प्रदोष व्रत में भगवान शिव की आराधना...
भगवान विष्णु का प्रिय माह माने जाने वाले वैशाख में जहां भगवान विष्णु की सत्यनारायण रूप में पूजा का विशेष विधान है। वहीं इस माह भगवान शिव की पूजा भी अतिविशेष मानी गई है, खासकर सोमवार को।
दरअसल हिन्दू तिथियों में प्रदोष व्रत 13वें दिन यानी त्रयोदशी को किया जाता है। वहीं प्रदोष व्रत, कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों में रखा जाता है। यानि त्रयोदशी माह में दो बार आती है। इसलिए यह व्रत एक माह में दो बार आता है। Pradosh Vrat में भगवान शिव की आराधना की जाती है।
इस बार यह व्रत Saturday को है इसलिए इसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाएगा, मान्यता के अनुसार इस दिन व्रत करने से संतान प्राप्ति की मनोकामना जल्द ही पूर्ण होती है। वहीं इसी माह 24 मई 2021 को सोम प्रदोष भी पड़ेगा।
जबकि 08 मई 2021(शनिवार) को शनि प्रदोष व्रत (कृष्ण) के दिन कृष्ण प्रदोष व्रत रखा जाएगा। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत के करने से Lord shiv का आशीर्वाद मिलता है। प्रदोष व्रत हर महीने दो बार (कृष्ण और शुक्ल पक्ष में) त्रयोदशी तिथि के दिन रखा जाता है।
शनि प्रदोष को लेकर माना जाता है कि कोई खोई वस्तु की प्राप्ति, नौकरी में पदोन्नति,पुत्र प्राप्ति एंव शनि के अशुभ प्रभावों को कम करने के लिए किया जाता है। इसी के साथ इस व्रत को शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या से मुक्ति पाने के लिए भी किया जाता है।
कब होता है प्रदोष...
हर माह के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में त्रयोदशी आती है और इस किए जाने वाले व्रत को ही प्रदोष व्रत कहा जाता है। दरअसल प्रदोष काल सूर्यास्त के बाद और रात्रि के आने से पहले का समय कहलाता है। इस व्रत में Bhagwan shiv कि पूजा की जाती है।
माना जाता है कि भगवान शिव प्रदोष के समय कैलाश पर्वत स्थित अपने रजत भवन में नृत्य करते हैं। ऐसे में शिव जी को प्रसन्न करने के लिए भक्त इस दिन प्रदोष व्रत रखते हैं। मान्यता है कि इस व्रत को करने से सारे कष्ट और हर प्रकार के दोष मिट जाते हैं।
हिन्दू धर्म में पूजा-पाठ, व्रत, उपवास आदि को काफी महत्वपूर्ण माना गया है। ऐसा में मान्यता के अनुसार इस दिन सच्चे मन से व्रत रखने पर व्यक्ति को मनचाहे वस्तु की प्राप्ति होती है। वैसे तो हिन्दू धर्म में हर महीने की प्रत्येक तिथि को कोई न कोई व्रत या उपवास होते हैं, लेकिन इन सब में प्रदोष व्रत की काफी मान्यता है।
जानकारों के अनुसार जिस तरह माह में दो बार आने वाली एकदशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है, उसी तरह प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित है। शनिवार के दिन पड़ने के कारण इसको शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है।
इस व्रत को शिवजी का आशीर्वाद और संतान प्राप्ति के लिए किया जाता है। यह तिथि भगवान शिव को अतिप्रिय मानी गई है, मान्यता है कि इस दिन पूजा पाठ करने से सभी समस्याओं से मुक्ति मिलती है और घर-परिवार में शांति बनी रहती है।
कलयुग में प्रदोष...
