रतलाम

कुश अमावस्या: भगवान राम व सीता माता से जुड़ा है इनका संबंध, पति की उम्र होती है ये करने से लंबी

कुश अमावस्या: भगवान राम व सीता माता से जुड़ा है इनका संबंध, पति की उम्र होती है ये करने से लंबी। आमातोर घांस को कुश कहा जाता है। जब लंकाधीपति रावण ने माता सीता का अपहरण किया था, तब सीतामाता ने स्वयं की रक्षा अशोक वाटिका में कुश से ही की थी।

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Aug 30, 2019
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रतलाम। कुश अमावस्या: आज कुशोत्पाटिनी या कुश अमावस्या है। आमातोर घांस को कुश कहा जाता है। जब लंकाधीपति रावण ने भगवान राम की पत्नी माता सीता का अपहरण किया था, तब सीतामाता ने स्वयं की रक्षा अशोक वाटिका में कुश से ही की थी। धार्मिक कार्यो में इसका बड़ा महत्व है। सामान्य बोलचाल की भाषा में भी तेज बुद्धि वाले व्यक्ति को कुशाग्र कहा जाता है। कुश का सामान्य जिंदगी में बड़ा महत्व है। ये बात रतलाम के प्रसिद्ध ज्योतिषी अभिषेक जोशी ने कही। वे भक्तों को कुश अमावस्या के बारे में बता रहे थे।

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ज्योतिषी जोशी ने बताया कि कुश की पावनता के विषय में कथा पुराणों में एक कहानी है। महर्षि कश्यप की दो पत्नियां थीं। एक का नाम कद्रू था और दूसरी का नाम विनता। कद्रू और विनता दोनों महार्षि कश्यप की खूब सेवा करती थीं। महार्षि कश्यप ने उनकी सेवा-भावना से अभिभूत हो वरदान मांगने को कहा। कद्रू ने कहा, मुझे एक हजार पुत्र चाहिए। महार्षि ने 'तथास्तु' कह कर उन्हें वरदान दे दिया। विनता ने कहा कि मुझे केवल दो प्रतापी पुत्र चाहिए। महार्षि कश्यप उन्हें भी दो तेजस्वी पुत्र होने का वरदान देकर अपनी साधना में तल्लीन हो गए। कद्रू के पुत्र सर्प रूप में हुए, जबकि विनता के दो प्रतापी पुत्र हुए। किंतु विनता को भूल के कारण कद्रू की दासी बनना पड़ा।

अमृत की हुई थी मांग

विनता के पुत्र गरुड़ ने जब अपनी मां की दुर्दशा देखी तो दासता से मुक्ति का प्रस्ताव कद्रू के पुत्रों के सामने रखा। कद्रू के पुत्रों ने कहा कि यदि गरुड़ उन्हें स्वर्ग से अमृत लाकर दे दें तो वे विनता को दासता से मुक्त कर देंगे। गरुड़ ने उनकी बात स्वीकार कर अमृत कलश स्वर्ग से लाकर दे दिया और अपनी मां विनता को दासता से मुक्त करवा लिया। यह अमृत कलश 'कुश' नामक घास पर रखा था, जहां से इंद्र इसे उठा ले गए तथा कद्रू के पुत्र अमृतपान से वंचित रह गए। उन्होंने गरुड़ से इसकी शिकायत की कि इंद्र अमृत कलश उठा ले गए। गरुड़ ने उन्हें समझाया कि अब अमृत कलश मिलना तो संभव नहीं, हां यदि तुम सब उस घास ( कुश ) को, जिस पर अमृत कलश रखा था, जीभ से चाटो तो तुम्हें आंशिक लाभ होगा। कद्रू के पुत्र कुश को चाटने लगे, जिससे कि उनकी जीभें चिर गई इसी कारण आज भी सर्प की जीभ दो भागों वाली चिरी हुई दिखाई पड़ती है, किंतु 'कुश' घास की महत्ता अमृत कलश रखने के कारण बढ़ गई और भगवान विष्णु के निर्देशानुसार इसे पूजा कार्य में प्रयुक्त किया जाने लगा।

ये है पौराणिक महत्व

पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण कर समुद्रतल में छिपे महान असुर हिरण्याक्ष का वध कर दिया और पृथ्वी को उससे मुक्त कराकर बाहर निकले तो उन्होंने अपने बालों को फटकारा। उस समय कुछ रोम पृथ्वी पर गिरे। वहीं कुश के रूप में प्रकट हुए। कुश ऊर्जा की कुचालक है। इसलिए इसके आसन पर बैठकर पूजा-वंदना, उपासना या अनुष्ठान करने वाले साधन की शक्ति का क्षय नहीं होता। परिणामस्वरूप कामनाओं की अविलंब पूर्ति होती है।

उल्लेखनीय है कि वेदों ने कुश को तत्काल फल देने वाली औषधि, आयु की वृद्धि करने वाला और दूषित वातावरण को पवित्र करके संक्रमण फैलने से रोकने वाला बताया है। कुश का प्रयोग पूजा करते समय जल छिड़कने, ऊंगली में पवित्री पहनने, विवाह में मंडप छाने तथा अन्य मांगलिक कार्यों में किया जाता है। इस घास के प्रयोग का तात्पर्य मांगलिक कार्य एवं सुख-समृद्धिकारी है, क्योंकि इसका स्पर्श अमृत से हुआ है।

ये करने से होता है लाभ

ज्योतिषी जोशी ने बताया कि कुशग्रहणी अमावस्या का बड़ा महत्व है। कुशग्रहणी अमावस्या को लेकर मान्यता है कि इस अमावस्या के दिन वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हाथों में कुश लेकर पितरों की पूजा और श्राद्ध एवं तर्पण करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है और पितर को संतुष्टि और मुक्ति मिलती है और जातक पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। कुशग्रहणी अमावस्या के दौरान जब आप कुश एकत्र करें तो इस बात का ख्याल रखें कि कुश का कोई भी सिरा टूटा न हो और पत्तियां पूरी हों। सूर्योदय की पावन बेला में कुश एकत्र करने चाहिए। कुश निकालते वक्त उत्तर दिशा की तरफ मुख करके दायें हाथ की हथेली से कुश को निकालना चाहिए।

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Published on:
30 Aug 2019 12:01 am
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