
UP News:अमरोहा में दोस्ती की ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने पूरे गांव को भावुक कर दिया। शहबाजपुर गुर्जर गांव के 65 साल बद्रीनारायण और 60 साल जयपाल सैनी की दोस्ती सालों पुरानी थी। बद्रीनारायण के निधन के बाद जयपाल उन्हें अंतिम विदाई देने तिगरी धाम पहुंचे थे। अंतिम संस्कार के बाद जब वह दोस्त की अस्थियां एकत्र कर रहे थे, तभी अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई और वह चिता के पास ही गिर पड़े। ग्रामीण उन्हें अस्पताल ले गए, जहां डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया।
बद्रीनारायण पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे। परिवार के मुताबिक, बीमारी के दौरान जयपाल सैनी रोज उनका हाल जानने घर पहुंचते थे। गुरुवार शाम बद्रीनारायण का निधन हो गया। शुक्रवार को परिवार और गांव के लोग उनके अंतिम संस्कार के लिए तिगरी धाम पहुंचे। जयपाल भी अपने दोस्त को अंतिम विदाई देने वहां पहुंचे थे। अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी होने के बाद परिजन गंगा तट पर अस्थियां एकत्र करने लगे। जयपाल भी अपने दोस्त की अस्थियां उठा रहे थे। इसी दौरान अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई और वह चिता के पास ही गश खाकर गिर पड़े।
मौके पर मौजूद परिवार के लोगों और ग्रामीणों ने जयपाल को उठाकर होश में लाने की कोशिश की, लेकिन उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। इसके बाद ग्रामीण आनन-फानन में उन्हें गजरौला के एक निजी अस्पताल लेकर पहुंचे। वहां डॉक्टर ने जयपाल को मृत घोषित कर दिया। एक ही दिन में दो दोस्तों की मौत की खबर गांव पहुंची तो शोक की लहर दौड़ गई। बद्रीनारायण के परिवार के साथ ही जयपाल के घर में भी मातम छा गया। गांव में दिनभर दोनों दोस्तों की पुरानी दोस्ती और उनके अंतिम समय तक साथ रहने की चर्चा होती रही।
ग्राम प्रशासक जितेंद्र सैनी ने बताया कि बद्रीनारायण और जयपाल की दोस्ती पूरे गांव में मिसाल थी। दोनों एक-दूसरे के सुख-दुख में हमेशा साथ खड़े रहते थे। किसी ने सोचा भी नहीं था कि बद्रीनारायण को अंतिम विदाई देने पहुंचे जयपाल खुद भी उसी गंगा तट पर दुनिया को अलविदा कह देंगे। गांव के लोगों के बीच यह घटना लंबे समय तक चर्चा में रही। लोगों का कहना है कि दोनों की दोस्ती केवल आपसी मेलजोल तक सीमित नहीं थी, बल्कि परिवारों के बीच भी अच्छे संबंध थे।
बद्रीनारायण के बेटे चंद्रपाल ने बताया कि जयपाल चाचा और उनके पिता की बहुत पुरानी दोस्ती थी। दोनों के बीच पारिवारिक रिश्ते भी थे। उन्होंने बताया कि कोई ऐसा दिन नहीं बीतता था, जब दोनों की मुलाकात न होती हो। दोनों एक-दूसरे से अपनी सभी बातें साझा करते थे।
चंद्रपाल के मुताबिक, उनके पिता और जयपाल की दोस्ती गांव में एक मिसाल थी। बीमारी के दौरान भी जयपाल रोज बद्रीनारायण का हाल जानने पहुंचते थे। शुक्रवार को वह अंतिम यात्रा में भी साथ रहे, लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि दोस्त की अंतिम विदाई के कुछ ही देर बाद जयपाल की भी मौत हो जाएगी।
Updated on:
13 Sept 2026 02:35 pm
Published on:
13 Sept 2026 02:35 pm
