
छिंदवाड़ा. रक्षाबंधन का पर्व अब केवल भाई-बहन के प्रेम और रक्षा के संकल्प तक सीमित नहीं रह गया है। पर्व को पर्यावरण संरक्षण से जोडऩे की भी अनूठी पहल की जा रही है। कोई सीड राखी तैयार कर तो कोई छिंद जैसी प्राकृतिक सामग्री से राखी बनाकर प्रकृति संरक्षण का संदेश दे रहा है।
राखी कुछ समय बाद धरती पर हरियाली के रूप में नजर आएगी
सीड राखी इस पहल में सबसे खास है। राखी में पौधों के बीज शामिल किए जा रहे हैं, ताकि पर्व के बाद राखी को बेकार फेंकने के बजाए उसे मिट्टी में लगाया जा सके। उचित देखभाल मिलने पर यही बीज पौधे का रूप ले सकते हैं। इस तरह भाई की कलाई पर बंधी राखी कुछ समय बाद धरती पर हरियाली के रूप में नजर आएगी। यानी इस बार भाइयों की कलाई पर छिंद और सीड राखी नजर आएगी। इन राखियों के जरिए भाई-बहन के स्नेह के साथ पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय हस्तकला को बढ़ावा देने का संदेश भी दिया जाएगा। महिलाओं का कहना है कि त्योहारों में उपयोग होने वाली प्लास्टिक और सिंथेटिक सामग्री बाद में कचरे का हिस्सा बन जाती है। ऐसे में प्राकृतिक सामग्री से तैयार राखियां पर्यावरण के अनुकूल विकल्प साबित हो सकती हैं। छिंद से बनी राखियों में स्थानीय परंपरा और हस्तकला की झलक देखने को मिल रही है।
त्योहार के साथ प्रकृति की चिंता
लोगों का कहना है कि त्योहारों के बाद बड़ी मात्रा में प्लास्टिक और सिंथेटिक सामग्री कचरे में पहुंचती है। ऐसे में पर्यावरण अनुकूल राखियों को बढ़ावा देना समय की जरूरत है। सीड और छिंद की राखियां इसी सोच को आगे बढ़ाने का प्रयास हैं। यदि एक राखी के जरिए एक पौधा तैयार होता है और वह बड़ा होकर पेड़ बनता है तो यह छोटी-सी पहल आने वाले वर्षों में बड़ा बदलाव ला सकती है।
बच्चों और युवाओं में भी बढ़ रही जागरूकता
पर्यावरण अनुकूल राखियों की पहल बच्चों और युवाओं को भी प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी समझाने का माध्यम बन रही है। बदलते समाज की यह तस्वीर बताती है कि अब त्योहारों में केवल दिखावे के बजाय सामाजिक सरोकारों को भी जगह मिल रही है। भाई की कलाई पर बंधने वाली सीड और छिंद राखी रिश्तों की डोर के साथ प्रकृति से जुड़ाव और धरती की रक्षा का संदेश भी देगी।
भाई की कलाई से धरती तक पहुंचेगा रक्षा का संकल्प
रक्षाबंधन के पर्व को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ते हुए महिलाओं ने अनूठी पहल की है। महिलाओं ने बीजों से ऐसी राखियां तैयार की हैं, जो भाई की कलाई पर सजने के साथ ही धरती को हराभरा करने का संदेश भी दे रही हैं। इन सीड राखियों में विभिन्न पौधों के बीज लगाए गए हैं। राखी का पर्व समाप्त होने के बाद इन बीजों को मिट्टी में डालकर पौधे तैयार किए जा सकते हैं। इस पहल का उद्देश्य लोगों को पारंपरिक त्योहारों के साथ पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना है। मॉडल फ्यूचर संस्था की आयषा लोधी ने बताया कि वे काफी समय से पर्यावरण संरक्षण के लिए काम कर रही हैं। बाजार में मिलने वाले रक्षासूत्र में कैमिकल सहित अन्य सामान का इस्तेमाल होता है। धागा भी पॉलिस्टर का होता है जो पर्यावरण के लिए काफी घातक है। ऐसे में हमने सीड राखी निर्माण करने की योजना बनाई। कई जगह से पता किया और फिर इस काम में लग गए। बहुउद्देशीय शैक्षणिक विकास समिति के सहयोग से महिलाओं के साथ इस कार्य को प्रारंभ किया गया। कागज की लुग्दी को 15 दिन पानी में भिगो के रखा। घरेलू पद्धति से गेहूं छानने की छननी से छान लिया और इससे दो बड़े पेपर तैयार कर किया। इसकी खासियत यह है कि इसमें सैलूलोज डवलप हो जाता है जो खाद का काम करता है। इसके बाद हल्दी, सिंदुर, नींबू, पालक के जूस से होममेड कलर तैयार किया। कॉर्न स्टार्च से भिंडी, ककड़ी, लौकी, तुरई, अपराजिता, गेंदा का बीज(फूल एवं सब्जियों के बीज) को पेपर पर चिपकाया। धागा भी सूती का इस्तेमाल किया गया। पूरी पद्धति में कैमिकल का कोई भी इस्तेमाल नहीं किया गया। सभी घरेलू सामान के उपयोग से महज 300 रुपए की लागत से लगभग 200 राखी तैयार की। लोगों ने इसे हाथों हाथ खरीदा। आयषा कहती हैं कि हम सभी हमेशा धरती से कुछ न कुछ लेते हैं, लेकिन कुछ देते नहीं हैं। जिस प्रकार बहर भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर रक्षा का वचन लेती हैं, उसी प्रकार लोगों का धर्म है कि वह धरती की रक्षा करें। यह तभी हो सकता है जब हम ऐसे सामानों का इस्तेमाल करें जो पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाए बल्कि उसे फायदा करे।
छिंद की राखियों से पारंपरिक कलाओं का संरक्षण
तामिया निवासी पवन श्रीवास्तव अपनी पत्नी के साथ मिलकर पिछले पांच सालों से छींद से बनी राखियों का निर्माण कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहे हैं। वहीं भारिया जनजाति के लोग भी छींद से बने परंपरागत मोर मुकुट, हार व शोभा की अन्य सामग्री बनाने के साथ छींद की ई-पत्तियों से आकर्षक राखियां तैयार कर रहे हैं। पवन ने बताया कि आदिवासी परंपरा के मुताबिक सामग्री तैयार करने वाले कलाकार बुजुर्ग हो चुके हैं। उनके साथ कला भी समाप्त न हो जाए इस बात को ध्यान में रखते हुए नई पीढ़ी को भी कला सीखने प्रेरित किया जा रहा है। छींद से बनी राखियों का निर्माण भी इसी में से एक है। बीते दिनों तामिया में आयोजित किए गए सावन महोत्सव में दूर-दराज से आए लोग भी छींद की राखियों से अवगत हुए और खरीदी की। लोगों को छींद से बनी राखियों को भी उपहार स्वरूप प्रदान किया गया। पवन कहते हैं कि उनका प्रयास हमेशा से यही है कि कार्यों से सामाजिक उत्थान, पर्यावरण एवं पारंपरिक कलाओं का संरक्षण हो सके।
Updated on:
27 Aug 2026 02:18 pm
Published on:
27 Aug 2026 02:18 pm
