होलिका दहन की राख से पिंडोलिया बनाकर उनको मिट्टी के पालसिए में रखकर अबीर, गुलाल, पुष्प, इत्र, कुमकुम आदि पूजन सामग्रियों से मां गवरजा का पूजन कर रही है। यह पूजन अनुष्ठान सोलह दिनों तक चलेगा। पूजन अनुष्ठान की पूर्णाहुति पर गवर को पहुंचाने की रस्म का निर्वहन होगा। जिसमें कई स्थानों पर मेले भरेंगे। दूसरे चरण में बारहमासा गणगौर और सबसे अंतिम चरण में धींगा गणगौर का पूजन उत्सव होगा। वहीं पुरुषों की मंडलियों की ओर से पारम्परिक रूप से गणगौर के गीतों का गायन किया जा रहा है।