
रामअचल राजभर के सपा में शामिल होने पर अखिलेश को कितनी मिलेगी मजबूती
लखनऊ. यूपी में पंचायत चुनाव 2021 खत्म ही हुए थे कि रामअचल राजभर, बसपा के संस्थापक सदस्य को बसपा सुप्रीमो का फरमान आ गया कि, अब वे हाथी के साथ नहीं चल सकेंगे। और बसपा से उनकी एक 38 साल पुरानी लम्बी कहानी एक झटके में खत्म हो गई। बसपा के कई नेता अवाक रह गए। पर चुप थे। कांशीराम, मायावती के चहेते नेताओं की बसपा छोड़ने की लम्बी लिस्ट में एक और नाम शामिल हो गया। 3 जून को हाथी से उतारे थे और 7 नवम्बर को साइकिल पर सवार हो गए। अब रामअचल राजभर लाल टोपी पहन साइकिल पर बैठ सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव का प्रचार कर रहे हैं। राजभर के सपा में शामिल होने पर अखिलेश को कितनी मिलेगी मजबूती मिली, यह तो आने वाला चुनाव 2022 बताएगा। पर फिलवक्त राजभर का कहना है कि बसपा खत्म हो चुकी है। मायावती भाजपा के साथ दलित वोटों का सौदा कर सकती हैं।
12 जिले की जनता अब अखिलेश के साथ -
पूर्वांचल के करीब 12 जिले और छह प्रदेश की जनता को बसपा के प्रति अविश्वास बढ़ा है। रामअचल राजभर बताते हैं कि, बसपा से मुझे निकालने के बाद सर्वसमाज के साथ राजभर समाज ने बसपा छोड़ दी। बसपा को खड़ा करने में मेरी पूरी जवानी बीत गई। पार्टी से कांशीराम का मिशन गायब हो गया है। बसपा अब खत्म हो रही है। ये सभी अब सपा के साथ खुलकर आ गए हैं। पश्चिम में जयंत समेत अन्य छोटे-छोटे दलों के गठबंधन से इस बार ऐतिहासिक जीत के साथ सपा की सरकार बनेगी।
राजभर व सर्वसमाज का रामअचल को समर्थन -
रामअचल राजभर के आने से सपा को राजभर समाज व सर्वसमाज के एक बड़े तबके का समर्थन हासिल होगा। फिर सपा गठबंधन में ओम प्रकाश राजभर के होने से पार्टी को और मजबती हासिल होगी। रामअचल राजभर का कहना है कि, मरते दम तक अखिलेश के साथ रहेंगे। मेरा पहले संकल्प था कि नीले कफन में मेरी लाश जाएगी, पर अब मायावती बुलाएं तो भी कभी नहीं जाऊंगा। मायावती को पीएम तो नहीं बना सका, लेकिन अखिलेश को एक दिन पीएम जरूर बनाऊंगा।
अकबरपुर का टिकट फंसाएगा पेंच -
रामअचल राजभर के सपा में आने से अंबेडकरनगर ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश व पूर्वांचल में समीकरण बदला है। पर अकबरपुर विधानसभा क्षेत्र में टिकट के लिए मामला फंस सकता है। अकबरपुर विधानसभा क्षेत्र से सपा के टिकट के एक उम्मीदवार राममूर्ति वर्मा भी हैं। और रामअचल का कहना है कि, पांचवीं बार अकबरपुर से जनता ने जिताया है, तो चुनाव यहीं से लड़ना चाहता हूं। पूर्व मंत्री राममूर्ति वर्मा का समायोजन राष्ट्रीय अध्यक्ष को करना है, वे जो निर्णय लेंगे हम उसका पालन करेंगे। हम अनुशासित व्यक्ति हैं।
राम अचल राजभर का इतिहास -
Uttar Pradesh Assembly Election 2022 - बसपा पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व राष्ट्रीय महासचिव राम अचल राजभर यूपी में हुए पंचायत चुनाव के बाद पार्टी से निकाल दिया गया। राम अचल राजभर चुनाव 2017 में भाजपा लहर में अकबरपुर विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। राजभर बसपा के संस्थापक सदस्य रहे हैं। वह कांशीराम के सहयोगी रहे थे। राजभर 1993 में पहली बार बसपा के टिकट पर विधायक बने। तब से उनकी जीत का सिलसिला जारी है। वर्मा 1986 में पहली बार एमएलसी बनाए गए। इसके बाद उन्होंने 1991, 1996, 2002, 2007 और 2017 का विधानसभा चुनाव भी जीता।
बसपा को जिन्होंने बनाया वो कई दिग्गज चले गए -
नसीमुद्दीन सिद्दीकी - नसीमुद्दीन वर्ष 2017 में बसपा से निष्कासित किए गए। अब वह कांग्रेस पार्टी के साथ हैं। वर्ष 2007 में जब मायावती आखिरी बार सीएम बनी थीं तब नसीमुद्दीन सिद्दीकी उनके सबसे खास सिपहसालार थे।
स्वामी प्रसाद मौर्य - वर्ष 2016 में बहुजन समाज पार्टी और मायावती का साथ छोड़ भाजपा के संग आ गए। मौर्य, मायावती के बेहद खास थे। इस वक्त स्वामी प्रसाद मौर्य यूपी की योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं।
राम अचल राजभर - वर्ष 2021 में बसपा के संस्थापक सदस्य राम अचल राजभर बसपा को छोड़ साइकिल सवार हो गए। राजभर पहले कांशीराम और फिर बाद में मायावती के काफी करीब रहे।
लालजी वर्मा - वर्ष 2021 लालजी वर्मा को हाथी से उतार कर बहार कर दिया गया। तब वह सपा में शामिल हो गए। लालजी वर्मा, कांशीराम और मायावती दोनों के बेहद चहेते थे।
बाबू सिंह कुशवाहा - वर्ष 2011 में बाबू सिंह कुशवाहा को बसपा से मायावती ने बाहर कर दिया। कुशवाहा पहले तो भाजपा में गए फिर वहां से निकलने के बाद उन्होंने अपनी जन अधिकार पार्टी बना ली। बसपा से 27 साल से जुड़े थे।
दारा सिंह चौहान - वर्ष 2015 में दारा सिंह चौहान ने मायावती का साथ छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया था। उन पर अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप था।
बृजेश पाठक - बसपा का दामन छोड़कर ब्रजेश पाठक भाजपा में आ गए हैं। इस पहले ब्रजेश कांग्रेस पार्टी में भी थे।
लिस्ट काफी लम्बी है -
नकुल दुबे, रामवीर उपाध्याय, ठाकुर जयवीर सिंह, सुधीर गोयल, वेदराम भाटी, चौधरी लक्ष्मी नारायण, राकेश धर त्रिपाठी, फागू चौहान, दद्दू प्रसाद, राम प्रसाद चौधरी, धर्म सिंह सैनी, सुखदेव राजभर और इंद्रजीत सरोज जैसे और कई बड़े नेताओं ने बसपा को छोड़ अन्य पार्टियों में शामिल हो गए हैं।
बसपा का गठन - 1984 में बसपा का गठन हुआ था। 1993 में पहली बार 67 सीटें जीतकर चौंकाने वाली बसपा आज 17वीं विधानसभा के कार्यकाल के अंतिम समय में महज 3 विधायकों के साथ खड़ी है। 75 फीसद विधायक बसपा से दूरी बना चुके हैं।
Published on:
07 Jan 2022 11:29 am
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