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Share Market: मात्र 500 करोड़ दूर है FPI बिकवाली का ऑल-टाइम रिकॉर्ड, सेंसेक्स 8.3% धड़ाम, जानिए आंकड़ें

Indian stock market: अमेरिक-इजराइल और ईरान जंग के बीच मार्केट कभी बढ़त बनाता है तो कभी गिरता है। इस बीच एक नया रिकॉर्ड टूटने की कगार पर है।

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जंग, क्रूड और FPI की तिहरी मार से बेहाल बाजार। फोटो: एआइ

मार्च 2026 भारतीय शेयर बाजार के लिए एक बेहद मुश्किल महीना साबित हो रहा है। वेस्ट एशिया की जंग थमने का नाम नहीं ले रही, क्रूड ऑयल आग उगल रहा है, रुपया नए रिकॉर्ड लो बना रहा है और विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालने में लगे हैं। सेंसेक्स इस महीने 6,750 पॉइंट यानी 8.3 फीसदी गिर चुका है और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) की बिकवाली अब एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड तोड़ने की दहलीज पर खड़ी है।

रिकॉर्ड टूटने की उल्टी गिनती शुरु

मात्र 500 करोड़ का फासला बचा है, अक्टूबर 2024 के ऑल-टाइम रिकॉर्ड को तोड़ने में। NSDL और BSE के मिले-जुले आंकड़ों के मुताबिक इस महीने अब तक FPI ने भारतीय शेयर बाजार से 93,698 करोड़ रुपये निकाल लिए हैं। अक्टूबर 2024 में यह आंकड़ा 94,017 करोड़ रुपये था, जो अब तक का सबसे बड़ा मासिक आउटफ्लो रिकॉर्ड है। अभी पांच ट्रेडिंग सेशन बाकी हैं और रोजाना औसतन 7,000 करोड़ रुपये की बिकवाली हो रही है। यानी रिकॉर्ड टूटना अब महज औपचारिकता बन चुकी है। सिर्फ एक दिन की बिकवाली इस रिकॉर्ड को ध्वस्त करने के लिए काफी है।

अक्टूबर 2024 बनाम मार्च 2026

अक्टूबर 2024 में भी FPI ने जमकर बिकवाली की थी, लेकिन उस वक्त कोई बड़ा जियोपॉलिटिकल संकट नहीं था। वह बिकवाली मुख्य रूप से डॉलर की मजबूती और ग्लोबल रिस्क-ऑफ सेंटीमेंट की वजह से थी। उस दौर में बाजार ने कुछ हफ्तों में रिकवरी कर ली थी। लेकिन मार्च 2026 की तस्वीर कहीं ज्यादा जटिल है। इस बार बिकवाली के पीछे एक साथ कई मोर्चों पर मुसीबत है। अमेरिक-इजराइल और ईरान जंग, क्रूड की आग, रुपये की कमजोरी और ग्लोबल सेंट्रल बैंकों का हॉकिश रुख यानी सख्त मौद्रिक नीति। अक्टूबर 2024 में बिकवाली का कोई एक कारण था, इस बार कारणों की पूरी लिस्ट है। यही वजह है कि इस बार रिकवरी उतनी आसान नहीं होगी।

FPI बनाम DII की खींचतान

एक तरफ FPI बाजार से पैसा खींच रहे हैं, दूसरी तरफ घरेलू संस्थागत निवेशक यानी DII बाजार को थामने की कोशिश में लगे हैं। शुक्रवार को FPI ने 5,518 करोड़ रुपये निकाले, फिर भी सेंसेक्स 326 पॉइंट की बढ़त के साथ बंद हुआ। यह DII और रिटेल निवेशकों की खरीदारी का असर था। लेकिन यह लड़ाई बेमेल है। FPI रोज औसतन 7,000 करोड़ रुपये की बिकवाली कर रहे हैं जबकि घरेलू संस्थाएं पूरी ताकत लगाकर भी बाजार को बड़ी गिरावट से बचाने में जुटी हैं। नतीजा यह है कि बाजार न बुरी तरह टूट रहा है, न संभल पा रहा है। हाई वोलैटिलिटी के बीच झूल रहा है। शुक्रवार को सेंसेक्स ने 1,000 पॉइंट की तेजी दिखाई लेकिन प्रॉफिट बुकिंग ने उसे 326 पॉइंट पर समेट दिया।

जंग और बाजार का सीधा कनेक्शन

अमेरिक-इजराइल और ईरान जंग सिर्फ वेस्ट एशिया की समस्या नहीं रही, यह सीधे मुंबई के दलाल स्ट्रीट तक पहुंच चुकी है। जब भी जंग में कोई नई एस्केलेशन होती है, क्रूड उछलता है, डॉलर मजबूत होता है, FPI बिकवाली बढ़ाते हैं और सेंसेक्स लुढ़कता है। गुरुवार को यही हुआ जब सेंसेक्स एक ही दिन में करीब 2,500 पॉइंट गिर गया। ग्लोबल मार्केट भी इसी दबाव में हैं, Dow 0.5%, S&P 0.7% और Nasdaq 1 फीसदी गिरा। यूरोपीय बाजारों में लगातार तीसरे हफ्ते गिरावट रही और लैटिन अमेरिकी बाजार दो महीने के निचले स्तर पर आ गए।

HDFC सिक्योरिटीज के नागराज शेट्टी के मुताबिक जब तक जंग जारी है और क्रूड ऊंचा है, निफ्टी पर दबाव बना रहेगा। निफ्टी 22,900 अंक से नीचे गया तो 22,500 का अगला टारगेट खुल जाएगा। जंग का हर नया मोर्चा बाजार के लिए एक नई चुनौती लेकर आता है।