
सीकर। स्वायत्त शासन विभाग के तमाम दावों के बाद भी शिक्षानगरी को दो साल बाद भी मास्टर प्लान की सौगात नहीं मिल पा रही है। विभाग की ओर से प्रारूप प्रकाशन के बाद भी नया मास्टर प्लान सियासत में उलझा हुआ है। विभाग ने पहले पुराने मास्टर प्लान को निरस्त करने और फिर उसमें संशोधन की बात कही, लेकिन इसके बाद भी कोई अंतिम फैसला नहीं हो पाया है।
शहरवासियों की चिंता यह है कि यदि वे मास्टर प्लान के प्रारूप के अनुसार काम करते हैं और बाद में उसमें संशोधन हो जाता है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। मास्टर प्लान को अनलॉक कराने के लिए कई संगठनों की ओर से ज्ञापन भी दिए जा चुके हैं, लेकिन मामला अब भी फाइलों में ही अटका हुआ है। दरअसल, पिछली सरकार के समय शिक्षानगरी का मास्टर प्लान तैयार हुआ था, लेकिन विधानसभा चुनाव की आचार संहिता के कारण इसका प्रारूप प्रकाशित नहीं हो सका। इसके बाद से ही यह मुद्दा सियासत में उलझा हुआ है।
शिक्षानगरी के मास्टर प्लान का मामला दो बार विधानसभा में भी उठ चुका है। सत्ता परिवर्तन के बाद जब यह मुद्दा सामने आया, तो यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने कहा कि मास्टर प्लान में गंभीर अनियमितताएं पाई गई हैं, इसलिए समीक्षा के बाद ही इसे जारी किया जाएगा। लगभग डेढ़ साल बाद विभाग ने समीक्षा पूरी कर प्रारूप जारी किया, लेकिन इसके बाद लोगों ने सुविधा क्षेत्र को शिफ्ट करने सहित अन्य मांगों को लेकर आंदोलन शुरू कर दिए। इसके चलते विभाग ने पहले मास्टर प्लान को निरस्त करने और फिर संशोधित करने की बात कही।
फतेहपुर रोड निवासी फारूक और धोद रोड निवासी सुरेन्द्र सिंह ने बताया कि मास्टर प्लान का इंतजार करते हुए दो साल हो गए हैं। इस वजह से जोनल प्लान भी तय नहीं हो पा रहा है और वे व्यावसायिक गतिविधियों के लिए अपने प्रोजेक्ट शुरू नहीं कर पा रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार को शहर के विकास को ध्यान में रखते हुए मास्टर प्लान को जल्द मंजूरी देनी चाहिए।
मास्टर प्लान की समीक्षा में सामने आया कि एजुकेशन जोन की वजह से सीकर शहर के आसपास के इलाकों में तेजी से बसावट हुई है। यह बसावट अधिकतर बाईपास और गांव-ढाणियों को जोड़ने वाली सड़कों के किनारे हुई है, जिससे मास्टर प्लान की पालना नहीं हो पाई। समीक्षा में यह भी सामने आया कि बाईपास का निर्माण प्रस्तावित एलाइनमेंट के अनुसार नहीं हुआ है। ऐसे में देरी से हालात और बिगड़ने की आशंका है।
किसी भी शहर के लिए मास्टर प्लान बेहद जरूरी होता है। इसके बिना नियोजित विकास की कल्पना संभव नहीं है। मास्टर प्लान को जल्द धरातल पर उतारा जाना चाहिए। यदि विभाग को कहीं त्रुटि लगती है तो उसका दुबारा भौतिक सत्यापन कराया जा सकता है।