
Emergency Fund को जोखिम वाले निवेश विकल्पों में नहीं डालना चाहिए। (PC: AI)
How to Make Emergency Fund: अचानक आने वाला मेडिकल खर्च, जॉब चली जाना या घर का कोई जरूरी खर्च आपकी सालों की बचत पर भारी पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में कर्ज लेने की नौबत न आए, इसके लिए इमरजेंसी फंड बनाना बेहद जरूरी है। लेकिन सवाल है कि इसमें कितना पैसा होना चाहिए? यहीं काम आता है 3-6-9-12 का नियम। यह आसान फॉर्मूला आपकी आय, परिवार की जिम्मेदारियों और इनकम की स्टेबिलिटी के आधार पर बताता है कि कम से कम कितने महीनों के खर्च के बराबर रकम इमरजेंसी फंड में रखनी चाहिए।
निवेश सलाहकार बलवंत जैन के अनुसार, इमरजेंसी फंड की रकम हर व्यक्ति के लिए एक जैसी नहीं हो सकती। अगर आपकी नौकरी स्टेबल है और इनकम रेगुलर आती है तो कम रकम से शुरुआत की जा सकती है। वहीं, जिनकी आमदनी कभी ज्यादा तो कभी कम रहती है, उन्हें बड़ा इमरजेंसी फंड बनाना चाहिए। क्लीयर टैक्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सामान्य तौर पर नियमित आय वाले लोगों को कम से कम 3 से 6 महीने के खर्च के बराबर रकम इमरजेंसी फंड में रखनी चाहिए। वहीं, अनियमित आय वाले लोगों के लिए यह रकम 9 से 12 महीने के खर्च तक हो सकती है।
फ्रीलांसर, प्रोजेक्ट के आधार पर काम करने वाले लोग और कारोबार से जुड़े लोगों की आय हर महीने एक जैसी नहीं होती। ऐसे लोगों को सामान्य नौकरीपेशा व्यक्ति की तुलना में ज्यादा रकम अलग रखनी चाहिए। इसके अलावा, अगर परिवार में मेडिकल खर्च ज्यादा है, होम लोन या दूसरे कर्ज की EMI चल रही है या परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियां ज्यादा हैं, तो इमरजेंसी फंड का आकार भी बढ़ाना समझदारी है। ध्यान रखें कि 3-6-9-12 का नियम कोई पत्थर की लकीर नहीं है। आपकी स्थिति बदलती है, तो फंड का लक्ष्य भी बदलना चाहिए।
इमरजेंसी फंड बनाने का पहला कदम यह जानना है कि हर महीने आपका वास्तव में कितना जरूरी खर्च होता है। इसमें ऐसे खर्च शामिल करें, जिन्हें आप मुश्किल समय में भी रोक नहीं सकते। मसलन, राशन और खाने-पीने का खर्च, बिजली-पानी का बिल, घर का लोन, EMI, बीमा प्रीमियम, स्कूल फीस, इंटरनेट, आने-जाने का खर्च और दूसरे जरूरी भुगतान। इसके बाद इन सभी खर्चों को जोड़ें। अब अपनी स्थिति के हिसाब से इसे 3, 6, 9 या 12 से गुणा करें।
मान लीजिए आपके जरूरी मासिक खर्च 25,000 रुपये के हैं। अगर आप 6 महीने का इमरजेंसी फंड बनाना चाहते हैं तो आपका लक्ष्य होगा: 25,000 × 6 = 1.50 लाख रुपये। यानी आपके पास कम से कम 1.50 लाख रुपये की ऐसी रकम होनी चाहिए, जिसे जरूरत पड़ने पर तुरंत इस्तेमाल किया जा सके।
अगर 1.50 लाख रुपये का लक्ष्य देखकर आपको लगता है कि इतनी रकम जुटाना मुश्किल है, तो घबराने की जरूरत नहीं है। शुरुआत छोटी रकम से भी की जा सकती है। हर महीने 500, 1,000 या अपनी क्षमता के हिसाब से कोई भी तय रकम अलग रखें। धीरे-धीरे इसे बढ़ाएं। बोनस, टैक्स रिफंड या साइड इनकम से मिली अतिरिक्त रकम का कुछ हिस्सा भी इमरजेंसी फंड में डाल सकते हैं। यहां असली खेल रकम का नहीं, नियमितता का है। छोटी-छोटी बचत समय के साथ बड़ा फंड बन जाती है।
आपका खर्च आज और दो साल बाद एक जैसा नहीं रहेगा। नई EMI शुरू हो सकती है, किराया बढ़ सकता है, बच्चे की फीस बढ़ सकती है या बीमा प्रीमियम में बदलाव हो सकता है। इसलिए हर कुछ महीने में अपने जरूरी खर्चों का दोबारा हिसाब करें। अगर मासिक खर्च बढ़ गया है तो इमरजेंसी फंड का टार्गेट भी उसी हिसाब से बढ़ाएं।
इमरजेंसी फंड का मकसद ज्यादा से ज्यादा रिटर्न कमाना नहीं है। इसका सबसे बड़ा काम जरूरत के समय पैसा उपलब्ध कराना है। इसलिए इस रकम को बहुत ज्यादा जोखिम वाले निवेश में लगाना ठीक नहीं माना जाता। पेनी स्टॉक या बेहद उतार-चढ़ाव वाले शेयरों से इमरजेंसी फंड को दूर रखना बेहतर है। बाजार गिरने के समय अगर आपको अचानक पैसे की जरूरत पड़ गई तो नुकसान उठाकर निवेश बेचने की नौबत आ सकती है।
जैन के अनुसार, इमरजेंसी फंड को अलग-अलग सुरक्षित और आसानी से उपलब्ध विकल्पों में बांटा जा सकता है। करीब 30 से 40% रकम सेविंग अकाउंट या बैंक FD जैसे विकल्पों में रखी जा सकती है, जहां से पैसा जल्दी निकाला जा सके। बाकी 60 से 70% रकम कम जोखिम वाले डेट विकल्पों, जैसे लिक्विड या ओवरनाइट म्यूचुअल फंड में रखी जा सकती है। हालांकि, म्यूचुअल फंड में रिटर्न की गारंटी नहीं होती और निवेश से पहले जोखिम को समझना जरूरी है।
(यह आर्टिकल सिर्फ जानकारी मात्र है। यह निवेश की सलाह नहीं है। निवेश संबंधी फैसले लेने से पहले अपने निवेश सलाहकार से परामर्श लें।)
Updated on:
08 Aug 2026 10:42 am
Published on:
08 Aug 2026 10:42 am
