कुछ साल पहले अकाल की मार के चलते पशुपालन के प्रति लोगों की रुचि कम हो रही थी लेकिन अब एक तरफ जहां सिंचित खेती होने से हरा चारा घर में मिल रहा है तो दूसरी ओर गोबर का उपयोग खेती में होने से किसान वर्ग पशुपालन में भी रुचि रख रहा है। यहीं कारण है कि पिछले पशुधन बढ़ा है। वहीं जैविक खाद की मांग भी होने लगी है। रसायनिक खाद की जगह जैविक खाद- जिले में सिंचित खेती शुरू हुई तो रसायनिक खाद की मांग ज्यादा रही, लेकिन धीरे-धीरे किसानों में जागरूकता आई। उनको रसायनिक खाद के दुष्परिणामों की जानकारी हुई तो फिर से देसी खाद की ओर लौटने लगे हैं। जिले में अधिकांश किसान अब जैविक खाद का उपयोग कर रहे हैं। गौरतलब यह है कि खरीफ की बुवाई करीब १९ लाख हैक्टेयर में होती है, जिसमें रसायनिक खाद का उपयोग तक नहीं हो रहा। घर बैठे बुकिंग, नकद भुगतान- जैविक खाद की बढ़ती मांग के चलते बड़े किसानों ने रेवड़ या गोवंश के टोले वाले पशुपालकों से बुकिंग शुरू कर दी। पूरे साल में जो भी खाद होती है, उसकी वे खरीदारी करते हैं जिसके बदले में नकद भुगतान मिल रहा है। जानकारी के अनुसार बाड़मेर और आसपास के क्षेत्रों में २०००- २२०० रुपए ट्रैक्टर ट्रॉली के पशुपालकों को दिए जा रहे हैं।