
Rajsamand Civic Polls Reservation Lottery: नगर निकाय चुनाव का बिगुल अभी बजा भी नहीं है, लेकिन राजसमंद की सियासत में सभापति की कुर्सी को लेकर हलचल तेज हो गई है। गुरुवार को लॉटरी से हुए आरक्षण ने चुनावी तस्वीर का सबसे बड़ा सस्पेंस खत्म कर दिया। राजसमंद नगर परिषद सभापति पद अनारक्षित वर्ग के लिए आरक्षित हो गया है। सीट अनारक्षित होते ही लंबे समय से दावेदारी की तैयारी में जुटे नेताओं की सक्रियता बढ़ गई है और भाजपा-कांग्रेस दोनों खेमे अब टिकट को लेकर सियासी गणित बैठाने में लगे हैं।
राजसमंद में सभापति पद की कुर्सी पहले भी अधिकांश समय अनारक्षित वर्ग के खाते में रही है। इस बार राजनीतिक गलियारों में ओबीसी आरक्षण की चर्चाओं ने कई दावेदारों को उम्मीद बंधाई थी। लेकिन लॉटरी खुलते ही समीकरण पलट गए।
अनारक्षित सीट आने के साथ ही अब दोनों प्रमुख दलों में अनारक्षित वर्ग के दावेदारों की लंबी कतार सामने है। चुनाव अभी दूर है, लेकिन सभापति की कुर्सी ने सियासी दौड़ शुरू कर दी है। राजसमंद निकाय में अब तक के हुए चुनावों पर गौर करें तो कांग्रेस का पलड़ा भारी ही रहा है।
साल 2021 में परिसीमन के बाद राजसमंद नगर परिषद में 35 के बजाय 45 वार्डों में चुनाव हुए थे। उस समय सभापति पद ओबीसी के लिए आरक्षित था। इस बार आरक्षण बदलते ही सीट फिर अनारक्षित वर्ग के खाते में आ गई।
ऐसे में अब सवाल सिर्फ चुनाव जीतने का नहीं, बल्कि कौन बनेगा सभापति? का भी है। भाजपा और कांग्रेस दोनों में ऐसे नेताओं की कमी नहीं है, जो लंबे समय से इस पद की दौड़ में खुद को आगे मानकर चल रहे हैं। आरक्षण की तस्वीर साफ होने के बाद अब दावेदारों की राजनीतिक सक्रियता और बढ़ने की संभावना है।
राजसमंद नगर पालिका का गठन साल 1956 में हुआ था। तब पहले चेयरमैन कांग्रेस के रतन सिंह बने थे। इसके बाद दूसरे चेयरमैन कांग्रेस के बिहारीलाल वर्मा बने। राजसमंद में अध्यक्ष की कुर्सी अब तक नौ बार कांग्रेस, छह बार भाजपा और एक बार जनसंघ के खाते में रही है। यानी करीब सात दशक के सियासी सफर में इस कुर्सी ने कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे हैं।
साल 2012 में कांग्रेस की चेयरमैन आशा पालीवाल के कार्यकाल में राजसमंद नगर पालिका को नगर परिषद में क्रमोन्नत किया गया था। आशा पालीवाल कांग्रेस की सभापति बनी थीं। इसके बाद वर्ष 2015 के नगर परिषद चुनाव में सामान्य सीट पर भाजपा के सुरेश पालीवाल चेयरमैन बने। उस समय परिषद में 35 वार्ड थे।
भाजपा ने 22 वार्ड, कांग्रेस ने 11 वार्ड जीते थे, जबकि एक वार्ड में निर्दलीय प्रत्याशी विजयी हुआ था। अब एक बार फिर निकाय चुनाव का मैदान सजने वाला है। फर्क इतना है कि इस बार सभापति पद सामान्य होने से सियासी मुकाबले की गर्मी चुनाव से पहले ही महसूस होने लगी है।
आरक्षण की लॉटरी ने भले ही सभापति पद की श्रेणी तय कर दी हो, लेकिन असली सियासी लॉटरी अभी बाकी है। भाजपा और कांग्रेस किस चेहरे पर दांव लगाते हैं, कौन दावेदार टिकट हासिल करता है और किसे मनाना पड़ता है। इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में राजसमंद की सियासत का तापमान तय करेंगे। फिलहाल, इतना तय है कि सभापति की कुर्सी अनारक्षित हुई है, लेकिन मुकाबला बिल्कुल सामान्य नहीं रहने वाला।