
चूरू। रतननगर कस्बे की सुरक्षा के लिए करीब 160 वर्ष पूर्व एक मजबूत दीवार का निर्माण यहां के तत्कालीन सेठ नंदराम केडिया ने करवाया था। यह दीवार वास्तु कला व स्थापत्य का बेजोड़ नमूना है। उस समय गांव की रक्षा करने वाले घोड़ों पर सवार होकर इस दीवार पर दौड़ते थे और सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया करते थे। दीवार के निर्माण में चांदी की करनी (औजार) और बारिश के पानी का उपयोग किया गया था। अब यह दीवार पहले जैसी स्थिति में नहीं है, फिर भी इतिहास व यादें सुरक्षित हैं। इसके निर्माण पर एक लाख 7 हजार रुपए लागत आई।
दीवार के चारों कोनों पर बनाईं बुर्ज
दीवार के चारों कोनों पर बनाई चार बुर्ज के नाम वास्तु के हिसाब से रखे गए। पश्चिम और दक्षिण बुर्ज का नाम भैरव बुर्ज, दक्षिण-पूर्व में बुर्ज का नाम केसरिया बुर्ज, उत्तर-पूर्व में बुर्ज का नाम शनि बुर्ज, उत्तर-पश्चिम में बुर्ज का नाम भोमिया बुर्ज है। सभी बुर्ज में रखी तोपों दिन में दो बार सलामी दी जाती थी। दीवार में बने दरवाजों के नाम चूरू दरवाजा, ढांढण दरवाजा, बिसाऊ दरवाजा व गणगौरी दरवाजा हैं।
कन्या के हाथों रखी नींव
लोहिया कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. केसी सोनी बताते हैं कि दीवार का पाया ( नींव) कन्या गंगाबाई के हाथों से भरा गया था। दीवार के मुहूर्त में उस वक्त 379 चांदी के रुपए पहले दिन खर्च हुए थे। नंदराम केडिया ने रतननगर को बसाया था और रतननगर की सुरक्षा के लिए इस दीवार का निर्माण करवाया था। उस वक्त एक मंदिर और एक कुएं का भी निर्माण हुआ था। यह दीवार सवा कोस के घेरे की थी, आसान भाषा में समझें तो चार किलोमीटर की। अभी वर्तमान में पश्चिम दिशा में 400 मीटर के करीब अवशेष बचे हैं। हाल ही में इसकी विधायक कोटे से 10 लाख खर्च कर मरम्मत करवाई गई है।
Published on:
11 Nov 2022 03:30 pm
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