स्वांग मेहरी रम्मत के चौमासा गीत में ‘सजै सोळह सिणगार तिजणिया बण ठण नितरी हरखासी’, ‘प्रीतम सागै बागौ जासी रेशम झूले पिवजी हिण्डासी’, ‘अमिया पूजण को चाली, ले हाथ चांदी की थाली’ के माध्यम से कजली पूजन का वर्णन किया गया है। वहीं ‘संजोडे सूं कजली पूजै, सज सोळह सिणगार’, ‘सुहागण मेहंदी रचाई, दे चन्द्र अरघ घर माही’ के माध्यम से तीज पर महिलाओं के सजने-संवरने, हाथों पर मेहंदी के मांडणे रचाने, चन्द्रदर्शन व पूजन की परम्परा को बताया गया है। जबकि ‘सातू, साडी, फल, मीठो पीहर सूं थाळी भर आसी’ और ‘देवेला आछरी अबकै म्हारी भुआ और मासी’ गीत के माध्यम से कजली तीज पर शहर की पारम्परिक परम्पराओं सत्तू ्रऔर आछरी का उल्लेख किया गया है।