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Success Story: 12वीं में साइकिल से गांव-गांव बेची साड़ियां, अब 8 जिलों में करोड़ों का कारोबार, 30 लोगों को रोजगार

Success Story: दूसरों के कपड़े सिलने वाले विनोद ने खड़ा किया कपड़ों का बड़ा साम्राज्य, भाइयों को भी किया सेट, आज 30 लोगों को दे रहे रोजगार
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फोटो: 42 वर्षीय विनोद नामदेव (Photo Source - Patrika)

फोटो: 42 वर्षीय विनोद नामदेव (Photo Source - Patrika)

Ashoknagar news: सफलता कभी संसाधनों की मोहताज नहीं होती, वह मांगती है तो सिर्फ अटूट इरादे और पक्का जुनून। जिले के मुंगावली कस्बे के 42 वर्षीय विनोद नामदेव की कहानी इसी बात की जीती-जागती मिसाल है। जिस युवक ने 12वीं की पढ़ाई के दौरान चिलचिलाती धूप में साइकिल पर गांव-गांव जाकर साडिय़ां बेचीं और दूसरों के कपड़े सिले, आज वह मप्र और राजस्थान के आठ जिलों का बड़ा होलसेल व्यापारी बन चुका है। एक छोटे से कमरे में तीन सिलाई मशीनों से शुरू हुआ सफर आज उस मुकाम पर पहुंच गया है, जिसकी कल्पना कभी खुद विनोद ने भी नहीं की थी।

विनोद की कहानी साल 2002 से शुरू होती है। उस वक्त वे 12वीं कक्षा में थे, जब पढ़ाई के साथ परिवार की मदद के लिए साइकिल पर साडिय़ां बेचना शुरू किया। करीब दो साल तक वे गांव-गांव भटके। इसके बाद घर पर ही तीन सिलाई मशीनें रखकर कपड़े सिलने का काम शुरू किया। शुरुआत में वे अन्य दुकानदारों के कपड़े सिलते थे। इसी बीच बीएससी तक की पढ़ाई भी पूरी की। इसके बाद खुद कपड़ा खरीदकर और उसकी शर्ट बनाकर दुकानदारों को बेचने लगे।

वो एक 'ताना', जिसने बदल दी जिंदगी

कहते हैं कि कभी-कभी किसी की कड़वी बात जिंदगी में मील का पत्थर साबित होती है। विनोद के साथ भी ऐसा ही हुआ। वह जिस दुकानदार के कपड़े सिलते थे, उसने एक दिन विनोद से कहा कि तुम इसी सिलाई तक सीमित रहो, सपने मत देखो। यह बात विनोद के दिल में तीर की तरह चुभ गई। इसी ताने ने उनके अंदर एक ऐसी जिद पैदा की, जिसने उन्हें एक साधारण दर्जी से एक बड़ा कारोबारी बना दिया।

कारीगरी से लेकर महानगरों की मंडियों तक का सफर

सिलाई के काम में जब विनोद को कारीगरों की समस्या आने लगी, तो उन्होंने रणनीति बदली। खुद कपड़े सिलने के बजाय कोलकाता, दिल्ली, मुंबई, लुधियाना, पानीपत, सूरत और अहमदाबाद जैसी देश की बड़ी मंडियों से रेडीमेड कपड़े और साडिय़ां लाना शुरू किया। शुरुआत में वे खुद दुकान-दुकान जाकर फुटकर व्यापारियों को माल बेचते थे। इसके बाद मुंगावली में साड़ी की एक छोटी सी दुकान खोली। जब व्यापार बढ़ा तो उन्होंने गुना शहर का रुख किया और वहां होलसेल का काम शुरू कर दिया। साल 2016 के बाद उनके होलसेल कारोबार ने ऐसी रफ्तार पकड़ी कि पीछे मुडक़र नहीं देखना पड़ा।

30 लोगों को दिया रोजगार

आज विनोद रेडीमेड, बिना सिले कपड़े और साडिय़ों के बड़े सप्लायर हैं। उनका माल अशोकनगर, गुना, विदिशा, राजगढ़ और ब्यावरा के साथ-साथ राजस्थान के छबड़ा और छीपा बड़ौद सहित 8 जिलों में सप्लाई होता है। जिस विनोद को कभी एक दुकानदार ने सपने देखने से रोका था, आज उसी विनोद ने अपने तीन भाइयों को भी इसी बिजनेस में सेट कर दिया है। इतना ही नहीं, सेल्समैन से लेकर रिकवरी एजेंट तक करीब 30 लोगों को उन्होंने रोजगार दे रखा है।

सफलता का मूल मंत्र: जुबान की पक्की कीमत

विनोद की इस सफलता के पीछे उनका खास उसूल है, समय पर भुगतान। व्यापार की शुरुआत में जब एक व्यापारी से उधार में कुछ माल खरीदा तो समय से पहले उसका पैसा चुकाया। इस ईमानदारी ने बड़े व्यापारियों के बीच ऐसा भरोसा कायम किया कि आज उन्हें लाखों का माल सिर्फ उनकी साख (क्रेडिट) पर मिल जाता है।

युवाओं के लिए विनोद की कहानी के 3 बड़े सबक

  • आलोचना को हथियार बनाएं: जब लोग आप पर हंसें या कहें कि तुम यह नहीं कर सकते, तो निराश न हों। खुद को साबित करने के लिए दोगुनी मेहनत करें।
  • शुरुआत छोटी, पर सपने बड़े हों: साइकिल पर माल बेचने या घर में सिलाई करने में कोई शर्म नहीं है। कोई भी काम छोटा नहीं, विजन बड़ा है, तो सफलता जरूर।
  • बाजार में भरोसा सबसे बड़ी पूंजी: पैसे समय से पहले चुकाने की आदत डालें, व्यापार में पैसा बाद में आता है, साख (क्रेडिबिलिटी) पहले बनानी पड़ती है।