जरिए खोपड़ी खोलकर या एंडोस्कोपिक प्रक्रिया से उपचार करना पड़ सकता है।
मशीन चालू रहने के दौरान हर महीने करीब 75 से 80 मरीजों का इलाज किया जा रहा था। मशीन बंद होने के बाद ब्रेन और रक्त वाहिकाओं से संबंधित मरीजों को इलाज के लिए वैकल्पिक व्यवस्था पर निर्भर रहना पड़ रहा है। गंभीर मामलों में अस्पताल की कैथलैब का उपयोग किया जा रहा है, जबकि कई मरीज निजी अस्पतालों में इलाज कराने को मजबूर हैं।
मशीन बंद होने के बाद मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने नई DSA मशीन खरीदने का प्रस्ताव चिकित्सा शिक्षा विभाग को भेजा था। उम्मीद थी कि राज्य के बजट में नई मशीन के लिए आवश्यक राशि का प्रावधान किया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब मशीन के लिए फंड कब मिलेगा और टेंडर प्रक्रिया कब शुरू होगी, इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
DSA से होने वाली कई प्रक्रियाएं निजी अस्पतालों में काफी महंगी हो सकती हैं। सरकारी अस्पताल में मशीन उपलब्ध होने के दौरान पात्र मरीजों को आयुष्मान भारत योजना के तहत कैशलेस उपचार का लाभ मिल रहा था। मशीन बंद होने से जरूरतमंद मरीजों के सामने इलाज के लिए अतिरिक्त खर्च का दबाव बढ़ सकता है।
आंबेडकर अस्पताल के रेडियो डायग्नोसिस विभाग के एचओडी डॉ. विवेक पात्रे ने बताया कि सप्लायर कंपनी मशीन को कंडम घोषित कर चुकी है। जरूरी केस कैथलैब में किए जा रहे हैं और नई DSA मशीन खरीदने का प्रस्ताव भेजा गया है। नई मशीन की उपलब्धता से गंभीर मरीजों को दोबारा अस्पताल में ही आधुनिक उपचार की सुविधा मिल सकेगी।