
करनाल से स्मार्ट खेती की नई उम्मीद, जहां AI और सेंसर की मदद से कम पानी में बेहतर उत्पादन की संभावनाएं तलाश की जा रही हैं। ( फोटो डिजाइन : ChatGPT)
सुबह की पहली किरण जब खेत की नम मिट्टी पर उतरती है, तो किसान की आँखों में फ़सल के साथ बहुत सारी उम्मीदें भी अंकुरित होती हैं। कभी आसमान से बारिश की दुआ, कभी खाद की चिंता और कभी कीटों के हमले का डर। अब विज्ञान इसी अनिश्चितता को कम करने की कोशिश कर रहा है। सोचिए, खेत में लगा छोटा-सा सेंसर बता दे कि पौधों को कितने पानी की ज़रूरत है और मोबाइल पर संदेश आ जाए कि सिंचाई अभी करनी है या नहीं। हरियाणा के करनाल सहित पूरे प्रदेश में आधुनिक बाग़वानी को बढ़ावा देने की योजनाएं इसी दिशा में महत्त्वपूर्ण हैं।
हरियाणा सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 में प्रदेश के विभिन्न ज़िलों में 1,000 एकड़ क्षेत्र को स्मार्ट बाग़वानी तकनीकों के दायरे में लाने का प्रावधान किया है। इसमें एरोपोनिक्स, हाइड्रोपोनिक्स, संरक्षित खेती, हरितगृह, ऊर्ध्वाधर खेती और इलेक्ट्रॉनिक कीट प्रबंधन शामिल हैं। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के अनुसार, छोटी जोत, घटते भूजल और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के बीच बाग़वानी किसानों की आमदनी बढ़ाने का महत्त्वपूर्ण विकल्प बन सकती है। लेकिन 1,000 एकड़ का लक्ष्य अभी योजना का हिस्सा है, इसे पूरी तरह लागू हो चुकी उपलब्धि मानना सही नहीं होगा।
करनाल के महाराणा प्रताप बाग़वानी विश्वविद्यालय में 19-20 सितंबर 2026 को प्रथम उद्यान मेला एवं बाग़वानी प्रदर्शनी आयोजित की गई थी। इसमें आधुनिक सिंचाई, संरक्षित खेती और उन्नत कृषि तकनीकों को किसानों से जोड़ने की पहल हुई। 19 सितंबर को विश्वविद्यालय की मृदा परीक्षण प्रयोगशाला और शहद परीक्षण प्रयोगशाला का उद्घाटन भी किया गया। इन सुविधाओं का महत्त्व इसलिए है क्योंकि वैज्ञानिक खेती की शुरुआत मिट्टी की वास्तविक ज़रूरत समझने से होती है, केवल अधिक खाद डालने से नहीं।
परंपरागत खेती में कई बार किसान अनुमान से सिंचाई करता है। आधुनिक संवेदक मिट्टी की नमी, तापमान और अन्य पर्यावरणीय स्थितियों को मापकर सिंचाई का निर्णय बेहतर बना सकते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार, इंटरनेट से जुड़े मृदा-नमी सेंसर पर आधारित सिंचाई प्रणाली पारंपरिक सिंचाई निर्धारण की तुलना में लगभग 10 से 15 प्रतिशत पानी बचा सकती है। केले पर विकसित सेंसर आधारित सूक्ष्म सिंचाई कार्यक्रम में 20 प्रतिशत पानी बचने और उपज में 15 प्रतिशत वृद्धि के परिणाम सामने आए हैं। ये विशिष्ट परीक्षणों के परिणाम हैं, हर खेत के लिए निश्चित वादा नहीं।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की चयनित तकनीकों के परिणाम
| तकनीक | पानी की बचत | उपज वृद्धि |
|---|---|---|
| नमी सेंसर | 10–15% | निर्दिष्ट नहीं |
| धान की वैकल्पिक सिंचाई | 17% | निर्दिष्ट नहीं |
| केले में सूक्ष्म सिंचाई | 20% | 15% |
| मक्का में भूमिगत ड्रिप | 16% | 12% |
| कीट निगरानी | अप्रत्यक्ष | क्षति रोकथाम |
| मिट्टी परीक्षण | परिस्थिति पर निर्भर | पोषण प्रबंधन |
| एआई सलाह | परिस्थिति पर निर्भर | निर्णय सहायता |
स्रोत: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, लैंडमार्क टेक्नोलॉजीज़; केंद्र सरकार की एआई कृषि पहलें। प्रतिशत संबंधित परीक्षणों के हैं, राष्ट्रीय औसत नहीं।
