
शहर की एक दूकान पर रखा भवन निर्माण के लिए काम आने वाला सरिया। फोटो- पत्रिका
टोंक। मिडिल ईस्ट में युद्ध का असर अब स्थानीय बाजारों तक साफ दिखाई देने लगा है। उत्पादन में कमी और सप्लाई चेन बाधित होने से टोंक शहर में टीन, लोहा, स्टील, एल्यूमिनियम और प्लास्टिक से जुड़े उत्पादों के दामों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इस महंगाई ने न केवल व्यापारियों की कमर तोड़ी है बल्कि आमजन, खासकर मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों के लिए भी रोजमर्रा का जीवन कठिन बना दिया है।
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टीन चादर विक्रेता सुशील कुमार ने बताया कि युद्ध से पहले टाटा टीन लोहे की चादर का भाव 100 रुपए प्रति किलो था, जो अब बढ़कर 105 रुपए प्रति किलो हो गया है। वहीं अन्य कंपनियों की टीन, जो पहले 90 रुपए प्रति किलो मिलती थी, अब 105 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई है। टाटा में कोयले का उपयोग होता है, इसलिए उसमें बढ़ोतरी कम हुई है, लेकिन गैस आधारित उत्पादन वाली कंपनियों के दाम तेजी से बढ़े हैं।
लोहा विक्रेता लोकेश सैनी ने बताया कि भवन निर्माण के काम में आने वाला सरिया (रीबार) के दाम 55 रुपए प्रति किलो से बढ़कर 64 रुपए प्रति किलो हो गए हैं, जिससे मकान बनाने की लागत बढ़ गई है। इनके महंगे होने से भवन निर्माण कार्य भी प्रभावित हो रहा है। एक दुकानदार ने कहा कि महंगे दामों की वजह से नए ऑर्डर आना लगभग बंद हो गए हैं।
पाइप सेनेट्री विक्रेता गिर्राज प्रसाद विजय का कहना है कि प्लास्टिक का कच्चा माल आयात पर निर्भर है, जिससे युद्ध का असर इस क्षेत्र पर भी पड़ा है। पाइप, टंकी, बाल्टी, ड्रम, तिरपाल और अन्य प्लास्टिक उत्पादों के दामों में 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसी प्रकार चीनी के आइटम और टाइल्स पर भी 20 प्रतिशत तथा सभी प्रकार के फिटिंग आइटम पर 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है।
आयरन विक्रेता जमील खान और जाकिर हुसैन ने बताया कि लोहे के भाव 54500 रुपए प्रति टन से बढ़कर 60500 रुपए प्रति टन हो गए हैं। मांग के मुकाबले सप्लाई में 30-40 प्रतिशत की कमी आई है। पहले 3 दिन में माल मिल जाता था, अब 5-7 दिन लग रहे हैं, वह भी पूरी मात्रा में नहीं मिल रहा। अगर हालात ऐसे ही रहे तो भाव 65000 रुपए प्रति टन पार कर सकते हैं। राजेश गर्ग ने बताया कि टोंक में हर माह लगभग 200 टन लोहे की बिक्री होती थी, जो अब घटकर 100-125 टन रह गई है। ग्राहक काम टाल रहे हैं।
बर्तन व्यापारी मनोज कसेरा और विनोद अग्रवाल ने बताया कि एल्यूमिनियम के दाम 330 रुपए प्रति किलो से बढ़कर 445 रुपए प्रति किलो हो गए हैं। वहीं स्टील 170 रुपए से बढ़कर 200 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गया है। इसी प्रकार पीतल 900 से बढ़कर 1100, तांबा 1350 से बढ़कर 1800, कांसी बर्तन 2200 से बढ़कर 2800 रुपए प्रति किलो हो गए हैं। अगर आगे कच्चे माल की आपूर्ति नहीं हुई तो इसमें 10 प्रतिशत तक की और बढ़ोतरी हो सकती है।
बाजार में तैयार माल खत्म होता जा रहा है और मांग का केवल आधा ही सामान उपलब्ध हो पा रहा है। इससे व्यापार पर लगभग 15 प्रतिशत तक असर पड़ा है। अगर युद्ध जल्द नहीं रुका तो दुकानों को बंद करना पड़ सकता है। मजदूरों के सामने बेरोजगारी का संकट खड़ा हो जाएगा।
महंगाई का सीधा असर मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर पड़ रहा है। घर बनाने, मरम्मत कराने या दैनिक उपयोग की वस्तुएं खरीदना महंगा हो गया है। रोजमर्रा के काम प्रभावित हो रहे हैं और परिवारों का बजट बिगड़ता जा रहा है। व्यापारियों का मानना है कि यदि युद्ध जल्द नहीं थमा तो आने वाले दिनों में धातुओं के दामों में 10-15 प्रतिशत तक और वृद्धि हो सकती है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था पर और अधिक दबाव पड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध जारी रहा तो बढ़ती महंगाई, घटती सप्लाई और गिरता व्यापार मिलकर स्थिति को और गंभीर बना सकते हैं। यदि हालात जल्द नहीं सुधरे तो इसका असर व्यापक स्तर पर रोजगार और आम जीवन पर देखने को मिलेगा।
Updated on:
09 Apr 2026 05:02 pm
Published on:
09 Apr 2026 03:42 pm
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