
Guru Purnima Special: सांदीपनि आश्रम में आज भी जिवंत है श्रीकृष्ण से जुड़ी 5300 साल पुरानी परंपरा (फोटो सोर्स- Patrika)
Maharishi Sandipani Ashram: आज के आधुनिक और डिजिटल युग में भी उज्जैन शहर में 10 से अधिक प्रमुख गुरुकुल संचालित हो रहे हैं, जहां प्राचीन भारत की गुरु-शिष्य परंपरा को निष्ठा के साथ निभाया जा रहा है। इन गुरुकुलों में देश के कोने-कोने से आने वाले बटुक (विद्यार्थी) केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला और उच्च नैतिक संस्कार भी सीख रहे है।\
धर्मधरा अवंतिका नगरी का इतिहास केवल प्राचीन मंदिरों और धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह युगों-युगों से ज्ञान और संस्कारों की संवाहक रही है। जिस पावन भूमि पर 5300 वर्ष पूर्व स्वयं भगवान श्रीकृष्ण, भ्राता बलराम और मित्र सुदामा ने महर्षि सांदीपनि के आश्रम में 64 कलाओं और 14 विद्याओं का ज्ञान प्राप्त किया था, उस महर्षि सांदीपनि की परंपरा आज भी इस शहर में पूरी भव्यता और पवित्रता के साथ जीवित है।
पंचांग गणना के अनुसार इस बार भैरव पूर्णिमा बुधवार को आ रही है। ज्योतिषाचार्य पं. अमर डब्बावाला ने बताया कि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि भैरव पूर्णिमा के रूप में भी मनाई जाती है। यह दिन भैरव उपासना और श्रद्धा व्यक्त करने के लिए विशेष माना जाता है। इस दिन लोग अपने कुलदेवता या काल भैरव के रूप में भगवान भैरव की पूजा करते हैं। पारिवारिक स्थिरता और शांति के लिए कुल देवता के रूप में भैरव पूजन की मान्यता है। जिन परिवारों में संतान का अभाव है. वे अपने कुल भैरव के रूप में अष्ट भैरव की पूजा कर सकते हैं। वर्षभर पूजन करने से कुल वृद्धि का आशीर्वाद मिलता है और संकटों से मुक्ति मिलती है।
मौनतीर्थ आश्रम के पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद गिरि महाराज ने बताया कि यहां वैदिक अध्ययन और शास्त्र ज्ञान बटुको को आचार्यों द्वारा दिया जाता है। साथ ही चारों वेद, उपनिषद्, व्याकरण, ज्योतिष और कर्मकांड का गहन अध्ययन कराया जाता है। वहीं रामानुजकोट आश्रम के पीठाधीश स्वामी रंगनाथाचार्य महाराज और युवराज स्वामी माधव प्रपन्नाचार्य ने बताया कि आश्रम में पूर्ण रूप से प्रशिक्षित आचार्यों द्वारा अनुशासित और सात्विक जीवन का पाठ पढ़ाया जाता है। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में जागरण से लेकर संध्या वंदन तक विद्यार्थियों की दिनचर्या पूरी तरह अनुशासित और प्राकृतिक वातावरण में व्यतीत होती है।
महामंडलेश्वर चारधाम आश्रम के संस्थापक स्वामी शांतिस्वरूपानंद महाराज ने कहा कि आश्रमों में गुरुओं के सानिध्य में रहकर विद्यार्थी केवल शिक्षा ही ग्रहण नहीं करते, बल्कि उनमें सेवा भावना, आदर और त्याग जैसे मानवीय मूल्यों का बीजारोपण भी किया जाता है। ये संस्कार और शिक्षा ही बटुकों को जीवन की व्यावहारिकता सिखाने के साथ जीवन मूल्य बताते हैं।
मुफ्त आवास और भोजन के साथ-साथ पौराणिक आश्रम व्यवस्था की तर्ज पर आज भी कई गुरुकुलों में विद्यार्थियों के लिए रहने, भोजन और शिक्षा की पूरी व्यवस्था निःशुल्क की जाती है। जहां विश्वभर में आधुनिक शिक्षा पद्धतियां तेजी से बदल रही हैं, वहीं उज्जैन के ये गुरुकुल हमारी सनातन संस्कृति और पौराणिक शिक्षा व्यवस्था को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने में मजबूत स्तंभ बने हुए हैं।
Updated on:
29 Jul 2026 10:40 am
Published on:
29 Jul 2026 10:39 am
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