
MP Monsoon 2026: इस बार मानसून 2026 को लेकर कई आशंकाएं, अब जामुन के पेड़ की लोकमान्यता कहती है बारिश बहुत कम होगी, कुछ बोले झमाझम होगी बरसात। (फोटो सोर्स: AI जनरेटेड)
MP Monsoon 2026: मध्यप्रदेश में मानसून की औपचारिक दस्तक भले ही अभी कुछ क्षेत्रों तक सीमित हो, लेकिन 13 जून 2026 की मौसमी परिस्थितियां स्पष्ट संकेत दे रही हैं कि प्रदेश का वातावरण तेजी से बदल रहा है। मानसून तारी होने को है। रात के तापमान में उल्लेखनीय गिरावट, हवा में बढ़ती नमी और कई जिलों में हुई बारिश यह संदेश दे रही है कि तपती गर्मी और उमस का दौर जल्द ही खत्म होने को है। वर्षा ऋतु का स्वागत करने का समय आ गया है। वैज्ञानिकों की भाषा से इतर एमपी के बुजुर्गों का कहना है कि इस बार जामुन के पेड़ों पर खूब फल लगे हैं, इनकी डालियां फलों के बोझ से झुकी हैं।
ऐसे में इस बार मानसून की मेहरबानी कम रहने वाली है। जबकि कई ग्रामीण इसे अच्छी बारिश का संकेत मान रहे हैं। मानसून का इंतजार कर रहे प्रदेशवासियों क्या आपने कभी सुना है कि जामुन पर फल ज्यादा लदें तो मौसम में बड़ा बदलाव नजर आएगा। मानसून या बारिश को लेकर लोक मान्यता के बारे में patrika.com ने बात की मौसम, पर्यावरण और जलवायु विश्लेषक शैलेंद्र नायक से। जानें क्या है इन लोकप्रिय बातों का सच और एल नीनो एक्टिव हो गया है, तो सवाल तो है इस बार कैसा रहने वाला है MP Monsoon 2026?
शैलेंद्र नायक बताते हैं कि यह लोक ज्ञान या लोकमान्यताएं पीढ़ियों के अनुभव से उपजी होती हैं। लेकिन इसके पीछे के वैज्ञानिक आधार के बारे में बात करते हुए वह कहते हैं कि वनस्पति विज्ञान के मुताबिक कई वृक्ष प्रजातियां कुछ वर्षों में सामान्य से कहीं ज्यादा मात्रा में फूल, फल और बीज उत्पन्न करती हैं। इस प्रक्रिया को मास्टिंग कहा जाता है। इसमें मौसम, तापमान, नमी, वर्षा का वितरम और वृक्ष वर्षों से संचित ऊर्जा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
शैलेंद्र बताते हैं कि मास्टिंग का संबंध केवल सूखे से नहीं है, बल्कि संसाधनों की उपलब्धता और मौसमीय संकेतों से भी होता है। जामुन एक अत्यंत सहनशील वृक्ष है, जो सूखे, उच्च तापमान और कई प्रकार के पर्यावरणीय तनावों को झेलने की क्षमता रखता है। हाल ही के अध्ययनों में यह भी पता चला है कि यह वृक्ष तनाव की स्थिति में भी अपनी उत्पादकता बनाए रखता है।
शैलेंद्र नायक कहते हैं कि वैज्ञानिक दृष्टि से ऐसा कहना सही नहीं होगा कि जामुन ज्यादा आए हैं तो सूखा पड़ेगा। इस दावे के समर्थन में कोई स्थापित वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। हालांकि यह सच है कि वृक्ष अपने आसपास के पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं। ऐसे में कई बार उनके व्यवहार में आने वाले बदलाव मौसम की दीर्घकालीन प्रवृत्तियों का संकेत देते हैं। ऐसे में लोक मान्यता को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता। लेकिन इसे मौसम पूर्वानुमान का वैज्ञानिक विकल्प मानना सही नहीं है।
इस सवाल पर मौसम वैज्ञानिक कहते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में मध्य प्रदेश समेत पूरे भारत में मौसम की घटनाएं चरम स्तर तक बढ़ी हैं। कभी कम समय में ज्यादा बारिश, कभी लंबे शुष्क अंतराल, तो कभी असामान्य तापमान। ऐसी परिस्थितियों में वृक्षों में फल उत्पादन प्रक्रिया में बदलाव होना असामान्य नहीं है। हो सकता है कि जामुन के पेड़ की यह स्थिति पिछले मौसमों की अनुकूल परिस्थितियों, तापमान के पैटर्न, सफल परागण और वृक्षों में संचित ऊर्जा का परिणाम हो।
फिलहाल मध्य प्रदेश को मानसून (MP Monsoon 2026 Waiting) का इंतजार है। जून के दूसरे सप्ताह तक भी प्रदेश के कई हिस्सों में प्री मानसून की एक्टिविटीज जारी हैं। कहीं गरज-चमक के साथ बारिश तो कहीं उमस और तापमान में उतार-चढ़ाव भी लगातार बना हुआ है। ऐसे में जामुन की बहार को शैलेंद्र असाधारण रोचक संयोग मान रहे हैं। उनका कहना है कि यह संकेत है कि प्रकृति अपनी लय और अपने विज्ञान के आधार पर चलती है।
इस बार एल नीनो की स्थिति है वह भी सुपर एल नीनो (MP Monsoon 2026 El Nino Effect) है, जिस तरह की कंडिशन बनी हुई है वे दर्शाती है कि यह अब तक का सबसे खतरनाक एलनीनो होगा। हालांकि मौसम की किसी भी परिस्थिति को परिभाषित करना सही नहीं है, क्योंकि इसमें बड़ी अनिश्चितता होती है। अभी मानसून अच्छी स्थिति में है। सुपर एल नीनो के प्रभाव से बारिश के दिन कम हो सकते हैं, लेकिन बारिश भी एक्स्ट्रीम हो सकती है और सूखे की स्थिति हुई तो वह भी एक्सट्रीम।
भारतीय मौसम अनुसंधान केंद्र भोपाल, के मुताबिक अगले दो से तीन दिन में वर्तमान में मानसून (Monsoon 2026 Update) कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश से और उड़ीसा के कुछ हिस्सों के साथ ही छत्तीसगढ़ के कुछ क्षेत्रों को कवर करेगा। अब तक यही माना जा रहा है कि एमपी में मानसून अपने तय समय पर 15-16 जून तक आने की ही उम्मीद है।
मौसम विभाग के मुताबिक एक वेस्टर्न डिस्टर्बेंस (MP Monsoon Western Disturbance) अब साइक्लोन सर्कुलेशन के रूप में उत्तर हरियाणा और आसपास मौजूद है। यानी पश्चिमी विक्षोभ कमजोर पड़ गया है। इससे उत्तरभारत में बादल बन सकते हैं। गरज-चमक के साथ बारिश हो सकती है। इसका असर मध्यप्रदेश समेत राजस्थान और उत्तर प्रदेश पर भी पड़ सकता है। इसके अलावा 18.5 डिग्री E लॉन्गट्यूड के आसपास एक ट्रफ लाइन बनी हुई है। इसका मतलब है कि लगभग देशांतर रेखा के साथ उत्तर से दक्षिण की ओर एक मौसमी द्रोणिका एक्टिव है। यह नमी को खींचती है और बादल बनने में मदद करती है। इससे गरज-चमक और बारिश जैसी मौसमी गतिविधियां बढ़ती हैं।
Published on:
13 Jun 2026 04:45 pm
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