हाइड्रोपोनिक्स में पौधों की जड़ें पोषक तत्त्वों वाले पानी से भोजन प्राप्त करती हैं, जबकि एरोपोनिक्स में जड़ों तक पोषक घोल की महीन फुहार पहुँचाई जाती है। इन विधियों में पानी और पोषक तत्त्वों का नियंत्रित इस्तेमाल संभव है। इससे विशेषकर सब्ज़ियों और कुछ उच्च मूल्य वाली फ़सलों में संसाधनों की दक्षता बढ़ सकती है। मगर इसका अर्थ खाद की आवश्यकता समाप्त होना नहीं है। बिजली, पानी की गुणवत्ता, उपकरणों की देखभाल और शुरुआती निवेश भी ज़रूरी होते हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता मौसम, उपग्रह चित्रों, मिट्टी और पौधों की तस्वीरों का विश्लेषण करके समय पर चेतावनी देने में सहायता करती है। केंद्र सरकार के राष्ट्रीय कीट निगरानी तंत्र में ऐसी तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। फ़रवरी 2026 की सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, इसका दायरा 66 फ़सलों और 432 से अधिक प्रकार के कीटों तक पहुँच चुका था। इससे किसान संभावित प्रकोप की पहचान पहले कर सकते हैं, हालाँकि अंतिम उपचार के लिए स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह महत्त्वपूर्ण है।
अगस्त 2026 में जारी केंद्र सरकार के आँकड़े बताते हैं कि देश में डिजिटल कृषि मिशन तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। तीन अगस्त तक 10.31 करोड़ से अधिक किसानों की डिजिटल पहचान बन चुकी थी। रबी 2025-26 में 648 ज़िलों के 31.3 करोड़ से अधिक फ़सल भूखंडों का सर्वेक्षण किया गया। जुलाई तक राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली 73 फ़सलों और 436 से अधिक कीटों को कवर कर रही थी। ये पहले जारी 66 फ़सलों और 432 कीटों वाले आँकड़ों से अधिक अद्यतन हैं।
| पहल | उपलब्धि | संदर्भ |
|---|---|---|
| किसान पहचान | 10.31 करोड़+ | अगस्त 2026 |
| फ़सल भूखंड सर्वेक्षण | 31.3 करोड़+ | रबी 2025-26 |
| सर्वेक्षित ज़िले | 648 | रबी 2025-26 |
| निगरानी वाली फ़सलें | 73 | जुलाई 2026 |
| कीटों का दायरा | 436+ | जुलाई 2026 |
| भारत-विस्तार के लाभार्थी | 3 लाख+ | जुलाई 2026 |
| भारत-विस्तार प्रश्न | 72 लाख+ | जुलाई 2026 |
स्रोत: भारत सरकार, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, अगस्त 2026 की आधिकारिक प्रगति रिपोर्ट।
सरकार का 'किसान ई-मित्र' किसानों को उनकी भाषा में योजनाओं की जानकारी उपलब्ध कराने के लिए विकसित किया गया है। वहीं, 'भारत-विस्तार' जैसे नए डिजिटल मंच कृषि संबंधी सलाह की पहुँच बढ़ा रहे हैं। सरकार के मुताबिक़ जुलाई 2026 तक भारत-विस्तार से तीन लाख से अधिक किसान जुड़ चुके थे। हालाँकि, किसी मोबाइल ऐप की सलाह को खेत में बिना जाँचे लागू करना जोखिमपूर्ण हो सकता है। स्थानीय मौसम, मिट्टी, फ़सल की अवस्था और कृषि विशेषज्ञ की राय भी उतनी ही ज़रूरी है।
सेंसर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता खाद के उपयोग को अधिक सटीक बनाने में सहायता कर सकते हैं। मिट्टी परीक्षण से पता चलता है कि किस पोषक तत्त्व की कमी है और कितना उर्वरक देना उचित होगा। इससे अनावश्यक खर्च तथा पोषक तत्त्वों की बर्बादी घट सकती है। लेकिन बिना खाद के सभी फ़सलों की अधिक पैदावार संभव होने का दावा वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। पौधों को संतुलित पोषण चाहिए, चाहे वह मिट्टी से मिले, जैविक स्रोतों से या नियंत्रित पोषक घोल से।
करनाल से उभरती आधुनिक बाग़वानी की संभावनाएँ केवल मशीनों की कहानी नहीं हैं। यह उस किसान के भविष्य से जुड़ा बदलाव है, जो हर मौसम में अपनी मेहनत और उम्मीद बोता है। यदि तकनीक सस्ती, भरोसेमंद और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल बनी, तो पानी की बचत, संतुलित खाद उपयोग और बेहतर पैदावार का रास्ता खुल सकता है। शुरुआत छोटे खेत में परीक्षण, मिट्टी की जाँच और कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह से करना समझदारी होगी। आने वाले समय में खेती की असली ताक़त मशीन नहीं, बल्कि किसान के अनुभव और विज्ञान के बीच बनने वाला भरोसा होगा।
Updated on:
15 Oct 2026 02:34 pm
Published on:
15 Oct 2026 02:34 pm
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