माह के दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि में शाम के समय को प्रदोष कहा जाता है। वहीं कलयुग में प्रदोष व्रत को अत्यंत मंगलकारी माना गया है, जो भगवान शंकर की कृपा प्रदान करता है। सप्ताह के सातों दिन किये जाने वाले सभी व्रत का अपना विशेष महत्व है।
जबकि सप्ताह के अलग अलग दिनों में पड़ने वाले प्रदोष को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। जैसे सोमवार के प्रदोष को सोम प्रदोष, मंगलवार के प्रदोष को मंगल प्रदोष, बुधवार के प्रदोष को बुध प्रदोष इसी तरह बाकि वारों के भी नाम रविवार के प्रदोष को रवि प्रदोष तक कहे जाते हैं, जबकि इनमें से मुख्य सोम प्रदोष, गुरु प्रदोष व शनि प्रदोष माने गए हैं। दक्षिण भारत में लोग प्रदोष को प्रदोषम के नाम से जानते हैं।
प्रदोष व्रत की विधि
शाम का समय प्रदोष व्रत पूजन समय के लिए अच्छा माना जाता है क्यूंकि हिन्दू पंचांग के अनुसार सभी शिव मन्दिरों में शाम के समय प्रदोष मंत्र का जाप करते हैं।
इस व्रत में व्रती को निर्जल रहकर व्रत रखना होता है। प्रातः काल स्नान करके भगवान शिव की बेल पत्र, गंगाजल अक्षत धूप दीप सहित पूजा करें। संध्या काल में पुन: स्नान करके इसी प्रकार से शिव जी की पूजा करना चाहिए। इस प्रकार प्रदोषम व्रत करने से व्रती को पुण्य मिलता है।
शनि प्रदोष व्रत का महत्व
माना जाता है कि प्रदोष व्रत करने वाले मनुष्य को दो गायों को दान करने के बराबर का फल मिलता है। माना जाता है कि जब चारों ओर अधर्म अपने पांव पसार लेगा और हर जगह गलत कार्य किए जाएंगे। उस समय केवल प्रदोष व्रत कर शिव की उपासना करने वाला व्यक्ति ही शांति पाएगा और सभी प्रकार के अधर्मों से दूर रहेगा।
प्रदोष व्रत के नियम और विधि -
: प्रदोष व्रत करने के लिए सबसे पहले आप त्रयोदशी के दिन सूर्योदय से पहले उठ जाएं।
: स्नान आदि करने के बाद आप साफ़ वस्त्र पहन लें।
: उसके बाद आप बेलपत्र, अक्षत, दीप, धूप, गंगाजल आदि से भगवान शिव की पूजा करें।
: इस व्रत में भोजन ग्रहण नहीं किया जाता है।
: पूरे दिन का उपवास रखने के बाद सूर्यास्त से कुछ देर पहले दोबारा स्नान कर लें और सफ़ेद रंग का वस्त्र धारण करें।
: आप स्वच्छ जल या गंगा जल से पूजा स्थल को शुद्ध कर लें।
: अब आप गाय का गोबर ले और उसकी मदद से मंडप तैयार कर लें।
: पांच अलग-अलग रंगों की मदद से आप मंडप में रंगोली बना लें।
: पूजा की सारी तैयारी करने के बाद आप उतर-पूर्व दिशा में मुंह करके कुशा के आसन पर बैठ जाएं।
: भगवान शिव के मंत्र ऊँ नम: शिवाय का जाप करें और शिव को जल चढ़ाएं।
धार्मिक दृष्टिकोण से आप जिस भी प्रदोष से प्रदोष व्रत रखना चाहते हों, उस वार के अंतर्गत आने वाली त्रयोदशी को चुनें और उस वर के लिए निर्धारित कथा पढ़ें और सुनें।
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प्रदोष व्रत का उद्यापन...
मान्यता है कि जो भक्त इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशी तक रखते हैं, उन्हें इस व्रत का उद्यापन विधिवत तरीके से करना चाहिए।
: व्रत का उद्यापन आप त्रयोदशी तिथि पर ही करें।
: उद्यापन करने से एक दिन पहले श्री गणेश की पूजा की जाती है। और उद्यापन से पहले वाली रात को कीर्तन करते हुए जागरण करते हैं।
: अगले दिन सुबह जल्दी उठकर मंडप बनाना होता है और उसे वस्त्रों और रंगोली से सजाया जाता है।
: ऊँ उमा सहित शिवाय नम: मंत्र का 108 बार जाप करते हुए हवन करते हैं।
: खीर का प्रयोग हवन में आहूति के लिए किया जाता है।
: हवन समाप्त होने के बाद भगवान शिव की आरती और शान्ति पाठ करते हैं।
: अंत में दो ब्रह्माणों को भोजन कराया जाता है और अपने इच्छा और सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देते हुए उनसे आशीर्वाद लेते हैं।
व्रतों में श्रेष्ठ प्रदोष...
