
धंबोला. होलिका दहन में उपयोग में ली जाने वाली लकड़ी सेमल का पेड़। फोटो पत्रिका
Holi Festival : होली का पर्व निकट आते ही गांवों और शहरों में परंपरागत तैयारियां शुरू हो गई हैं। वागड़ अंचल में सदियों पुरानी मान्यता है कि होलिका दहन तब तक पूर्ण नहीं माना जाता, जब तक कि अग्निकुंड के केंद्र में सेमल के पेड़ की लकड़ी (खुट) स्थापित न की जाए।
लोकश्रुतियों के अनुसार, सेमल की लकड़ी को अटूट आस्था और स्थायित्व का प्रतीक माना जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि गीली और भारी होने के कारण यह लकड़ी पूरी तरह भस्म नहीं होती, जो इसे विशिष्ट बनाती है। परंपरा के अनुसार, पहले चौपाल के केंद्र में सेमल का खुट रोपा जाता है, फिर उसके चारों ओर अन्य लकड़ियां सजाई जाती हैं।
सेमल का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक भी है। इसके फलों से निकलने वाली रुई का उपयोग गद्दे और तकिये बनाने में होता है। पर्यावरण के लिहाज से सेमल पक्षियों के लिए सुरक्षित आश्रय स्थल है।
पीठ में रंगों के पर्व होली और नन्हे बच्चों के 'ढूंढोत्सव' को लेकर वागड़ अंचल में उत्साह चरम पर है। बाजारों में रौनक बढ़ गई है और ग्रामीण क्षेत्रों में प्राचीन परंपराओं को निभाने की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। ढूंढोत्सव के लिए परिजनों ने ढोल-नगाड़ों, रेडीमेड वस्त्रों, जूते-चप्पल और सौंदर्य प्रसाधन सामग्री की खरीदारी शुरू कर दी है।
त्योहार के कारण नारियल की मांग में उछाल आया है, जिससे कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है। समाज की रीति-रिवाजों के अनुसार मेहमानों की विदाई और होलिका दहन के बाद की रस्मों के लिए नारियल का विशेष महत्व रहता है।
इधर, रोजगार के लिए गुजरात और महाराष्ट्र पलायन कर चुके श्रमिकों का आमली एकादशी मेले से पूर्व घर लौटना शुरू हो गया है, जिससे सीमलवाड़ा, चिखली, पीठ और करावाड़ा के बाजारों में चहल-पहल बढ़ गई है। वहीं, किसान भी रबी की फसल (गेहूं, चना, मक्का) के पकने के बाद खेतों में कटाई के कार्यों में जुट गए हैं।
Published on:
20 Feb 2026 11:48 am
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