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वीरान जंगल से आस्था धाम तक… 300 साल पुराना है छत्तीसगढ़ का ये मंदिर, नीम-पीपल तले से शुरू हुई परंपरा

CG News: बिलासपुर के कुदुदंड स्थित मां महामाई माता चौरा मंदिर का इतिहास सैकड़ों वर्षों पुराना है। पंडित लोमश पाण्डेय ने बताया कि यह मंदिर 300 वर्ष से भी अधिक पुराना माना जाता है।

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मां महामाई माता चौरा मंदिर (फोटो सोर्स- पत्रिका)

मां महामाई माता चौरा मंदिर (फोटो सोर्स- पत्रिका)

CG News: बिलासपुर के कुदुदंड स्थित मां महामाई माता चौरा मंदिर का इतिहास सैकड़ों वर्षों पुराना है। पंडित लोमश पाण्डेय ने बताया कि यह मंदिर 300 वर्ष से भी अधिक पुराना माना जाता है। पहले यहां पीपल और नीम के पेड़ के नीचे माता की प्रतिमा विराजमान थी, जिसके कारण इस स्थान को माता चौरा कहा जाने लगा। समय के साथ मंदिर का स्वरूप बदला और श्रद्धालुओं की आस्था ने इसे मंदिर का रूप दिलाया। यहां बैगा समुदाय के लोगों ने पूजा आरंभ की थी।

मनोकामना दीप से रोशन रहता है मंदिर

आज माता चौरा मंदिर न केवल स्थानीय बल्कि आसपास के क्षेत्रों के श्रद्धालुओं का आस्था केंद्र बन चुका है। नवरात्रि में सैकड़ों श्रद्धालु ने मनोकामना दीप प्रज्ज्वलित किए हैं। मंदिर में सुबह और शाम नियमित आरती होती है। नवरात्रि, चैत्र नवरात्र और अन्य विशेष अवसरों पर भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। संध्या आरती के समय मंदिर प्रांगण दीपों की रोशनी से जगमगा उठता है और वातावरण भक्ति रस से भर जाता है।

2017 में नया स्वरूप, 2020 में निर्माण

माता चौरा सेवा समिति के मीडिया प्रभारी दिनेश निर्मलकर ने बताया कि सालों वर्ष पहले मंदिर के आस-पास घना जंगल हुआ करता था। शाम ढलते ही लोग वहां जाने से कतराते थे। कहा जाता है कि उस इलाके में अक्सर जंगली जानवर और शेर दिखाई देते थे। इस वजह से सूर्यास्त के बाद भक्त मंदिर में पूजा करने भी नहीं जाते थे।

शुरुआत में मंदिर की पूजा-पाठ की जिमेदारी बैगा समुदाय के लोगों के पास थी। श्रद्धालुओं के सहयोग से वर्ष 1995-96 में मंदिर का पहला निर्माण किया गया। 2014 में समिति का गठन किया गया। 2017 में मंदिर का पुनर्निर्माण शुरू हुआ और भक्तों के सहयोग से 2020 में इसे नया भव्य स्वरूप मिला। मंदिर का गर्भगृह और प्रांगण दोनों का विस्तार किया गया। भक्तों की आस्था लगातार बढ़ती गई।

पंडित ने बताया कि पुरातत्व विभाग की टीम भी यहां पहुंचकर मंदिर के इतिहास का अध्ययन कर चुकी है। उनका मानना था कि यह स्थल ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। मंदिर की पौराणिकता और आस्था के कारण यहां पीढ़ी-दर-पीढ़ी पूजा परंपरा चलती रही।