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बैले, फोक और कंटेंपरेरी डांस के जरिए पहली बार दिखाई पिथोरा बाबा की कथा

जनजातीय संग्रहालय के नौवें स्थापना दिवस समारोह में भीली जलकथा को मंच पर किया जीवंत
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समारोह शुभारंभ पद्मश्री भज्जू श्याम, पद्मश्री दुर्गा बाई, पद्मश्री भूरी बाई, पद्मश्री अर्जुन ङ्क्षसह धुर्वे, पद्मश्री रामसहाय पाण्डेय और पद्मश्री बाबूलाल दाहिया ने किया।

भोपाल. जनजातीय संग्रहालय का नौवां स्थापना दिवस समारोह का शुभारंभ सोमवार से हुआ। पांच दिवसीय समारोह के पहले दिन पद्मश्री अर्जुन सिंह धुर्वे, डिंडोरी ने बैगा जनजातीय नृत्य की प्रस्तुति दी तो पद्मश्री रामसहाय पांडेय ने राई लोक नृत्य पेश किया। मंच पर पहली बार भीली जलकथा पिथौरा पर एकाग्र समवेत नृत्य नाटिका की प्रस्तुति कोरियोग्राफर चंद्रमाधव बारिक के पुनर्संयोजन में हुई। समारोह शुभारंभ पद्मश्री भज्जू श्याम, पद्मश्री दुर्गा बाई, पद्मश्री भूरी बाई, पद्मश्री अर्जुन ङ्क्षसह धुर्वे, पद्मश्री रामसहाय पाण्डेय और पद्मश्री बाबूलाल दाहिया ने किया।

भील जनजाति में पिथौरा एक अनुष्ठानिक मिथक है
समारोह में भीली जलकथा 'पिथौरा' पर एकाग्र समवेत नृत्य नाटिका का मंचन किया गया। बैले, फोक और कंटेंपरेरी डांस शैली के जरिए पहली बार इसे मंच पर उतारा गया। प्रस्तुति के माध्यम से बताया कि निमाड़ अंचल में भील जनजाति में पिथौरा एक अनुष्ठानिक मिथक है। यह एक ऐसा चरित्र है, जो घोड़े पर सवार होकर आता है। मन्नत पूरी होने पर इसे उत्सव के तौर पर मनाया जाता है। मध्यप्रदेश के झाबुआ, अलीराजपुर सहित अन्य राज्यों के आदिवासी कलाकारों द्वारा पिथौरा चित्रांकन किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि भील जनजाति का एक युवा पिथौरा, जल संकट को हल करने के लिए हिमालय से जल लाता है और पूरे इलाके को संपन्न करता है। तब से यह जनजाति वर्षा ऋतु में आठ दिनों का उत्सव मनाती है और पिथौरा की पूजा करती है। डायरेक्टर ने बताया कि इसे कथा को नृत्य शैली में मंचित करने के लिए एक माह तक तैयार की गई।

मांदल की थाप पर बिखरा उल्लास
इस अवसर पर बैगा जनजातीय नृत्य प्रस्तुति में कलाकारों ने करमा नृत्य प्रस्तुति दी। नई फसल आने की खुशी में किए जाने वाले इस नृत्य का मुख्य संगीत मांदल वाद्य की थाप होती है, जिस पर अन्य साथी नृत्य करते हैं। इसके बाद कलाकारों ने लोक नृत्य राई स्वागं पेश किया। इसमें कलाकार फाग गाकर नृत्य करते हैं। राई के गीत ख्याल, स्वांग सहित अन्य कई प्रकार के होते हैं।