
Bhopal Gas Tragedy
भोपाल। दुनियार में जब भी भोपाल का नाम जुबां पर आता है, तो भोपाल गैस त्रासदी ( bhopal gas tragedy ) के जख्म फिर हरे हो जाते हैं। इस घटना को 35 साल हो गए, लेकिन हर साल फिर यह त्रासदी आंखों में पानी ले आती है।
जितना दर्द इस त्रासदी को देखने वालों के सीने में है, उतना बयां कर पाना मुश्किल होता है। लेकिन दुनियाभर में फेमस फोटोग्राफर रघु राय ( raghu rai ) की एक-एक तस्वीरें इस हादसे की जीवंत गवाही देती हैं।
रघु राय का एक फोटोग्राफ आज भोपाल गैस त्रासदी का मानो सिंबल बन गया हो। इस तस्वीर में कब्र में दबा मासूम बच्चा दिखाई दे रहा है, जो अपनी आंखें भी बंद नहीं कर पाया था और उसे जमीन में दफन कर दिया गया। आज इस बच्चे की आंखें जरूर खुली दिखती हैं, लेकिन यह दुनियाभर के किसी भी शख्स की पलकें झुका देती है।
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इतिहास के पन्नों से patrika.com आपको बता रहा है विश्व विख्यात फोटोग्राफर रघु राय के कैमरे की नजर से वो मंजर, जो कुछ ही लोग देख पाए थे...।
दफनाने से पहले खुली थी आंखें
फोटोग्राफर रघु राय कहते हैं कि 2 दिसंबर की रात जब गैस लीक हुई, उसके दूसरे दिन 3 दिसंबर को वे हमीदिया अस्पताल और उसके आसपास तस्वीरें खींचने निकले। जब वे कब्रस्तान के पास से गुजर रहे थे, तभी वहां मृतक संख्या का जायजा ले रहे थे, तभी वहां एक बच्चे का शव दफन हो रहा था। राय वहां पहुंचे और मासूम चेहरे वाले बच्चे को देख उनकी भी आंखें भर आई। राय कहते हैं कि उन्होंने तुरंत वह तस्वीर खींच ली। इसके बाद उस पर मिट्टी डाल दी गई। तस्वीर खींचने के बाद थोड़ी देर के लिए वे भी अवाक रह गए थे।
गैस त्रासदी को बया करती है एक तस्वीर
बच्चे के दफन करने वाली यह तस्वीर आज स्बोल-सी बन गई, वह किसी स्मारक की तरह नजर आने लगी। पत्र-पत्रिकाओं और दुनियाभर की मैगजीन में यही तस्वीर लगने से दुनियाभर के लोगों को यह तस्वीर गैस त्रासदी की ही स्मारक लगती है। राय बताते हैं कि जब बड़े-बुजुर्ग मरते हैं तो व्यक्ति अपने आपको यह समझा लेता है कि उनकी उम्र अधिक थी, लेकिन जब मासूम बच्चों को पीड़ा होती है तो उसकी तकलीफ हर कोई महसूस करने लगता है।
याद करने लायक नहीं है वो त्रासदी
राय गैस त्रासदी को बेहद दुखद मानते हैं वे अक्सर कहते हैं कि भोपाल की यह घटना याद करने लायक तो नहीं हैं। क्योंकि वो घटना ऐसी भयानक थी कि जिसका असर आज भी हैं, उस घटना के कारण पीड़ित लोग आज भी मर रहे हैं। जिन लोगों के शरीर में ज्यादा गैस चली गई थी उनकी तो उसी दिन मौत हो गई, लेकिन कहा जाता है कि वे लोग काफी भाग्यशाली थे, जो चल बसे। गैस झेलने वाले लोग जो आज जीवित है वे तिल-तिल कर मर रहे हैं।
शोध के लिए रखी हैं खोपड़ियां
दुनिया की इस भीषण त्रासदी में मारे गए लोगों को खोपड़ियां आज भी हमीदिया अस्पताल में रिसर्च के लिए रखी गई हैं। इसी के आधार पर शोध होता रहता है।
जमीन नहीं बची थी, लकड़ियां हो गई थी खत्म
गैस त्रासदी के बाद मृतकों की संख्या इतनी थी कि कब्रस्तानों में जमीन नहीं बची थी और शवों को जलाने के लिए लकड़ियां खत्म हो गई थी। कुछ लोग ऐसा भी बताते हैं कि उस दौर में कई लाशों को ट्रकों में भरकर नर्मदा में फेंक दिया गया था। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि उस समय जब कब्रस्तान में जमीन कम पड़ गई थी। नई कब्र खोदने के वक्त भी जब जमीन में गड्ढा किया जाता था तो उसमें एक लाश दफन मिलती थी।
Updated on:
03 Dec 2019 02:03 pm
Published on:
29 Nov 2019 06:00 am
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