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Income Tax Rules: आप ईमानदार टैक्सपेयर हैं, तो भी आ सकता है 10 लाख का नोटिस, समझिए क्या कहता है ब्लैक मनी एक्ट

Income Tax Rules: अगर आप विदेशी बैंक खाते का जिक्र आईटीआर में करना भूल गए हैं, तो भले ही आपने कोई बेईमानी नहीं की हो, तब भी आपके घर 10 लाख रुपये का नोटिस आ सकता है।

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Income Tax Rules

विदेशी बैंक अकाउंट का जिक्र आईटीआर में जरूर करना चाहिए। (PC: Pixabay)

Income Tax Rules: दिल्ली में रहने वाले राकेश शर्मा आजकल काफी परेशान चल रहे हैं, क्योंकि उन्हें इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से 10 लाख रुपये का पेनल्टी नोटिस आया है। शुरू में तो उन्हें ये समझ नहीं आया कि नोटिस उन्हें आया कैसे, क्योंकि वो तो इनकम टैक्स भरने में कोई कोताही नहीं करते और हमेशा से ही कंप्लायंट रहे हैं। जब शर्मा जी ने नोटिस को जरा ध्यान से पढ़ा, तो उसमें लिखा था कि वो एक विदेशी बैंक अकाउंट के बारे में जानकारी देने में विफल रहे, इसलिए उन्हें ये पेनल्टी नोटिस मिला है। तब उन्हें ध्यान आया कि उनका एक विदेशी बैंक खाता है, जिसका जिक्र वो ITR में करना भूल गए, लेकिन सवाल ये है कि उस बैंक अकाउंट में तो उतना पैसा है भी नहीं, ज्यादा से ज्यादा 2 लाख रुपये होंगे। तो फिर ये नोटिस क्यों?

जो राकेश शर्मा जी के साथ हुआ है, ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है। इनकम टैक्स के पूर्व प्रिंसिपल कमिश्नर और मशूहर टैक्स प्रचारक ओपी यादव ने इस विषय पर काफी विस्तार से समझाया है। वो बताते हैं कि काला धन (अघोषित विदेशी आय और संपत्ति) एवं कर अधिरोपण अधिनियम, 2015 ("काला धन अधिनियम") एक साफ मकसद के साथ लागू किया गया था। इसका मकसद अघोषित विदेशी आय और संपत्ति का पता लगाना और टैक्स चोरी को रोकना है, लेकिन इसने निष्पक्षता को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा की थीं, खासकर जानबूझकर अपराध करने वालों (willful offenders) के बजाय उन टैक्सपेयर्स के लिए जो नियमित रूप से इनकम टैक्स भरते हैं।

विदेशी संपत्ति की जानकारी मिलना आसान हुआ

ओ पी यादव लिखते हैं कि बीते कुछ वर्षों में, इनकम टैक्स विभाग को डबल टैक्सेशन अवॉयडेंस एग्रीमेंट्स (DTAAs) के तहत सूचनाओं के आदान-प्रदान प्रावधानों और सूचना के स्वचालित आदान-प्रदान (AEOI) नेटवर्क के जरिए भारतीय निवासियों के विदेशी बैंक खातों के बारे में बड़ी मात्रा में जानकारी हासिल हुई है। इन खातों में उन निवासियों की बड़ी संख्या है, जो नौकरी करने, रिसर्च करने या पढ़ने के लिए विदेश गए थे और कुछ समय बाद वो वापस भारत लौट आए। ऐसे कई मामलों में इन खातों में जमा हुआ पैसा पूरी तरह से वैध होता है, जिनमें अक्सर छोटी बचत, टैक्स पेड इनकम या बच्चों की शिक्षा के लिए भारत से भेजा गया पैसा शामिल होता है।

फिर भी, इन व्यक्तियों को अपने इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) की अनुसूची FA (Foreign Asset Schedule) में इन खातों की जानकारी न देने के कारण काला धन अधिनियम की धारा 42 और 43 के तहत दंडात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है।

10 लाख का नियम अनिवार्य है या नहीं?

