
गायत्री देवी-(Photo Source - Patrika)
Ashoknagar news: दुनिया भर में अपनी खास पहचान रखने वाली चंदेरी साड़ी के ताने-बाने में सिर्फ रेशमी धागे ही नहीं, बल्कि कई बुनकरों के पसीने, संघर्ष और सफलता की कहानियां भी गुंथी होती हैं। ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है चंदेरी के वार्ड-2, पसियापुरा निवासी गायत्री देवी (48) की। कभी एक वक्त था जब आर्थिक समस्या के कारण वे अपनी पसंद की साड़ी नहीं खरीद पाई थीं। उस कसक ने उन्हें ऐसा हौसला दिया कि आज वह खुद 3 हजार से ज्यादा साडियां बून चुकी है और सफलता सफल के उस शिखर शिखर पर है, जहां पहुंचने का हर कोई सपना देखता है।
गायत्री देवी बताती है कि वर्षों पहले वह एक दुकान पर साड़ी खरीदने गई, तो उन्हें एक साड़ी बहुत पसंद आई। लेकिन वह महंगी थी और उनके पास इतने पैसे नहीं थे। मन मसोस कर रह जाने के बजाय, उन्होंने ठान लिया कि जो साड़ी वह खरीद नहीं सकतीं, उसे वह खुद बनाएंगी। गायत्री ने बचपन में अपने पिता नारायण दास को करघा चलाते देखा था। बस, उसी हुनर को अपना हथियार बनाया और पिता से बुनाई की बारीकियां सीख लीं।
गायत्री देवी ने बुनाई के काम से ही अपने पूरे परिवार का पालन- पालन-पोषण किया। बेटी की शादी शादी भी इसी मेहनत की कमाई से धूमधाम से की। शिक्षा का महत्व समझते हुए अपने दोनों बेटों को ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई करवाई। पढ़ाई के साथ उन्हें बुनाई के कार्य में भी निपुण कर दिया। आज उनके दोनों बच्चे इस कला को आगे बढ़ाते हुए परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रहे रहे है। जिस गायत्री ने कभी अभावों का दौर देखा था, आज उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से खुद के नाम पर एक पक्का मकान खरीद लिया है। इस नए मकान में अब तीन करघे स्थापित है और पूरा परिवार एक समृद्ध और खुशहाल जीवन जी रहा है
पिछले 30 सालों से गायत्री देवी लगातार करघे पर अपनी उंगलियों का जादू बिखेर रही हैं। अब तक वे अड्डा किनार, जंगला, दाढ़ीदार, वानेवार, किनार जंगला, पाइपिंग, करीना साड़ी, सूट्स, स्ट्राइव, पटोला, टिशु और शोल्डर जैसी अनगिनत वैरायटी की तीन हजार से अधिक साड़ियां बुन चुकी हैं। उन्होंने साबित कर दिया है कि कला किसी की मोहताज नहीं होती।
पैसे के अभाव में जिंदगी शुरू करने वाली गायत्री देवी की कहानी बताती है कि अगर इंसान में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो वह अपनी किस्मत खुद बुन सकता है। आज वे चंदेरी ही नहीं, बल्कि प्रदेश की हर उस महिला के लिए एक मिसाल बन गई हैं, जो आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं।
गायत्री देवी के पिता नारायण दास भी एक सिद्धहस्त बुनकर हैं, उनकी कला को सम्मान देते हुए वर्ष 2011-12 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने उन्हें राज्य स्तरीय कबीर पुरस्कार से सम्मानित किया था। पिता की इसी उपलब्धि से प्रेरित होकर अब गायत्री देवी भी एक बेहद खास और नवीन कलाकृति वाली साड़ी तैयार कर रही हैं। वे वर्ष 2026-27 के राज्य स्तरीय कबीर पुरस्कार के लिए अपनी यह विशेष साड़ी शासन को भेजेंगी।
Updated on:
04 Sept 2026 02:17 pm
Published on:
04 Sept 2026 02:17 pm
