10 सितंबर 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

80 साल पुराने काजलदान-सिंदूरदान में छिपी श्रृंगार की विरासत, भिलाई के एलसी कश्यप ने सहेज रखे 70 दुर्लभ साधन

International Beauty Day 2026: अंतरराष्ट्रीय सौंदर्य दिवस पर भिलाई के एलसी कश्यप का अनोखा संग्रह पुरानी श्रृंगार परंपरा की याद दिलाता है। उनके पास 80 से 100 साल पुराने 70 दुर्लभ सौंदर्य साधन हैं, जिन्हें उन्होंने वर्षों की मेहनत से जुटाया है।
2 min read
Google source verification
rare collection of kajaldans sindur dans belonging to Bhilai LC Kashyap

काजलदान-सिंदूरदान का अनोखा संग्रह (फोटो सोर्स- पत्रिका)

Traditional Jewellery Collection: सुंदर दिखने की चाह नई नहीं है। आज कॉस्मेटिक उत्पादों की भरमार है, लेकिन आठ-दस दशक पहले श्रृंगार के लिए इस्तेमाल होने वाले साधन अब दुर्लभ हो चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय सौंदर्य दिवस पर भिलाई का एक अनोखा संग्रह लुप्त होती इसी परंपरा की याद दिलाता है। भिलाई सेक्टर-7 निवासी एलसी कश्यप के पास प्राचीन और पारंपरिक सौंदर्य साधनों के 70 दुर्लभ नमूने हैं। इनमें सिंदूरदान, काजलदान और सूरमेदान प्रमुख हैं। 80 से 90 साल पुराने ये साधन पीतल, कांसे और अन्य धातुओं से बने हैं।

इन पर हाथी, मोर, मछली, फूल और जालीदार पत्तियों की बारीक ढोकरा नक्काशी है। कई काजलदान में छोटा आईना और उसे कमर में टांगने के लिए कुंडा भी लगा है।

काजलदान या काजलौटा

80-100 साल पुराना पीतल-कांसे का काजलदान। ढक्कन पर छोटा आईना, पीछे कमर में टांगने के लिए कुंडा और हाथी, मोर व फूल की ढोकरा नक्काशी।

सिंदूरदान

पीतल-कांसे की प्राचीन डिबिया। इस पर कछुआ, फूल, देवी का चेहरा और पान के पत्ते जैसी बारीक नक्काशी की गई है। आजकल यह बाजार में मिलना मुश्किल है।

सूरमेदान

पुरुषों के सुरमा लगाने की डिबिया। पीतल से बनी इस डिबिया के साथ नक्काशीदार सलाई है। मछली आकार की डिजाइन को शुभ और नजर से बचाने वाला माना जाता था।

नई पीढ़ी को पुरानी परंपरा से जोड़ रहे

आधुनिक कॉस्मेटिक उत्पादों के दौर में ये पारंपरिक साधन उपयोग से बाहर हो गए हैं। कश्यप का संग्रह इन्हें संजोकर रखने के साथ नई पीढ़ी को पुरानी श्रृंगार परंपरा और ढोकरा शिल्प से भी जोड़ रहा है। इस संग्रह को वर्ष 2021 में गोल्डन बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया था।

15 साल लगे संग्रह बनाने में

कश्यप ने बताया कि इस संग्रह को जुटाने में 12 से 15 साल लगे। उन्होंने छत्तीसगढ़ के अलावा राजस्थान और मध्यप्रदेश के हाट-बाजारों और पुराने घरों से इन्हें एकत्र किया। पुराने समय में काजलदान स्त्री और सूरमेदान पुरुष श्रृंगार का हिस्सा माने जाते थे। मछली आकार के सूरमेदान को शुभ और बुरी नजर से बचाने वाला माना जाता था।