प्रदोष व्रत को व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है। शास्त्रों के अनुसार मान्यता है कि यह व्रत करने वाला व्यक्ति 84 लाख योनियों के बंधन से मुक्त होकर अंत में उतम लोक की प्राप्ति करते हुए मनुष्य जन्म को सफल बनाता है। मान्यता यह भी है इस दिन भगवान शिव की पूजा करने से जीवनकाल में किये गए सभी पापों का नाश होता है। पुराणों के अनुसार एक प्रदोष व्रत रखने का पुण्य दो गाय दान करने जितना होता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन पूरी निष्ठा से भगवान शिव की अराधना करने से जातक के सारे कष्ट दूर होते हैं और मृत्यु के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
वहीं ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भगवान शनिदेव को मनाने के यूं कई उपाय हैं जिनके द्वारा शनि की शांति होती है, लेकिन इसमें शनि प्रदोष के दिन का खास महत्व है। इसका कारण यह है कि एक तो भगवान शिव शनिदेव के गुरु हैं, वहीं अपने साप्ताहिक दिन में वे अपने गुरु की पूजा से अत्यंत प्रसन्न होते हैंं।
अत: माना जाता है कि यदि इस दिन कोई भी जातक पूरी श्रद्धा व मन से शनि देव की उपासना करें तो उसके सभी कष्ट और परेशानियां निश्चित ही दूर हो जाते हैं साथ ही शनि का प्रकोप, शनि की साढ़ेसाती या ढैया का प्रभाव भी कम हो जाता है।
शनि प्रदोष व्रत कथा
शनि प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीनकाल में एक नगर सेठ थे। सेठजी के घर में हर प्रकार की सुख-सुविधाएं थीं लेकिन संतान नहीं होने के कारण सेठ और सेठानी हमेशा दुःखी रहते थे। काफी सोच-विचार करके सेठजी ने अपना काम नौकरों को सौंप दिया और खुद सेठानी के साथ तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। अपने नगर से बाहर निकलने पर उन्हें एक साधु मिले, जो ध्यानमग्न बैठे थे। सेठजी ने सोचा, क्यों न साधु से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा की जाए।
सेठ और सेठानी साधु के निकट बैठ गए। साधु ने जब आंखें खोलीं तो उन्हें ज्ञात हुआ कि सेठ और सेठानी काफी समय से आशीर्वाद की प्रतीक्षा में बैठे हैं। साधु ने सेठ और सेठानी से कहा कि मैं तुम्हारा दुःख जानता हूं। तुम शनि प्रदोष व्रत करो, इससे तुम्हें संतान सुख प्राप्त होगा। साधु ने सेठ-सेठानी प्रदोष व्रत की विधि भी बताई और भगवान शंकर की यह वंदना बताई।
हे रुद्रदेव शिव नमस्कार।
शिवशंकर जगगुरु नमस्कार।।
हे नीलकंठ सुर नमस्कार।
शशि मौलि चन्द्र सुख नमस्कार।।
हे उमाकांत सुधि नमस्कार।
उग्रत्व रूप मन नमस्कार।।
ईशान ईश प्रभु नमस्कार।
विश्वेश्वर प्रभु शिव नमस्कार।।
इसके बाद दोनों साधु से आशीर्वाद लेकर तीर्थयात्रा के लिए आगे चल पड़े। तीर्थयात्रा से लौटने के बाद सेठ और सेठानी ने मिलकर शनि प्रदोष व्रत किया जिसके प्रभाव से उनके घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ।
शनि प्रदोष व्रत अत्यंत फलदायी...
शनि को मनाने के लिए शनि प्रदोष व्रत बहुत फलदायी है। यह व्रत करने वाले पर शनिदेव की असीम कृपा होती है। शनि प्रदोष व्रत शनि के अशुभ प्रभाव से बचाव के लिए उत्तम होता है। यह व्रत करने वाले को शनि प्रदोष के दिन प्रात:काल में भगवान शिवशंकर की पूजा-अर्चना करनी चाहिए, तत्पश्चात शनिदेव का पूजन करना चाहिए।
वहीं ये भी माना जाता है कि इस दिन दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ करने से जीवन में आ रहीं परेशानियां और शनि के अशुभ प्रभाव से मिलने वाले बुरे फलों में कमी आती है। व्रत करने वाले जातक को यह पाठ कम से कम 11 बार अवश्य करना चाहिए। इसके अलावा शनि चालीसा, शनैश्चरस्तवराज:, शिव चालीसा का पाठ तथा आरती भी करनी चाहिए।
इस व्रत में प्रदोष काल में आरती और पूजा होती है। संध्या के समय जब सूर्य अस्त हो रहा होता है एवं रात्रि का आगमन हो रहा होता है उस प्रहार को प्रदोष काल कहा जाता है।