इनकम टैक्स अधिनियम, 1961 की धारा 139(1) (या नए आयकर अधिनियम, 2025 की धारा 263(1)(x)) के तहत आवश्यक रिटर्न दाखिल न करने पर, या अनुसूची FA में विदेशी संपत्तियों का गलत खुलासा करने पर, धारा 42 और 43 में 10 लाख रुपये का जुर्माना तय किया गया है। फाइनेंस एक्ट, 2024 ने अचल संपत्ति के अलावा अन्य संपत्तियों के लिए छूट सीमा 5 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख रुपये कर दी है।

ओपी यादव लिखते हैं कि हालांकि इस बात को लेकर अभी भी स्पष्टता नहीं है कि जुर्माना लगाना Discretionary है या mandatory है, खासकर इसलिए क्योंकि ऐसे जुर्माने के कारण काला धन अधिनियम की धारा 49 या 50 के तहत मुकदमा भी चलाया जा सकता है। दोनों धाराओं को लेकर जो कहा गया है वो इस तरह से है - “The Assessing Officer may direct that such person shall pay, by way of penalty, a sum of ten lakh rupees.” इसका हिंदी में ट्रांसलेशन हुआ- "कर निर्धारण अधिकारी निर्देश दे सकता है कि ऐसा व्यक्ति जुर्माने के रूप में दस लाख रुपये का भुगतान करेगा।"

क्या जुर्माना लगाना विवेकाधीन है?

ओपी यादव समझाते हैं कि देखिए - इस वाक्य में “may” और “shall” दोनों का इस्तेमाल किया गया है। जिसकी वजह से न्यायिक राय बंट जाती है। इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) की कुछ बेंच ने जुर्माने को अनिवार्य माना है, जबकि कई अन्य बेंच ने ये माना है कि ऐसा 'हो सकता' है, यानी की अनिवार्यता नहीं है और जुर्माना लगाना विवेकाधीन है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि अगर इसके दो मतलब या व्याख्याएं संभव हैं, तो टैक्सपेयर के पक्ष में जो व्याख्या हो, उसे ही माना जाना चाहिए।

ओपी यादव के मुताबिक - ये व्याख्या काला धन अधिनियम की धारा 46(3) के मुताबिक है, जिसमें अधिकारी को जुर्माना लगाने से पहले कारण बताओ नोटिस जारी करना, सुनवाई का अवसर देना और संयुक्त या अपर आयुक्त से पहले मंजूरी हासिल करना आवश्यक है। ये सुरक्षा उपाय हैं, जो विवेकाधिकार का संकेत देते हैं, बाध्यता का नहीं। वो कहते हैं कि बड़ा मुद्दा आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 273B (आयकर अधिनियम, 2025 की धारा 470) के समान प्रावधान का नहीं होना है, जो टैक्सपेयर्स को जुर्माने से बचाता है, अगर वो चूक के लिए "उचित कारण" पेश नहीं कर सके। जबकि आज के समय में लागू काला धन अधिनियम ऐसी कोई सुरक्षा नहीं देता है।

10 लाख रुपये का जुर्माना समान रूप से लागू होता है, चाहे वो विदेश में लाखों रुपये छिपाने वाले विलफुल डिफॉल्टर हों या फिर विदेश से लौटा कोई प्रोफेशनल, कर्मचारी या स्टूडेंट हो, जो कि अनजाने में बिना किसी अघोषित जमा (undisclosed deposit) या बैलेंस वाले विदेशी खाते की सूचना देने से गलती से चूक गया हो।

कानून में सुधार का समय

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने काला धन अधिनियम की समीक्षा के लिए एक आंतरिक समिति का गठन किया है। ये मौका है कि इसको भी इनकम टैक्स एक्ट 2025 की तरह स्पष्ट और पारदर्शी बनाया जाए। जिसकी भाषा ज्यादा आसान और साफ हो, कम से कम प्रावधान हों और कम से कम स्पष्टीकरण हों।