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Rajasthan Election 2018: दिग्गजों की प्रतिष्ठा दावं पर, वंशवाद का बोलबाला

Rajasthan Election 2018- इन दिनों मौसम का पारा नीचे जा रहा है तो धौलपुर जिले के राजाखेड़ा में सियासी पारा ऊपर की ओर चढ़ रहा है। यहां इलाके के दो दिग्गज नेताओं प्रद्युम्नसिंह तथा बनवारी लाल शर्मा की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।
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सुरेन्द्र चतुर्वेदी
राजाखेड़ा। इन दिनों मौसम का पारा नीचे जा रहा है तो धौलपुर जिले के राजाखेड़ा में सियासी पारा ऊपर की ओर चढ़ रहा है। यहां इलाके के दो दिग्गज नेताओं प्रद्युम्नसिंह तथा बनवारी लाल शर्मा की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। कांग्रेस ने प्रद्युम्नसिंह के पुत्र रोहित बोहरा को चुनावी रण में उतरा है। रोहित का तो यह पहला चुनाव है जबकि उनके सामने भाजपा प्रत्याशी अशोक शर्मा का दूसरा। इससे पहले वे कांग्रेस के टिकट पर धौलपुर से प्रत्याशी रहे थे और पराजित हुए।

चुनाव का बिगुल बजने पर वे भाजपा में शामिल हुए तो उनको राजाखेड़ा से उम्मीदवार बना दिया गया। वे धौलपुर से टिकट लेने के इच्छुक थे। प्रद्युमन का राजाखेड़ा और बनवारी का धौलपुर पांच दशक से गढ़ रहा हैं। प्रद्युम्नसिंह राजाखेड़ा से 8 बार विधायक रहे हैं तो बनवारी लाल धौलपुर से 5 बार विधायक रहे हैं। इस बार के चुनाव में बनवारी के पुत्र कांग्रेस पार्टी तथा अपने इलाके को छोड़कर पुत्र के साथ राजाखेड़ा में सेंध लगाने को आए हैं। यूं तो राजाखेड़ा मुद्दे अनेक हैं, लेकिन ये केवल प्रबुद्ध वर्ग की चर्चाओं तक सीमित है। केवल जातिगत समीकरणों के आधार पर ही चुनावी चर्चाएं सुनाई देती हैं। भाजपा प्रत्याशी अशोक शर्मा लिए राजाखेड़ा नया इलाका है।

भाजपा उनके लिए नया घर है। इस कारण वे राजाखेड़ा इलाके के गांव-ढाणियों और मतदाताओं से वाकिफ नहीं है। इसके विपरीत प्रद्युम्नसिंह की पूरी 50 वर्ष की राजनीति का सफर राजाखेड़ा में ही गुजरा है। पिछले तीन चुनाव से प्रद्युम्नसिंह को अपने छोटे भाई रवीन्द्र सिंह की ओर से चुनौती मिल रही थी। दोनों भाई वर्ष 2003 तथा 2008 के चुनाव में प्रतिद्वंदी रहे। वर्ष 2008 के चुनाव में रवीन्द्र सिंह जीते भी। पिछली बार उनके पुत्र विवेक बोहरा भाजपा की ओर से मैदान में उतरे और प्रद्युम्नसिंह से पराजित हुए। इस चुनाव में खास बात यह है कि अभी तक प्रतिद्वंदी रहे विवेक भी रोहित के साथ प्रचार में आए हैं।

मित्रता के बीच चुनाव की खटास
प्रद्युम्न तथा बनवारी की अच्छी मित्रता रही है। दोनों लंबे समय से कांग्रेस में होने से चुनावों में एक दूसरे के क्षेत्र में मददगार बनते रहे। अब चुनावों में पुत्रों के आमने-सामने होने से चुनाव की राजनीति में वे अब एक दूसरे के प्रतिद्वंदी बने हुए हैं।

पिता के प्रभाव के सहारे जीत की उम्मीद
रोहित बोहरा
ताकत: पिता की क्षेत्र में पकड़, इलाके का जाना-पहचाना चेहरा। कार्यकर्ताओं की मजबूत टीम
कमजोरी: विकास की कमी को लेकर एक वर्ग में नाराजगी, कुछ लोगों में राजनीतिक वर्चस्व में बदलाव लाने की इच्छा।

अशोक शर्मा
ताकत: पिता का जाना-पहचाना नाम, एक समाज के मतदाताओं की पक्ष में लामबंदी
कमजोरी: नया क्षेत्र होना, एकाएक टिकट मिलने के कारण क्षेत्र के मतदाताओं से संपर्क के लिए समय कम।

चंबल के पानी का मुद्दा अहम
अशोक शर्मा नई पार्टी और नए इलाके से चुनाव लड़ रहे है लेकिन उनको कमजोर नहीं माना जा सकता है। उनके पास अपने समाज के मतों का तो आधार है ही। अगर वे कांग्रेस के वोटरों में सेंध लगाने में कामयाब हुए तो मुकाबला कांटे का हो जाएगा। भाजपा के लिए चुनाव में चंबल का पानी संजीवनी का काम कर सकता है। क्षेत्र में पानी की समस्या प्रमुख रही है। भाजपा शासन में कुछ इलाकों में चंबल का पानी पहुंचाने का काम हुआ है। कुछ इलाकों में काम प्रगति पर है। ये उपलब्धि इलाके के लोगों को भाजपा के पक्ष में प्रभावित कर रही है। अनेक मतदाता एक परिवार के राजनीतिक वर्चस्व में बदलाव चाहते हैं। ऐसी मंशा का लाभ भी भाजपा प्रत्याशी को मिल सकता है।