
122 साल पुरानी धरोहर (फोटो सोर्स- पत्रिका)
Chhattisgarh Heritage: छत्तीसगढ़ के जनजागरण, सामाजिक क्रांति और साहित्य के अग्रदूत पंडित सुंदरलाल शर्मा की स्मृतियों से जुड़ा राजिम का ऐतिहासिक वाचनालय आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। महामाया मंदिर के बाईं ओर स्थित करीब 122 साल पुराना यह भवन लंबे समय से उपेक्षा का शिकार है। भवन का प्लास्टर जगह-जगह उखड़ चुका है, दीवारों में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ चुकी हैं और परिसर में घास-फूस उग आई है। मुख्य गेट और दरवाजों पर लटके ताले इस बात की गवाही दे रहे हैं कि कभी साहित्य प्रेमियों से गुलजार रहने वाली यह अमूल्य धरोहर आज वीरान पड़ी है।
सौ वर्ष से अधिक पुरानी इस महत्वपूर्ण इमारत को विरासत स्थल के रूप में संरक्षित करने की मांग लगातार जोर पकड़ रही है। नगर पालिका अध्यक्ष महेश यादव ने भी इस पर चिंता जताते हुए कहा कि यह राजिम की महान धरोहर है। उन्होंने संबंधित विभागों से अपील की है कि पंडित सुंदरलाल शर्मा के व्यक्तित्व और गरिमा के अनुरूप इस वाचनालय का भव्य जीर्णोद्धार कराया जाए। साथ ही पुरानी पुस्तकों का डिजिटल स्वरूप तैयार कर इसे आधुनिक वाचनालय के रूप में विकसित किया जाए।
वाचनालय के भीतर रखी लगभग छह हजार पुस्तकें अत्यंत पुरानी और दुर्लभ हो चुकी हैं। इनके पन्ने छूने मात्र से फटने लगे हैं। परिवार की सदस्य पद्मा दुबे ने बताया कि संस्कृति विभाग के निर्देश पर पुस्तकों की सूची विभाग को भेजी गई थी, लेकिन अब तक डिजिटलीकरण की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई है। परिजनों और स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि शासन-प्रशासन समय रहते सहयोग करे तो इस अमूल्य धरोहर को बचाया जा सकता है। प्रपौत्र विकास शर्मा ने भी कहा है कि नई पीढ़ी को पंडित शर्मा के साहित्य से परिचित कराने के लिए भवन का संरक्षण और पुस्तकों का आधुनिकीकरण बेहद जरूरी है।
इतिहास के पन्नों के अनुसार, पंडित सुंदरलाल शर्मा ने वर्ष 1904 में इस वाचनालय की स्थापना की थी। महज 22 वर्ष की आयु में खंडकाव्य ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला’ की रचना करने वाले शर्मा जी ने (Chhattisgarh News) राजिम में साहित्यिक समितियों का गठन कर यहां सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया था। वर्ष 1940 में उनके निधन के बाद यह वाचनालय बंद हो गया था।
हालांकि, बाद में भुवनलाल मिश्रा के प्रयासों से और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह की मौजूदगी में 1991-92 में इसका जीर्णोद्धार कराया गया था। इसके बाद पंडित शर्मा की परपोती पद्मा दुबे की बड़ी बहन शोभा शर्मा ने वर्ष 2000 से 2013-14 तक इसका संचालन संभाला, लेकिन उसके बाद से यह फिर पूरी तरह बंद पड़ा है। वर्ष 1984 में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने भी इस ऐतिहासिक वाचनालय का दौरा किया था और पंडित शर्मा के नाम पर डाक टिकट का विमोचन किया था।
Updated on:
27 Aug 2026 05:00 pm
Published on:
27 Aug 2026 05:00 pm
