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देवरिया कांड: निगहबानों पर भी उठ रहे सवाल, आखिर आज तक उनको कोई खामी क्यों नहीं दिखी

क्यों वृद्धाश्रमों व बाल आश्रमों में रहने वालों के साथ ज्यादती को कोई भाप नहीं पाया
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देवरिया

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Dheerendra Vikramadittya

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Updated: 10 Aug 2018, 10:13 AM IST

Deoria women shelter home

देवरिया नारी संरक्षण केन्द्र कांड

देवरिया आश्रय गृह कांड पर हाइकोर्ट की तल्खी के बाद जांच में तेजी के साथ लीपापोती शुरू हो चुकी है। लापता बच्चियों की संख्या में अचानक कमी आ गई है। जल्दी जल्दी संस्था की शाखाओं पर भी गाज गिर रही है। लेकिन मौजूं सवाल यह कि सालों से चल रही इन संस्थाओं को अनुदान दिया जाता रहा, बड़े-बड़े साहबान से लेकर सामाजिक-राजनैतिक लोगों की भी समय समय पर कार्यक्रमों में आमद रहा लेकिन उनको कमियां क्यों नहीं दिखी। क्यों वृद्धाश्रमों व बाल आश्रमों में रहने वालों के साथ ज्यादती को कोई भाप नहीं पाया। वह कौन से चिकित्सक थे जो रूटीन जांच में भी दिन ब दिन खराब होती वृद्ध महिलाओं की हालत पर निगरानी से चूक गए।

मां विंध्यवासिनी महिला व प्रशिक्षण संस्था के द्वारा बाल आश्रय गृह के अलावा वृद्धाश्रम का भी संचालन किया जाता है। बीते रविवार को इस संस्था के आश्रय गृह से एक बच्ची के भाग कर जाने के बाद पुलिस ने कार्रवाई की। 24 बच्चियों को मुक्त कराया गया। बच्चियों ने जुर्म की जो दास्तान सुनाई वह हैरान कर देने वाली थी। देखते ही देखते पूरे देश में यह मुद्दा सुर्खियों में आया। मामला तूल पकड़ने के बाद कार्रवाइयां शुरू हुई।
आनन फानन में वृद्धाश्रम पर भी कार्रवाई शुरू हुई। देवरिया के रजली स्थित आश्रम की 24 महिलाओं को कुशीनगर शिफ्ट किया गया। वहाँ चिकित्सीय जांच के बाद इन बुजुर्ग महिलाओं को अब बीआरडी मेडिकल कॉलेज में शिफ्ट किया जा रहा है। कुशीनगर में शिफ्ट हुई महिलाओं की स्थिति बेहद नाजुक पाई गईं। उनकी मानसिक स्थितियां भी सही नहीं है। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार 21 बुजुर्ग महिलाओं में केवल दो ही महिलाएं स्वस्थ थीं। तीन पुरुषों में एक की हालत बेहद नाजुक थी। रिपोर्ट के अनुसार एक महिला को तो गंभीर चोट भी थे।
लोग सवाल करते हैं कि ऐसे आश्रय गृह में रहने वाले लोगों की मेडिकल की जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग की होती है। समय समय पर रेगुलर जांच की जाती है। लेकिन बुजुर्गों की इन हालात पर पूरे प्रशासनिक निगरानी की पोल खुलती है। एक सामाजिक कार्यकर्ता तंज कसते हैं कि विभिन्न महापुरुषों के जन्मदिन पर फल बांट फ़ोटो खिंचाने वाले भी अगर थोड़ी संवेदनशीलता दिखाते तो शायद बुजुर्गों की हालत ऐसी न होती।
सामाजिक आंदोलनों से जुड़े डॉ.चतुरानन ओझा कहते हैं कि जिस संस्था में पुलिस वाले रोज आते जाते हो और बच्चियों पर इतनी जुर्म होती रही तो सवाल उठना लाजिमी है। वह सवाल करते हैं कि छोटे छोटे मामलों को भांपने वाली पुलिस आखिर क्यों अनजान बनी रही। जो बच्ची भाग कर पुलिस के पास जा सकती वह पुलिसवालों के जाने पर अपनी बात जरूर बताती होगी। और अगर बच्चियों पर पहरा लगा दिया जाता था तो भी पुलिस को सवाल करने चाहिए थे। सबसे अहम् यह कि हर थानों पर बच्चों की निगरानी के लिए एक अधिकारी तैनात है आखिर उसने कौन सी जिम्मेदारी निभाई.


बहरहाल, इस पूरे प्रकरण पर यह चंद लाइनें बेहद मौजूं हैं...
'नफ़स-नफ़स क़दम-क़दम
बस एक फ़िक्र दम-ब-दम
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए
जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए
जहाँ आवाम के ख़िलाफ़ साज़िशें हो शान से
जहाँ पे बेगुनाह हाथ धो रहे हों जान से
जहाँ पे लब्ज़े-अमन एक ख़ौफ़नाक राज़ हो
जहाँ कबूतरों का सरपरस्त एक बाज़ हो
वहाँ न चुप रहेंगे हम
कहेंगे हाँ कहेंगे हम।