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समता, न्याय, करुणा से होगा जीवन सुंदर

उन्होंने कहा कि पहली बात समता की है। समता का मतलब है जीवन मे बैलेंस लेकर चलना

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समता, न्याय, करुणा से होगा जीवन सुंदर

बेंगलूरु. कर्नाटक में बेंगलूरु के फ्रेजर टाउन जैन स्थानक में विराजित उपाध्याय रवीन्द्र मुनि ने रविवार को जीवन को सुंदर बनाने के उपायों पर चर्चा करते हुए लोगों को सुंदर जीवन जीवन जीने की प्रेरणा दी और कहा कि समता, न्याय और करुणा जैसे उपाय से जीवन सुंदर बन सकता है। उन्होंने कहा कि पहली बात समता की है। समता का मतलब है जीवन मे बैलेंस लेकर चलना। सम होना जीवन की बड़ी से बड़ी उपलब्धियों में से एक है।

अनुकूल प्रतिकूल, सुख दु:ख, जीवन मरण, लाभ हानि में मन को संभाले रखना बड़ी बात है। समता रहित व्यक्ति शांति नहीं पा सकता। जीवन को सुंदर रूप देने वाला दूसरा सूत्र न्याय का है। न्याय हमारे जीवन का आधार परिवार, समाज, संगठनों का आधार है। आज अगर हमारे जीवन में, परिवारों में, समाजों में हम टूटन और बिखराव का कारण न्याय की कमी का होना ही है।

तीसरे सुंदर सूत्र की बात करते हुए मुनि ने करुणा की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि यह एक आवश्यक जीवन मूल्य है, जिसे कम ही लोग मूल्य दे पाते हैं। लोगों में करुणा का अभाव है यही कारण है कि भेद की दीवार दिन प्रतिदिन ऊंची हो रही हैं। लोग अपने से आगे और कुछ न देख पाते हैं न सुन पाते हैं न ही सोच पाते हैं।

सम्यक ज्ञान पर टिकी है भारतीय संस्कृति
मंड्या. सुमतिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्वावधान में आराधना भवन में रविवार को आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि वृक्ष जड़ की आधार पर टिका रहता है। पर जड़ जमीन के अंदर होने के कारण हमें दिखाई नहीं पड़ती है। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति का मूल नींव सम्यक ज्ञान पर टिका हुआ है, इसका मूल स्रोत पाठशाला है।

अगर पाठशाला की नींव कमजोर हो जाए तो हमारी संस्कृति की नींव नहीं टिक सकती। सम्यग ज्ञान बढ़ेगा तो संस्कार के साथ हमारी संस्कृति जीवित बचेगी। तत्व जितना खोखला होता जाएगा, उतनी हमारी संस्कृति खत्म होती जाएगी। बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ सदाचार व शिष्टाचार का ज्ञान करवाना चाहिए। संस्कृति जानने के लिए धार्मिक पाठशालाओं में बच्चों को भेजना चाहिए।