कमाई अच्छी पर उपज नहीं- सांगरी बीनने वाले ग्रामीणों के अनुसार दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद वे कच्ची सांगरी चुनकर बाजार में ले आते हैं। जिसका भाव सौ-डेढ़ सौ रुपए मिलता है। मांग भी ज्यादा है लेकिन उपज कम होने से पर्याप्त मात्रा में सांगरी नहीं मिल रही। एेसे में कमाई कम हो रही है। प्रवासी राजस्थानियों की भी पसंद- केर, सांगरी, कुमटिया, काचरी आदि पचकुटा की सब्जी अब शादियों में स्टेटस बन गई है। वहीं अप्रवासी राजस्थानी तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, पश्चिमी बंगाल सहित कई राज्यों में ऑर्डर देकर मंगवाते हैं। वहां पर इनकी जबरदस्त मांग है। सांगरी कम मात्रा में लगी- अबकी बार खेजड़ी पर गंठुड ज्यादा लगे, सांगरी कम मात्रा में है। हालांकि सांगरी व केर की मांग ज्यादा रहती है, लेकिन कम उत्पादन से थोड़ी चिंता है।- हरीराम, किसान पादरू