सीकर

शेखावाटी के उन सूरमाओं की कहानी, जिनसे कांपते थे अंग्रेज; जब दूल्हे के वेश में जाकर किया था आगरा का किला फतेह

सीकर के क्रांतिकारी डूंगर सिंह (डूंगजी) को अंग्रेजों ने धोखे से गिरफ्तार कर आगरा किले में कैद कर दिया था। उन्हें छुड़ाने के लिए उनके भतीजे जवाहर सिंह दूल्हा बने और साथियों के साथ नकली बारात लेकर किले पहुंचे। रणनीति बनाकर उन्होंने अंग्रेजों को परास्त किया और डूंगजी समेत सभी बेकसूर कैदियों को आजाद करा लिया।
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Aug 15, 2026
freedom fighters of rajasthan
स्वतंत्रता सेनानी डूंगजी, जवाहर सिंह, लोटिया जाट और सांवता मीणा की सम्मिलित तस्वीर (फोटो पत्रिका नेटवर्क)

Freedom Fighters of Rajasthan: सीकर: देश की आजादी का इतिहास बलिदानों और बहादुरी की गाथाओं से भरा है। इन्हीं में एक स्वर्णिम पन्ना सीकर जिले के क्रांतिकारी सेनानी डूंगर सिंह (डूंगजी), जवाहर सिंह और लोट सिंह जाट की वीर गाथा का भी है। जिन्होंने आगरा के अभेद किले में फिरंगियों की छाती पर विजय पताका फहराई थी, जिसका जिक्र उस दौरान दिल्ली में छपे अखबारों तक में मिल चुका है।

धोखे से किया गिरफ्तार

डूंगर सिंह और उनके भतीजे जवाहर सिंह बठोठ पाटोदा के ठाकुर थे। देश से खदेड़ने के लिए उन्होंने 1850 के दशक में अंग्रेजों से लोहा लिया था। वे आए दिन उनकी छावनियां लूट लेते। परेशान होकर अंग्रेजों ने सोते हुए डूंगजी को उनके ससुराल से धोखे से गिरफ्तार कर आगरा के किले में कैद कर दिया था।

साधू और दूल्हे के वेश में पहुंचे थे आगरा

इतिहासकार महावीर पुरोहित की सोनार-धरती सिहोट पुस्तक के अनुसार, डूंगर सिंह को आगरा के किले से आजाद करवाने के लिए उनके भतीजे जवाहर सिंह अपने दोस्त अपने मित्र लोट सिंह (लोटिया जाट) और करण सिंह मीणा (करणिया) को साथ लेकर चले। फतेहपुर सीकरी से वे साधु वेश में आगरा पहुंचे। जहां लोट सिंह मोनी बाबा और करण सिंह उनके सेवक के रूप में आगरा के किले में प्रवेश कर डूंगर सिंह के कैदखाने का पता लगाया।

बाद में जवाहर सिंह को दूल्हा बनाकर सैनिक टुकड़ी को बारात के रूप में आगरा किले के सामने ले जाया गया। जहां दूल्हे के मामा की मौत का नाटक रचकर वे वहीं रुक गए। इसी बीच क्रिसमस के त्योहार पर उत्सव के लिए आगरा का दुर्ग खोला गया तो वे भी उसमें घुस गए और अंग्रेजों को परास्त कर डूंगर सिंह को आजाद करवा दिया।

तोख में किया कैद, सबको कराया आजाद

डूंगर सिंह को किले में तोख में कैद किया गया था, जिसमें पैरों से गर्दन तक एक रॉड डालकर कैदी को खड़ा रहने पर ही मजबूर किया जाता था। जवाहर सिंह की टोली ने जब डूंगर सिंह को आजाद कराया तो उन्होंने किले से अकेले निकलने के लिए मना कर दिया।

उन्होंने बाकी बेकसूर कैदियों को भी छुड़वाने की बात कही। इस पर उन्होंने किले से बाकी कैदियों को भी रिहा किया। जिन्होंने भी किले में अंग्रेजों से युद्ध में उनकी मदद की। घटना के बाद अंग्रेज अपनी पूरी ताकत के साथ इनके पीछे पड़ गए, पर ये कभी उनके हाथ नहीं आए। जीवन का अंतिम समय उन्होंने जोधपुर और बीकानेर में बिताया।

अंग्रेजों की नाक में हुआ था दम, अंग्रेजी के अखबारों में आया जिक्र

डूंगर सिंह और जवाहर सिंह ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। उन पर शोध करने वाली पौलेंड निवासी प्रोफेसर एलेक्जेंडर तुरके का कहना है कि दिल्ली के अंग्रेज अधिकारियों के लिए प्रकाशित समाचार पत्रों में हर दूसरे दिन डूंगर सिंह और जवाहर सिंह का जिक्र होता था। आगरा किले की घटना का जिक्र भी उन्हें एक अंग्रेजी अखबार में मिला था।

सच्चे क्रांतिवीर थे…

डूंगर सिंह, जवाहर सिंह और लोट सिंह राजपूत-जाट एकता व वीरता की मिसाल थे। उन्होंने 1857 की क्रांति से पहले ही अंग्रेजों को नाको चने चबवा दिए थे। अंग्रेज उन्हें डाकू कहते थे, लेकिन वे सही मायने में क्रांतिवीर थे। उन्होंने शेखावाटी अंचल में स्वतंत्रता आंदोलन की अलख जलाई थी।
-महावीर पुरोहित, इतिहासकार, सीकर

Updated on:
15 Aug 2026 11:43 am
Published on:
15 Aug 2026 11:43 am