
काजलदान-सिंदूरदान का अनोखा संग्रह (फोटो सोर्स- पत्रिका)
Traditional Jewellery Collection: सुंदर दिखने की चाह नई नहीं है। आज कॉस्मेटिक उत्पादों की भरमार है, लेकिन आठ-दस दशक पहले श्रृंगार के लिए इस्तेमाल होने वाले साधन अब दुर्लभ हो चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय सौंदर्य दिवस पर भिलाई का एक अनोखा संग्रह लुप्त होती इसी परंपरा की याद दिलाता है। भिलाई सेक्टर-7 निवासी एलसी कश्यप के पास प्राचीन और पारंपरिक सौंदर्य साधनों के 70 दुर्लभ नमूने हैं। इनमें सिंदूरदान, काजलदान और सूरमेदान प्रमुख हैं। 80 से 90 साल पुराने ये साधन पीतल, कांसे और अन्य धातुओं से बने हैं।
इन पर हाथी, मोर, मछली, फूल और जालीदार पत्तियों की बारीक ढोकरा नक्काशी है। कई काजलदान में छोटा आईना और उसे कमर में टांगने के लिए कुंडा भी लगा है।
80-100 साल पुराना पीतल-कांसे का काजलदान। ढक्कन पर छोटा आईना, पीछे कमर में टांगने के लिए कुंडा और हाथी, मोर व फूल की ढोकरा नक्काशी।
पीतल-कांसे की प्राचीन डिबिया। इस पर कछुआ, फूल, देवी का चेहरा और पान के पत्ते जैसी बारीक नक्काशी की गई है। आजकल यह बाजार में मिलना मुश्किल है।
पुरुषों के सुरमा लगाने की डिबिया। पीतल से बनी इस डिबिया के साथ नक्काशीदार सलाई है। मछली आकार की डिजाइन को शुभ और नजर से बचाने वाला माना जाता था।
आधुनिक कॉस्मेटिक उत्पादों के दौर में ये पारंपरिक साधन उपयोग से बाहर हो गए हैं। कश्यप का संग्रह इन्हें संजोकर रखने के साथ नई पीढ़ी को पुरानी श्रृंगार परंपरा और ढोकरा शिल्प से भी जोड़ रहा है। इस संग्रह को वर्ष 2021 में गोल्डन बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया था।
कश्यप ने बताया कि इस संग्रह को जुटाने में 12 से 15 साल लगे। उन्होंने छत्तीसगढ़ के अलावा राजस्थान और मध्यप्रदेश के हाट-बाजारों और पुराने घरों से इन्हें एकत्र किया। पुराने समय में काजलदान स्त्री और सूरमेदान पुरुष श्रृंगार का हिस्सा माने जाते थे। मछली आकार के सूरमेदान को शुभ और बुरी नजर से बचाने वाला माना जाता था।
Updated on:
10 Sept 2026 10:30 am
Published on:
10 Sept 2026 10:19 am
