हिन्दी तो बस हिन्दी है । मां के सिर की बिन्दी है ।। उर्दू, अरबी या फिर चीनी, अंग्रेजी हो या जापानी, सारे जग में सबसे सुन्दर, सबसे मीठी हिन्दी है । हिन्दी तो बस हिन्दी है । मां के सिर की बिन्दी है ।। हिन्दी मातृभाषा है , जनगणमन की आशा है, आज खुले में, नीलगगन में, नही किसी की बन्दी है । हिन्दी तो बस हिन्दी है । मां के सिर की बिन्दी है ।। हिन्दी जैसे गंगा-जमुना, ज्यूं सबुह का सच्चा सपना, मुंह खुले रसधार बहे, श्वास-श्वास में हिन्दी है । हिन्दी तो बस हिन्दी है । मां के सिर की बिन्दी है ।। माटी की है सौरभ इसमें, हम सबका है गौरव इसमें, हिन्दी से पहचाने जाते, हर बात हमारी हिन्दी है । हिन्दी तो बस हिन्दी है । मां के सिर की बिन्दी है ।। हिन्दी तो बस हिन्दी है । मां के सिर की बिन्दी है ।। गीतकार- - मुकेश अमन बाड़मेर राजस्थान