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स्त्री के बिना जीवन की कल्पना नहीं, फिर भी होता रहा है शोषण

क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान के नाट्य कार्यशाला में तैयार नाटक 'आद्य नायिका' का मंचन
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स्त्री के बिना जीवन की कल्पना नहीं, फिर भी होता रहा है शोषण

भोपाल। क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान के नाट्य कार्यशाला में तैयार नाटक 'आद्य नायिका' का मंचन सोमवार को किया गया। इसके लेखक डॉ. अरुणाभ सौरभ और निर्देशक निलेश दीपक हैं। प्रस्तुति बीएससीबीएड छठवें सेमेस्टर के स्टडेंट्स ने प्रस्तुति दी। नाटक में इतिहास, मिथक और वर्तमान तीनों को एक साथ प्रस्तुत कर रचनात्मक आयाम दिया गया है। नाटक में दिखाया गया कि दीदारगंज की यक्षिणी सौ साल बाद एक नई छवि के साथ सामने आती है। एक राज्य में ऐसी स्त्री के स्त्रीत्व की तलाश की जाती है, जिनमें अथाह शक्तियां हैं।

डायरेक्टर ने बताया कि यह नाटक वैभवशाली मगध और अखण्ड भारत की राजधानी पाटलिपुत्र के उत्थान और पतन की कहानी है। 'यक्षिणी ' के सहारे देवलोक, गंधर्वलोक से लेकर मृत्युलोक तक पसरी पितृसत्तात्मक संरचना को भी प्रश्नांकित करता है जिसमें स्त्रियों का सदा से ही शोषण किया जाता रहा है। जबकि स्त्री के बिना देव पुरुष हो या गंधर्व या सामान्य पुरुष, किसी के अस्तित्व की कल्पना संभव नहीं है।

मानव संग्रहालय में व्याख्यान का आयोजन
भोपाल। मानव संग्रहालय की ओर से विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर मानव एवं प्रकृति के अंतर्सम्बन्ध विषय पर संवाद कार्यक्रम हुआ। इसकी अध्यक्षता प्रशासनिक अधिकारी राकेश कुमार भट्ट ने की। संग्रहालय सहायक गीतू याइखोम ने जैव सांस्कृतिक अनुकूलन पर अपने विचार साझा किए। संग्रहालय एसोसिएट गरिमा ने परम्पराओं में प्रकृति पूजा और अन्योन्याश्रिक्ता पर वक्तव्य दिया। रसायनज्ञ एसके सिंह ने वनों की कटाई और नदियों का प्रदूषण और कारक मानवीय हस्ताक्षेप पर विचार दिए। प्रशासनिक अधिकारी राकेश कुमार भट्ट ने पानी, पशु और वृक्षों जैसे प्राकृतिक संसाधनों के सीमित और विचार पूर्वक उपयोग पर बल दिया और सुझाव प्रस्तुत किए। डॉ. आर.एम.नयाल, सहायक क्यूरेटर ने पहाड़ी क्षेत्रों की परम्पराओं का उदाहरण देते हुए मानव प्रकृति के परस्पर सम्बन्धों और उनमें बदलाव पर प्रकाश डाला। एचबीएस परिहार, कैमरा मेन ग्रेड-2 ने जीवन शैली में बदलाव और प्रकृति के प्रति व्यवहार ने हमारे पर्यावरण सहित स्वास्थ्य को प्रमाणित किया। तापस बिस्वास, फोटोग्राफिक अधिकारी ने मानव प्रकृति अंतर्सम्बन्धों को गुरू शिष्य के संदर्भ में देखते हुए कहा कि प्राकृतिक आपदाएं हमें हमारे सीमित और सामंजस्यपूर्ण व्यवहार का संकेत देती है।