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प्रवासियों ने संघर्ष से बनाया मुकाम

माटी राजस्थान री-1 - २०० साल पहले बैलगाड़ी से पहुंचे तमिलनाडु- अब रच-बस गए हैं तमिलनाडु में
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चेन्नई

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Ashok Rajpurohit

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Updated: 14 Feb 2019, 3:35 PM IST

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माटी राजस्थान री-1


चेन्नई. ‘जहां न पहुंचे रेलगाड़ी, वहां पहुंचे बैलगाड़ी और जहां न पहुंचे बैलगाड़ी, वहां पहुंचे मारवाड़ी।’ मारवाड़ी लोगों के बारे में यह कहावत सटीक बैठती है। मारवाड़ी यानी प्रवासी राजस्थानियों का तमिलनाडु में इतिहास करीब २०० साल पुराना है। यह सुनते ही आंखें फटी रह जाती है। सबसे पहले तमिलनाडु आए प्रवासी राजस्थानियों सातवीं पीढ़ी यहां पूरी तरह रम चुकी है। संघर्ष का समय काट चुके प्रवासियों ने न केवल व्यवसाय में नई इबारत लिखी बल्कि समाज सेवा से भी तमिलनाडु का दिल जीता।
राजस्थान से अकाल का रिश्ता काफी पुराना रहा है। यही वजह थी कि अकाल के दौर में जीवनयापन के लिए प्रवासियों का पलायन शुरू हुआ। राजस्थान से हर दिशा में पलायन शुरू हुआ इनमें तमिलनाडु भी प्रमुख था। राजस्थान से तमिलनाडु आने वाले मारवाडिय़ों में अगरचन्द चोरडिय़ा अग्रणी बताया जाता है। वे करीब दो शताब्दी पूर्व पैदल एवं बैलगाड़ी से तमिलनाडु पहुंचे। चोरडिय़ा राजस्थान के नागौर जिले के कुचेरा मूल के थे। उनकी सातवीं पीढ़ी आज भी तमिलनाडु में निवास कर रही है। उसी दौर में कालूराम गेलड़ा भी मारवाड़ से तमिलनाडु पहुंचे। इसके बाद से लगातार राजस्थान के लोगों का तमिलनाडु आने का सिलसिला बना हुआ है। अब तो तमिलनाडु के छोटे से छोटे गांव तक राजस्थान के लोग पहुंच चुके हैं। प्रवासियों की संघर्ष की लम्बी दास्तां हैं। उन्होंने कड़ी मेहनत की, पसीना बहाया तब जाकर मुकाम हासिल किया। प्रवासी राजस्थानियों को एक सूत्र में पिरोने एवं उनकी आवाज को बुलंद करने में राजस्थान पत्रिका भी सदैव अग्रणी रहा है। प्रवासियों पर केन्द्रित राजस्थान पत्रिका की खास रिपोर्ट:

राजस्थान के लोगों ने समर्पण व मेहनत से बिजनेस को उंचाइयां दी है। खास बात यह है कि राजस्थान से हजारों किमी दूर रहकर भी वे अपनी जड़ों से व संस्कृति से जुड़े हुए हैं। जहां-जहां प्रवासी राजस्थानी बसे, वहां आर्थिक तंत्र को मजबूती प्रदान की और बहुत कम समय में अपना स्थान बना लिया। राजस्थानी समाज के लोगों का राज्य के विकास में अहम योगदान रहा है। प्रवासी राजस्थानी अपनी मातृभूमि के लिए भी सदैव तत्पर रहते हैं। समय-समय पर विभिन्न सुविधाओं के लिए सहयोग देते रहे हैं। प्रवासी राजस्थानी व्यावसायिक कौशल के साथ ही साहसी एवं निष्ठावान है। वे आज भी संस्कृति व सभ्यता को सर्वोपरि मानते हैं और उसी अनुरूप आचरण करते हैं।