ये राजधानी है, यहां दोगले व्यवहार के लिए तैयार रहें

रेस्टोरेशन के इंतजार में नारकीय स्थिति में अनेक कॉलोनियां, कोलार से लेकर गुलमोहर, बावडिय़ा कला, शाहपुरा, मैनिट क्षेत्र, नेहरू नगर, होशंगाबाद रोड मिसरोद और अन्य क्षेत्रों में खुदी पड़ी हैं सड़कें

By: pankaj shrivastava

Published: 21 Jul 2021, 11:23 PM IST

टिप्पणी

पंकज श्रीवास्तव

राजधानी में रहना आसान नहीं है। यहां आपको दोगले व्यवहार के लिए हमेशा तैयार रहना होगा। यहां आम और खास की सुविधाओं के बीच ऐसी खाई है जिसे देखकर आपके मन में बेहद पीड़ा उठेगी। यदि आप इस पीड़ा पर काबू कर सकते हैं तभी आप राजधानी में बसने की हिम्मत करें, अन्यथा नहीं। ऐसे तो बहुत से मामले हैं जो इस अंतर को बयां कर सकते हैं पर फिलहाल हम यहां रेस्टोरेशन के विषय में बात करेंगे।

तो मुद्दा ये है कि भोपाल शहर यानी राजधानी में सीवेज के लिए करीब 400 किमी की लाइनें बिछाई जा रही हैं। ये आप विभिन्न क्षेत्रों की सड़कों पर हिचकोले खाकर या वहां धूल और कीचड़ में फंसकर समझ ही रहे होंगे। तो काफी कुछ काम तो हुआ है और इसमें से अभी 100 किमी की लाइनें बिछाई जाना बाकी है। ये सभी काम अमृत प्रोजक्ट के तहत हो रहा है। नामकरण ही ऐसा है कि उसके नाम पर जहर भी दिया जाएगा तो कोई क्या सवाल करेगा।

sewerage project
IMAGE CREDIT: patrika

सड़क की खुदाई होगी तो रेस्टोरेशन भी किया जाएगा जाहिर सी बात है। तो 50 फीसदी रेस्टोरशन यानी करीब २०० किमी के लगभग पूरा कर लिए जाने का दावा किया गया है। इसके लिए भी अफसर अपनी पीठ पर कई शाबासी ठुकवा चुके होंगे। 300 करोड़ खर्च हुए हैं अभी तक । अब बारिश आ चुकी है और एक बड़े क्षेत्र में रेस्टोरेशन का काम अधूरा है। बारिश हमारे देश में मौसम कम बहाना ज्यादा होता है। इस बहाने को भुनाया सबसे ज्यादा निर्माण क्षेत्र में जाता है। और निर्माण यदि सार्वजनिक हो तो फिर बारिश का होना भी बहाना और न होना भी बहाना है।

अब इस रेस्टोरेशन में आम और खास में फर्क कहां से आया। तो फर्क ये है कि वीवीआईपी क्षेत्रों में जहां भी रेस्टोरशन हुआ वहां के काम की गुणवत्ता और आम क्षेत्रों में काम की गुणवत्ता आप देख लें फर्क समझ जाएंगे। जहां वीआईपी निवास हैं वो बारिश से पहले जस की तस स्थिति में आ गए और बाकी को छोड़ दिया गया नारकीय कष्ट भोगने के लिए। आधी सड़क गायब, बची आधी में कीचड़ का साम्राज्य। परेशान लोगों के लिए कुछ शेष बचा तो आश्वासन। आश्वासन एक अचूक दवा है। आम आदमी इसी पर आधा जीवन निकाल जाता है। खैर जिन कार्यों के लिए अप्रेल 2020 का समय तय था उसे बढ़ा दिया। अब दिसंबर 2021 तक का समय ले लिया। अब समय के कहां पैसे लगते हैं। पैसे तो आम आदमी के टैक्स के हैं। उनकी चिंता किसको है?

निर्माण कार्य के लिए कुछ शर्तें भी होती हैं। जैसे सड़क निर्माण या खुदाई के दौरान निर्माता कंपनी को वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था करनी होगी। लेकिन शहर में वीआईपी क्षेत्र छोड़ दें तो शेष कहीं ऐसा कुछ भी नजर नहीं आया। जैसी रोड थी वैसी ही बनानी है ये नियम तो ठीक है, लेकिन जितनी खोदी थी उतनी ही बनानी है ये कमाल का नियम है। इस नियम को बहुत गंभीरता से लिया जाता है। उसी का नतीजा है कि कहीं रोड ऊंची और कहीं नीची हो जाती है। खैर करीब-करीब चौथाई शहर इस रेस्टोरेशन के इंतजार में परेशान है। अफसर कंपनी पर और कंपनी मौसम पर आरोप लगा रहे हैं। जल्द काम पूरा होते दिख नहीं रहा है। तो या तो वीआईपी क्षेत्र में निवास खोज लें या फिर दोगले व्यवहार को आत्मसात कर लें क्योंकि हर राजधानी में ये तो होना ही है।

pankaj shrivastava Zonal Head
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