
ईरान में महंगाई काफी बढ़ गई है। (PC: AI)
Iran-US War: जब एक वक्त का खाना कई गुना महंगा हो जाए, तो समझ लीजिए कि हालात कितने गंभीर हैं। तेहरान में बाजार फिर से खुल गए हैं। दुकानों के शटर उठ रहे हैं, कैफे में कॉफी बन रही है, हाईवे पर गाड़ियां दौड़ रही हैं। अमेरिका के साथ नाजुक युद्धविराम के बाद ऊपर से सब कुछ सामान्य लगता है। लेकिन जो दिखता है और जो महसूस होता है, उसमें जमीन-आसमान का फर्क है। बाजार में ज्यादातर लोग अब सिर्फ जरूरी चीजें ही खरीद रहे हैं।
हफ्तों तक अमेरिका और इजराइल की बमबारी झेलने के बाद ईरान की सरकार अब अपने ही बजट से पलट गई है। दिसंबर में जो बजट पेश हुआ था, उसमें सस्ती विनिमय दर खत्म करने की बात थी। सरकार का तर्क था कि इससे भ्रष्टाचार बढ़ता है और आम आदमी को कोई फायदा नहीं होता। लेकिन जंग ने सब उलट दिया। रविवार को मंत्रिमंडल ने फैसला किया कि गेहूं, दवाइयां, मेडिकल उपकरण और बच्चों के दूध जैसी जरूरी चीजों के आयात के लिए फिर से सस्ती विनिमय दर लागू होगी। सरकार तेल और गैस की कमाई से करीब 3.5 अरब डॉलर एक ट्रस्ट नेटवर्क को देगी, जो जरूरी सामान आयात करेगा। यह दर होगी 2,85,000 रियाल प्रति डॉलर, जबकि खुले बाजार में डॉलर 15.5 लाख रियाल तक पहुंच चुका है। यानी आम बाजार से लगभग पांच गुना सस्ता।
सहकारिता मंत्रालय के एक उप-मंत्री याकूब अंदायेश ने सरकारी टेलीविजन पर माना कि जरूरी चीजों के दाम पर सस्ती दर खत्म होने का "काफी गहरा असर" पड़ा है। उन्होंने बताया कि मंत्रालय ने 11 जरूरी वस्तुओं की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार के सामने कई विकल्प रखे हैं।
सिर्फ विनिमय दर ही नहीं, ईरान अपने सॉवरेन वेल्थ फंड यानी राष्ट्रीय विकास कोष में भी हाथ डाल रहा है। रविवार को सरकारी मीडिया ने बताया कि इस कोष से एक अरब डॉलर तक की राशि निकाली जाएगी। इससे चीनी, चावल, जौ, मक्का, सोयाबीन, लाल मांस और मुर्गे का आयात किया जाएगा ताकि रणनीतिक भंडार को मजबूत किया जा सके।
प्रतिबंधों की मार झेल रहे इस देश के अधिकारी दावा करते हैं कि उनके पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा और सोने का भंडार है और अमेरिकी पाबंदियों को चकमा देकर बेचे जा रहे तेल से भी पैसा आ रहा है। लेकिन ठोस आंकड़े कोई नहीं देता।
सरकारी टेलीविजन का कहना है कि अमेरिका द्वारा बंदरगाहों की नाकेबंदी और तेल व गैस सुविधाओं पर बमबारी के बावजूद असली दिक्कत उत्पादन बढ़ाना नहीं है। असली समस्या यह है कि खार्ग और जस्क के पास खाली टैंकर ही नहीं पहुंच पा रहे जो तेल लादकर ले जाएं। रिवोल्यूशनरी गार्ड से जुड़ी तस्नीम न्यूज एजेंसी ने शनिवार को माना कि 28 फरवरी को शुरू हुई जंग के बाद से लोगों में खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। एजेंसी का कहना है कि अकाल का डर "यथार्थवादी नहीं" है, क्योंकि ईरान की सीमाएं इराक, तुर्किये और पाकिस्तान जैसे देशों से लगती हैं जहां से आयात हो सकता है। यहां तक कि सरकारी टेलीविजन ने यह भी सुझाव दिया कि बाजार में कमी होने पर पुलिस और सीमा बल तस्करी के रास्तों पर कार्रवाई बंद कर सकते हैं।
लोग डरे हुए हैं। कई घरों में डिब्बाबंद खाना जमा हो रहा है, पानी के कनस्तर भरे जा रहे हैं। बाहर खाना, घूमना-फिरना, ऑनलाइन ऑर्डर, सब बंद। हर रुपया सोच-समझकर खर्च हो रहा है। एक्स पर हादी नाम के एक यूजर ने आठ साल पुराना अपना ट्वीट शेयर किया जिसमें उन्होंने लिखा था कि 14 लोगों का रेस्तरां में खाना 24.3 लाख रियाल में पड़ा था। अब उन्होंने लिखा कि आज एक अकेले शख्स के एक वक्त के खाने की कीमत उससे छह गुना ज्यादा हो चुकी है। कैप्शन था बस एक शब्द: "अविश्वसनीय।"
लोग डरे हुए हैं।
जंग का सबसे गहरा घाव है दो महीने से जारी इंटरनेट बंदी। लाखों लोगों के काम ठप पड़े हैं। हजारों लोगों की नौकरी गई है। जो ऑनलाइन हैं, वो या तो सरकार से मंजूर कनेक्शन पर हैं या फिर VPN के लिए मुंहमांगी कीमत चुका रहे हैं।
Published on:
27 Apr 2026 11:21 am
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