Premanand Ji Maharaj Quotes: प्रेमानंद जी महाराज ने बताया है कि कैसे नाम जप और शुद्ध आचरण से डिप्रेशन व ओवरथिंकिंग को जड़ से खत्म किया जा सकता है। जानें मानसिक शांति का असली मार्ग।
Premanand Maharaj Tips: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान का मन छटपटाहट और मानसिक अशांति से भर गया है। परम पूज्य श्री प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि जब तक जीवन में अध्यात्म का प्रवेश नहीं होता, तब तक ओवरथिंकिंग और डिप्रेशन (Depression) को शांत करना असंभव है। संसार की सुख-सुविधाओं में खुशी ढूंढना आग में घी डालने जैसा है। प्रेमानंद महाराज के अनुसार, नाम जप की शक्ति और आचरण की शुद्धता ही हमारे भटकते हुए मन को परम शांति के मार्ग पर ले जा सकती है।
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, जब तक हम भगवान के नाम का आश्रय नहीं लेते, तब तक बुद्धि में विवेक जागृत नहीं हो सकता। संसार में अपमान या कष्ट मिलने पर साधारण बुद्धि तुरंत द्वेष और बदले की भावना से भर जाती है। यही नकारात्मक विचार धीरे-धीरे इंसान को ओवरथिंकिंग (Overthinking) की ओर धकेल देते हैं, जिससे मानसिक स्वास्थ्य पूरी तरह खराब हो जाता है।
आज के समाज में युवाओं की भटकती मनोदशा और गिरते मानसिक स्वास्थ्य पर चिंता व्यक्त करते हुए महाराज जी ने खान-पान और संगति के महत्व पर विशेष बल दिया है।
आज के समय में पिज्जा, नूडल्स जैसे तामसिक और अपवित्र भोजन तथा अशुद्ध पेय पदार्थों का चलन बढ़ गया है। महाराज जी स्पष्ट चेतावनी देते हैं कि जैसा अन्न हम ग्रहण करेंगे, हमारी बुद्धि और मन का निर्माण भी वैसा ही होगा।
20 वर्ष की आयु से पहले ही ब्रह्मचर्य को खो देना, लिव-इन रिलेशनशिप, बॉयफ्रेंड-गर्फ्रेंड की संस्कृति और मोबाइल पर दिन-रात प्रपंच देखना बुद्धि को पूरी तरह नष्ट कर रहा है। आज जो युवा इन बातों पर हंस रहे हैं, समय आने पर उनका जीवन गहरे संकट में फंस जाता है।
जब यही बुद्धि भगवान से विमुख होकर संसार में सुख खोजती है और वहां केवल धोखा मिलता है, तो अंत में व्यक्ति हताश होकर आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठा लेता है। इसलिए जीवन को उन्नतिशील बनाने के लिए गंदा आचरण, दूषित भोजन और कुसंगति को तुरंत त्यागना होगा।
महाराज जी ने भक्ति और ज्ञान मार्ग के गूढ़ रहस्यों को समझाते हुए स्पष्ट किया कि हमारा वास्तविक स्वरूप ही निराकार (ब्रह्म स्वरूप) है। हम जिस स्थूल शरीर को पकड़ लेते हैं, उसी के बंधनों में बंध जाते हैं।
चाहे ज्ञान का मार्ग हो या भक्ति का, अंतिम सफलता तभी मानी जाएगी जब संसार के सारे प्रपंच मिट जाएं और केवल एक परमात्मा ही शेष बचे।
अक्सर लोग जीवन भर तीर्थ यात्रा, पाठ और विग्रह पूजन को ही पूर्ण भक्ति मान लेते हैं। महाराज जी इस विषय में एक बहुत सूक्ष्म और महत्वपूर्ण भेद बताते हैं। तीर्थ करना, दान-पुण्य करना शुभ कर्म (पुण्य) के अंतर्गत आता है, जिससे अगला जन्म सुधर सकता है, लेकिन यह 'अनन्य शरणागति' नहीं है।
यदि जीवन भर केवल यांत्रिक रूप से माला घुमाई गई और मन संसार में ही भटका रहा, तो वृद्धावस्था में बुद्धि शिथिल होते ही पुनः सांसारिक प्रपंच (जैसे टीवी, सीरियल आदि) अपनी ओर खींचने लगते हैं। सच्ची भक्ति वह है जो भीतर से घटित हो, जहां हर सांस में प्रभु का नाम स्वतः चले। यदि अंत समय में बुद्धि को बिगड़ने से बचाना है, तो पवित्र वातावरण में मूल संस्कृत श्रीमद्भागवत का पाठ करवाना और जीवात्मा के कल्याण के लिए निरंतर भगवान की कथाओं का श्रवण करना परम कल्याणकारी सिद्ध होता है।
क्या आप जानते हैं कि जीवन भर धार्मिक कृत्य करने के बाद भी अंत समय में मन प्रभु चरणों में क्यों नहीं टिक पाता और कैसे 'नाम जप' के छोटे से अभ्यास से इस सबसे बड़े संकट को टाला जा सकता है?