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Hartalika Teej : इस गांव के लिए अपशकुनी है सावन का महीना, हतालिका तीज पर मनाई जाती है राखी

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि मप्र में एक गांव के लिए सावन का यह महीना अपशकुन देने माना जाता है। इसलिए यहां न सावन मनाया जाता है और न ही रक्षाबंधन का पर्व.... भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक यह पर्व हरतालिका तीज पर मनाया जाता है। अब सवाल यह है कि ऐसा क्यों?

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सावन का महीना आता अकेला है, लेकिन जाते-जाते त्योहारों की झड़ी लगा जाता है। खासकर राखी का पर्व इस महीने की ऐसी शुरुआत होता है। इस महीने में बहन-भाई के प्रेम का संदेश देने वाला यह पर्व देश भर में धूमधाम से मनाया गया। लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि मप्र में एक गांव के लिए सावन का यह महीना अपशकुन देने माना जाता है। इसलिए यहां न सावन मनाया जाता है और न ही रक्षाबंधन का पर्व। भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक यह पर्व भादो के महीने में आने वाली हरतालिका तीज पर मनाया जाता है। अब सवाल यह है कि ऐसा क्यों?

जीहां चंबल एरिया में एक ऐसा गांव है जहां रक्षाबंधन के दिन राखी का पर्व नहीं मनाया जाता। कोई बहन इस दिन अपने भाई को राखी नहीं बांधती। लेकिन इस गांव में हरतालिका तीज के अवसर पर रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है।

जानें भादो महीने में कहां मनाई जाती है राखी

बता दें कि मप्र के भिंड जिले के बरोही गांव की आबादी करीब हजार है। इस गांव में न सावन मनाया जाता है और न ही रक्षाबंधन का पर्व सावन में मनाया जाता है। इसलिए राखी पर बंद और तीज पर शुरू हुई राखी बांधन की परम्परा ग्रामीणों का कहना है कि इस गांव के एक पुरखा सैकड़ों साल पहले तीर्थ यात्रा पर गए थे। लेकिन वे वापस नहीं लौटे। जब वे वापस न आए तो गांव में मातम पसर गया। लोग उनका इंतजार करते रहे कि शायद लौट आएं। इस बीच गांव में कोई तीज-त्योहार नहीं मनाया गया। लेकिन एक लंबे इंजार के बाद तीज पर पुरखा फिर से लौट आए। जिस दिन वे लौटे वह दिन हरियाली तीज का दिन था। यही कारण है कि रक्षाबंधन का यह पर्व इस गांव में हरियाली तीज पर मनाए जाने की परम्परा की शुरुआत हुई।

ऐसे मनाते हैं त्योहार

इस गांव में सावन का यह त्योहार मनाने के लिए गांव की बहनें हरियाली तीज के दिन अपने गांव से यानी अपने ससुराल से मायके जाती हैं। पूरे गांव में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। हर घर स्वादिष्ट पकवानों की खुशबू से महक उठता है। हरियाली तीज पर रक्षाबंधन मनाने का यह सिलसिला यहां नया नहीं है बल्कि 50 साल से भी पुराना है। गांववालों की मानें तो क्योंकि सावन के दौरान बुजुर्ग नहीं लौटे थे, तो उस वक्त के त्योहार नहीं मनाए गए। जब वह तीज पर आए तो रक्षाबंधन मनाया गया। वही ट्रेडिशन आज भी बना हुआ है।

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