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इच्छामृत्यू वाले हरीश राणा की बायोपिक की तैयारी शुरू, दिल चीरने वाली कहानी दिखाएगी फिल्म

Harish Rana Biopic Passive Euthanasia: हरीश राणा की दर्दनाक कहानी पर बायोपिक बनाने की तैयारी की जा रही है। क्या है पूरा मामला, चलिए जानते हैं।

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Harish Rana Biopic Passive Euthanasia

Harish Rana Biopic Passive Euthanasia (सोर्स- एक्स)

Harish Rana Biopic Passive Euthanasia: देश में मानवीय संवेदनाओं और न्याय व्यवस्था से जुड़े सबसे भावुक मामलों में शामिल रहे हरीश राणा की जिंदगी अब बड़े पर्दे पर दिखाई जा सकती है। 13 वर्षों तक कोमा में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष करने वाले इस युवा की कहानी ने पूरे देश को झकझोर दिया था। अब खबर सामने आई है कि उनकी संघर्षगाथा पर बायोपिक बनाने की तैयारी शुरू हो गई है।

फिल्म लेखक ने अधिवक्त से किया संपर्क (Harish Rana Biopic News)

बताया जा रहा है कि मुंबई के एक फिल्म लेखक ने इस संवेदनशील विषय पर फिल्म बनाने की इच्छा जताते हुए हरीश के अधिवक्ता मनीष जैन से संपर्क किया है। हालांकि लेखक ने फिलहाल अपना नाम सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन उन्होंने साफ किया है कि यह फिल्म केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं बल्कि न्याय, करुणा और परिवार के संघर्ष का दस्तावेज होगी।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला बना ऐतिहासिक मोड़

करीब 13 वर्षों तक कोमा में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने 11 मार्च 2026 को इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने परोक्ष इच्छामृत्यु की अनुमति देते हुए एक कठिन लेकिन संवेदनशील निर्णय लिया। इस फैसले को 2018 में तय सिद्धांतों को व्यवहार में लागू करने वाला महत्वपूर्ण कदम माना गया। ये फैसला केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं था, बल्कि एक पिता के दर्द और परिवार की पीड़ा को समझने का उदाहरण भी बना।

पिता का साहस बना देश के लिए मिसाल (Harish Rana Biopic News)

हरीश के पिता अशोर राणा ने बेटे की असहनीय स्थिति को देखते हुए परोक्ष इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी थी। इतना ही नहीं, उन्होंने बेटे के अंगदान का निर्णय लेकर समाज के सामने एक मानवीय उदाहरण भी पेश किया।

13 वर्षों तक बेटे को इसी हालत में देखते रहना किसी भी परिवार के लिए आसान नहीं होता। ऐसे में पिता का यह निर्णय भावनात्मक रूप से बेहद कठिन लेकिन साहसिक माना जा रहा है।

एम्स में जारी रहा लंबा संघर्ष

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एम्स दिल्ली के पैलिएटिव केयर वार्ड में हरीश का उपचार जारी रहा। इस दौरान पूरा देश इस मामले को संवेदनशीलता के साथ देखता रहा। डॉक्टरों, वकीलों और न्यायपालिका की भूमिका भी इस संघर्ष में अहम रही।

हिमाचल के छोटे से गांव से शुरू हुई कहानी

हरीश राणा का परिवार मूल रूप से कांगड़ा जिले के जयसिंहपुर क्षेत्र के प्लेटा गांव से जुड़ा है। बेहतर भविष्य की उम्मीद में उनके पिता 1989 में दिल्ली आकर बस गए थे। परिवार सामान्य जीवन जी रहा था, लेकिन एक हादसे ने सबकुछ बदल दिया।

चंडीगढ़ के एक अस्पताल में हुए हादसे के बाद हरीश की जिंदगी पूरी तरह बदल गई और परिवार पर मानसिक व आर्थिक संकट का पहाड़ टूट पड़ा।

बायोपिक में दिखेगी न्याय, संवेदना और संघर्ष की कहानी

बताया जा रहा है कि प्रस्तावित बायोपिक में एक पिता के 13 साल लंबे संघर्ष, एक वकील की कानूनी लड़ाई और न्यायपालिका की संवेदनशील भूमिका को प्रमुखता से दिखाया जाएगा। यह फिल्म केवल एक मेडिकल केस नहीं बल्कि सम्मानजनक जीवन और सम्मानजनक विदाई जैसे महत्वपूर्ण सवालों को भी सामने लाएगी।