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भरतपुर : महज ढाई साल के बेटे को छोड़कर गई थी मां, 25 साल बाद मिली तो नहीं थमे आंसू

कभी जिस मां को परिवार ने समय और परिस्थितियों के थपेड़ों में खो दिया था, उसी मां ने 25 साल बाद अचानक अपने बच्चों के सामने आकर जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी दे दी। अपना घर आश्रम में शुक्रवार को ऐसा भावुक दृश्य देखने को मिला, जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम कर दीं।

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Bharatpur ashram

25 साल बाद मिलता परिवार (फोटो-पत्रिका नेटवर्क)

भरतपुर। करीब 25 साल पहले मानसिक अवसाद के चलते घर से बिछड़ी एक मां जब अचानक अपने बच्चों के सामने पहुंची तो भावनाओं का ऐसा सैलाब उमड़ा कि हर आंख नम हो गई। जिन बेटियों की विदाई वह कभी नहीं देख सकी और जिस बेटे ने मां का साया बचपन में ही खो दिया था, वह शुक्रवार को अपना घर आश्रम में उनसे लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़ा। बरसों के इंतजार, दर्द और अधूरी यादों के बीच हुआ यह मिलन न सिर्फ एक परिवार के पुनर्मिलन की कहानी है, बल्कि उम्मीद, ममता और रिश्तों की अटूट ताकत की मार्मिक मिसाल भी बन गया।

यह कहानी है प्रभुजी सुखदेई की, जो करीब 25 वर्ष पहले मानसिक अवसाद के चलते घर से निकल गई थीं। उस समय उनकी बड़ी बेटी 10 वर्ष, छोटी बेटी 7 वर्ष और बेटा रोहित महज ढाई साल का था। पति बचन ने पत्नी की तलाश में हर संभव प्रयास किए, लेकिन सफलता नहीं मिली।

यहां देखें वीडियो :

इलाज के बाद लौटी यादें

आखिरकार परिवार ने उन्हें खोया हुआ मान लिया। समय बीतता गया, बेटियां बड़ी हुईं, उनकी शादियां हो गई और वर्ष 2022 में पति बचन भी इस दुनिया को अलविदा कह गए। कुछ माह पहले 16 सितंबर 2025 को जोधपुर की टीम ने सुखदेई को रेस्क्यू कर अपना घर आश्रम भरतपुर पहुंचाया। उपचार और देखभाल के बाद जब उनकी स्मृतियां लौटने लगीं तो उन्होंने अपना पता गांव आकमपुरए जिला उन्नाव उत्तर प्रदेश बताया।

अपनों को ही नहीं पहचान पाई आंखें

पते की जानकारी मिलने के बाद आश्रम की पुनर्वास टीम ने परिवार से संपर्क साधा। शुक्रवार को जब बेटी सोमवती, बेटा रोहित, दामाद धनपाल और ग्राम प्रधान प्रतिनिधि गोकरण आश्रम पहुंचे तो वर्षों के अंतराल और बदले चेहरों के कारण कोई किसी को पहचान नहीं पाया, लेकिन जैसे ही परिचय कराया गया, भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। बेटियों की आंखों से आंसू बह निकले, बेटे ने मां को गले लगाकर वर्षों की कमी पूरी करने की कोशिश की और वहां मौजूद हर व्यक्ति इस मिलन का साक्षी बन भावुक हो उठा।

नहीं किया कन्यादान, देखकर मिला सुकून

सुखदेई की आंखों में इस बात का दर्द था कि है कि वे अपनी बेटियों का कन्यादान नहीं कर सकीं, लेकिन अब अपने भरे-पूरे परिवार को देखकर उनके चेहरे पर सुकून और संतोष साफ झलकता नजर आया। यह महज एक पुनर्मिलन नहीं, बल्कि बिछड़े रिश्तों के फिर से जुड़ने, उम्मीद के लौटने और परिवार के अनमोल होने की जीवंत मिसाल बना।