
Illegal Colonies in Raipur: छत्तीसगढ़ के शहरों का विस्तार तेजी से हो रहा है। लोग बेहतर कनेक्टिविटी और कम कीमत में घर बनाने की उम्मीद से नगर निगम की सीमा से बाहर प्लॉट खरीद रहे हैं। लेकिन कई जगह घर और कॉलोनियां बसने के बाद भी सड़क, पीने का पानी, नाली और स्ट्रीट लाइट जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर समेत दुर्ग-भिलाई, बिलासपुर और कोरबा के बाहरी इलाकों में यह समस्या लगातार बढ़ रही है। नगर निगम की सीमा से बाहर विकसित हो रहे इन क्षेत्रों को पेरी-अर्बन एरिया कहा जाता है। यहां अनियोजित विकास के कारण स्थानीय निकायों पर सुविधाएं उपलब्ध कराने का दबाव बढ़ रहा है।
नगर निगम की सीमा से बाहर बिल्डर कृषि भूमि या ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन खरीदकर कॉलोनियां विकसित कर रहे हैं। इन क्षेत्रों में जमीन और प्लॉट अपेक्षाकृत सस्ते मिलने के कारण लोग खरीदारी कर रहे हैं। लेकिन कई कॉलोनियों में विकास के लिए जरूरी सुविधाओं और व्यवस्थाओं की कमी सामने आ रही है।
रायपुर के सेजबहार, कांदुल, अमलीडीह, दलदल सिवनी और विधानसभा मार्ग से जुड़े कई बाहरी इलाके तेजी से शहरी रूप ले चुके हैं। इसके बावजूद इन क्षेत्रों के कुछ हिस्से अब भी नगर निगम की सीमा में शामिल नहीं हो पाए हैं। ऐसे में बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करना स्थानीय निकायों के लिए चुनौती बन रहा है।
रायपुर और दुर्ग-भिलाई के बाहरी इलाकों में नगर निकायों की सीमाओं के बाहर 500 से अधिक कॉलोनियां विकसित होने का अनुमान है। रायपुर के पेरिफेरल जोन के साथ दुर्ग-भिलाई के सीमावर्ती क्षेत्रों, कुम्हारी, अमलेश्वर, रिसाली के आगे और विधानसभा रोड के आसपास निजी बिल्डरों की कॉलोनियां और प्लॉटिंग तेजी से बढ़ी हैं।
वहीं, बिलासपुर के सकरी, कोनी, तिफरा के बाहरी हिस्सों और सीपत रोड के आसपास नगर निगम की सीमा के बाहर 150 से अधिक कॉलोनियां होने की जानकारी दी गई है। औद्योगिक शहर कोरबा में दर्री, बालको के बाहरी क्षेत्रों और उरगा मार्ग के आसपास की ग्राम पंचायतों में भी करीब 60 से 80 कॉलोनियां विकसित हुई हैं।
नगर निगम की सीमा के बाहर ग्राम पंचायत क्षेत्रों में जमीन के उपयोग परिवर्तन और निर्माण से जुड़े नियम शहरी क्षेत्रों से अलग हो सकते हैं। इसका फायदा उठाकर कुछ बिल्डर बिना पर्याप्त बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था किए प्लॉटिंग कर देते हैं। कई मामलों में कॉलोनी का विकास नियमानुसार नहीं होने से बाद में उसे अवैध घोषित किए जाने या नियमितीकरण में परेशानी आने की आशंका रहती है। ऐसे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को बिजली की अनियमित आपूर्ति, पीने के पानी की कमी, कच्ची सड़कों, नालियों और जलभराव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
पेरी-अर्बन क्षेत्रों में आबादी बढ़ने के साथ ग्राम पंचायतों पर भी जिम्मेदारी बढ़ रही है। सीमित आर्थिक संसाधनों और तकनीकी सुविधाओं के कारण पंचायतों के लिए शहरी स्तर की सेवाएं उपलब्ध कराना आसान नहीं होता। सीवरेज सिस्टम, स्ट्रीट लाइट, कचरा प्रबंधन, पक्की सड़कें और नियमित जल निकासी जैसी व्यवस्थाओं के लिए पर्याप्त योजना और बजट की जरूरत होती है। वहीं, जब कॉलोनियों में सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं, तो रहवासी स्थानीय निकायों और प्रशासन से व्यवस्था सुधारने की मांग करते हैं। इससे निकायों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा के अनुसार, पेरी-अर्बन एरिया में विकसित हो रही कॉलोनियों वाले क्षेत्रों को भविष्य में स्थानीय निकायों में शामिल किया जाएगा। फिलहाल अवैध कॉलोनियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि कॉलोनी विकसित करने वाले बिल्डरों की जिम्मेदारी है कि वे रहवासियों को बिजली, सड़क और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराएं। न्होंने लोगों को सलाह दी कि प्लॉट या मकान खरीदने से पहले जरूरी पहलुओं की जांच जरूर करें।
रायपुर के आर्किटेक्ट मनीष पिल्लेवार का कहना है कि अवैध कॉलोनियों के कारण स्थानीय निकायों पर मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने का दबाव लगातार बढ़ता है। कुछ भू-माफिया सस्ते दाम पर प्लॉट बेचकर निकल जाते हैं, जिसके बाद वहां रहने वाले लोगों को सड़क, पानी और अन्य सुविधाओं के लिए परेशान होना पड़ता है।
उनके मुताबिक, लोगों को मकान या प्लॉट खरीदने से पहले सुविधाओं और वैध दस्तावेजों की जांच करनी चाहिए। साथ ही, शासन और संबंधित विभागों को भी अवैध कॉलोनियों के विकसित होने से पहले कार्रवाई करनी चाहिए।
बाहरी क्षेत्र में जमीन या मकान खरीदते समय केवल कीमत और लोकेशन के आधार पर फैसला लेना सही नहीं है। खरीदारों को इन बातों पर ध्यान देना चाहिए:
शहरों के आसपास तेजी से बसती कॉलोनियां आवास की बढ़ती मांग को तो पूरा कर रही हैं, लेकिन बुनियादी सुविधाओं और नियोजित विकास की कमी गंभीर समस्या बन रही है। जरूरत इस बात की है कि कॉलोनियों के विकास की निगरानी समय रहते की जाए, नियमों का पालन सुनिश्चित हो और संबंधित निकायों के बीच बेहतर समन्वय बने। इससे लोगों को घर खरीदने के बाद सड़क, पानी और दूसरी जरूरी सुविधाओं के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा।